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अनिल अग्रवाल डायलॉग 2020: गर्म होती धरती और समुद्र से आ रही सूखा, बाढ़ की समस्या

राजस्थान के अलवर जिले के नीमली स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरनमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एएईटीआई) में विशेषज्ञों ने जलवायु आपातकाल से जुड़ी घटनाओं पर चर्चा की  

By Manish Chandra Mishra

On: Sunday 09 February 2020
 
Credit: Cse
Credit: Cse Credit: Cse

अनिल अग्रवाल डायलॉग 2020 के पहले दिन पश्चिमी विक्षोभ, असामान्य मौसम, बाढ़ और सूखे का जलवायु परिवर्तन से संबंध पर चर्चा हुई। चर्चा में सूखे के बाद बाढ़, बढ़ती चक्रवात की घटनाएं, खेतों पर टिड्डी दल के हमले जैसी घटनाओं को जलवायु आपातकाल माना। कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने कहा कि इस वक्त जिस भी समस्या पर नजर जाती है, चाहे वह कृषि से संबंधित हो या पलायन हो, हर जगह जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार दिखता है। पहले भी मौसम में असमानता देखी गई है लेकिन हाल के वर्षों में इसका रूप बदल गया है। एक ही स्थान पर बाढ़ और सूखा की घटनाएं हो रही हैं। लोगों पर दोनों स्थितियों का असर लंबे समय तक रहता है और इससे उनकी आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। जलवायु परिवर्तन का एक लक्षण टिड्डी दल का हमला भी है।

इससे पहले अक्टूबर 2018 में दो तरह के चक्रवात से बारिश में बढ़ोतरी हुई थी जिससे ईरान, पाकिस्तान के रास्ते में भारत आकर टिड्डी दल ने हमला कर दिया। बारिश की वजह से टिड्डों को प्रजनन में मदद मिलती है। यह हमला इतना खतरनाक था कि पाकिस्तान ने इसे राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया था। इस साल फिर से ऐसा ही हमला हुआ है।

सबसे चर्चित शब्द क्लाइमेट चेंज
जेएनयू के पर्यावरण विज्ञान स्कूल के प्रोफेसर एपी डिमरी ने कहा कि पिछले 10 वर्ष में क्लाइमें चेंज सबसे अधिक चर्चित रहने वाला शब्द रहा है। इस शब्द की कई बार सही तो कई बार गलत व्याख्या हुई है। पश्चमी विक्षोभ की घटनाएं पृथ्वी के 3 डिग्री तक गर्म होने की वजह से बढ़ी है। इसी वजह से सर्दियों में भी बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं, साथ ही ओलावृष्टि की घटनाएं भी सामने आई हैं। मॉनसून के तंत्र के साथ जब पश्चिमी विक्षोभ का मिलाप होता है तब तेज बारिश की घटना होती है। ऐसी ही एक बारिश की वजह से केदारनाथ जैसी त्रासदी आई थी।

एटमॉस्फेरिक एंड ओशन साइंस एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज, यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड, यूएसए के प्रोफेसर रघु मुर्तुगुड्डे ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सूखा और बारिश दोनों घटनाएं बढ़ी है। इन घटनाओं से दिखता है कि अगर कहीं बारिश अधिक हुई है तो इसका मतलब वहां कहीं का पानी वाष्पीकृत होकर आया है, उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में भीषण सूखा पड़ा तो वहीं के समुद्री तट पर भीषण बारिश हुई। समुद्र की गर्म सतह मॉनसून के बाद चक्रवात की घटनाओं में वृद्धि कर रही है। हिन्द महासागर और अरब सागर की गर्मी की वजह से भारत में नम हवा आती है।

वह कहते हैं कि इस वजह से भीषण बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। बाढ़ की घटनाओं में तीन गुना वृद्धि हुई है। धरती पर पेड़-पौधे लगाकर गर्मी से बचाव तो हो सकता है लेकिन लगातार गर्म होती पृथ्वी को वापस पहले जैसी स्थिति में लाना मुश्किल होगा। मौसम की मार से बचने के लिए इसका सटीक पूर्वानुमान और तैयारी की जरूरत है और अच्छी बात यह है कि भारत अब 6 से 7 दिन पहले भीषण बारिश या चक्रवात का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हो गया है।