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रिकॉर्ड गति से पिघल रही है दुनिया में बर्फ, 2017 में 65 फीसदी ज्यादा थी पिघलने की रफ्तार

1990 में यह 80,000 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से पिघल रही थी वो दर 2017 में बढ़कर 130,000 करोड़ टन प्रति वर्ष हो गई है

By Lalit Maurya

On: Monday 25 January 2021
 

दुनिया भर में जमी बर्फ के पिघलने की रफ्तार तापमान के बढ़ने के साथ बढ़ती जा रही है| इसके पिघलने की गति रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है| यह जानकारी हाल ही में जर्नल द क्रायोस्फीयर में प्रकाशित शोध में सामने आई है| अनुमान है कि नुकसान की यह दर आईपीसीसी द्वारा अनुमानित सबसे  खराब परिदृश्यों के अनुरूप है।

शोध से पता चला है कि 2017 में ग्लेशियरों और अन्य जगह पर जमा यह बर्फ 1990 की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा तेजी से पिघल रही है| जहां 1990 में यह 80,000 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से पिघल रही थी वो दर 2017 में बढ़कर 130,000 करोड़ टन प्रति वर्ष हो गई है| गौरतलब है कि दुनिया की 10 फीसदी सतह बर्फ से ढकी है| अनुमान है कि 1994 से 2017 के बीच 28,00,000 करोड़ टन बर्फ पिघल चुकी है| यह बर्फ कितनी ज्यादा है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इस बर्फ से पूरे ब्रिटेन में 100 मीटर मोटी बर्फ की चादर बिछाई जा सकती है|

शोधकर्ताओं का मानना है आधी से ज्यादा बर्फ जो पिघल चुकी है वो बर्फ पर जमा थी, जो सीधे तौर पर समुद्र के जल स्तर में वृद्धि करती है| आंकड़ें दिखाते हैं कि 1994 से 2017 के बीच इतनी बर्फ पिघल चुकी है जिसके चलते समुद्र का जलस्तर 35 मिलीमीटर बढ़ा है| अनुमान है कि इस अवधि में पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियरों से 610,000 करोड़ टन, ग्रीनलैंड से 380,000 करोड़ टन और अंटार्कटिक से 250,000 करोड़ टन बर्फ पिघली थी| 

कहां कितनी और किस दर से पिघल रही है बर्फ

यदि नासा द्वारा जारी आंकड़ों पर गौर करें तो 1994 के बाद से 40,000 करोड़ टन ग्लेशियर प्रति वर्ष ख़त्म हो रहे हैं| इसी तरह ग्रीनलैंड और आइसलैंड में 29,400 करोड़ मीट्रिक टन प्रति वर्ष की दर से बर्फ पिघल रही है| अंटार्कटिका में 12,700 करोड़ मीट्रिक टन बर्फ प्रति वर्ष पिघल रही है, जबकि आर्कटिक में 13.1 फीसदी प्रति दशक की दर से कमी आ रही है| 

वैज्ञानिकों ने इसके लिए अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने को जिम्मेवार माना है| बर्फ के पिघलने को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में 215,000 ग्लेशियरों,  ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में ध्रुवीय बर्फ की चादर, साथ ही अंटार्कटिका और आर्कटिक और दक्षिणी महासागरों में समुद्र पर मौजूद बर्फ की चादर का अध्ययन किया है| वैज्ञानिकों ने बर्फ के इतनी तेजी से पिघलने के लिए बढ़ते तापमान को जिम्मेवार माना है| 1980 के बाद से वातावरण में तापमान 0.26 डिग्री सेल्सियस और समुद्र में  0.12 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है| यही वजह है कि ज्यादातर 68 फीसदी धरती पर मौजूद बर्फ पिघली है जबकि बाकि 32 फीसदी समुद्रों पर जमा बर्फ में कमी आई है| 

क्या होंगे इसके परिणाम

दुनिया भर  में जिस तेजी से यह बर्फ पिघल रही है अनुमान है कि उसके चलते समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा| जिससे तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर बाढ़ का खतरा मंडराने लगेगा| इसके साथ ही वहां के प्राकृतिक आवास ख़त्म हो जाएंगे और वन्य जीवन पर बुरा असर पड़ेगा|

लीड्स विश्वविद्यालय से सम्बन्ध रखने वाले और इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता थॉमस स्लेटर के अनुसार जिस तेजी से यह बर्फ पिघल रही है उसके परिणाम इसी सदी में सारी दुनिया में महसूस किए जाएंगे। बर्फ के पिघलने से समुद्री जलस्तर में जो वृद्धि होगी वो तटों पर रहने वाली आबादी पर बहुत गंभीर असर डालेगी| 

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्री जल स्तर में हर एक सेंटीमीटर की वृद्धि से करीब एक लाख लोग विस्थापित हो जाते हैं| ऐसे में इनका पिघलना एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है| हालांकि ग्लेशियर पृथ्वी पर मौजूद कुल बर्फ का केवल एक फीसदी हिस्सा ही संग्रहित करते हैं| पर इस शोध की अवधि में जितनी बर्फ खोई है उसका एक चौथाई हिस्सा इन ग्लेशियरों का ही था| यह ग्लेशियर करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं| जिनसे पिघलने वाला साफ़ जल कई नदियों को जीवन देता है जो ने केवल लोगों के पीने के पानी बल्कि कृषि सम्बन्धी जरूरतों को भी पूरा करते हैं| ऐसे में इनका खोना अपने आप में ही एक बड़ी समस्या है|