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प्राकृतिक गैस से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड उच्चतम स्तर पर

नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2019 में गैस फ़्लेयरिंग बढ़कर 150 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) हो गया। यह 2018 में 145 बीसीएम था।

By DTE Staff

On: Monday 27 July 2020
 
Photo: Pixabay
Photo: Pixabay Photo: Pixabay

गैस निकासी या ईंधन निकासी के दौरान प्राकृतिक गैस का जलना अक्सर हमें दिखाई देता है। ऐसे स्थानों पर दिखाई देने वाली लौ के जरिए लगातार हानिकारक उत्सर्जन जारी रहता है जो वायुमंडलीय प्रदूषण में बड़ी हिस्सेदारी कर रहा है लेकिन हम इस ओर कम ही ध्यान देते हैं। आंकड़ों में देखें तो गैस या ईंधन निष्कर्षण यानी निकासी वाले स्थानों पर प्राकृतिक गैस जलने से प्रत्येक साल 40 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओटू) का उत्सर्जन वायुमंडल में होता है। उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए विश्व बैंक के एक नवीनतम विश्लेषण में कहा गया है कि यह न केवल बढ़ रहा है, बल्कि एक दशक में उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। 
 
नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2019 में गैस फ़्लेयरिंग बढ़कर 150 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) हो गया। यह 2018 में 145 बीसीएम था। नवीनतम आंकड़ों की समझ बनाने के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जलने या बर्बाद होने वाली प्राकृतिक गैस की मात्रा उप-सहारा अफ्रीका की वार्षिक खपत के बराबर है। 
 
वर्ल्ड बैंक के एनर्जी एंड एक्सट्रैक्टिव्स ग्लोबल प्रैक्टिस में प्रैक्टिस मैनेजर क्रिस्टोफर शेल्डन कहते हैं, "हमारा डेटा बताता है कि कुछ देशों में गैस का प्रवाह एक सतत समस्या बनी हुई है, जिसका समाधान अब भी काफी मुश्किल या आर्थिक तौर पर ठीक नहीं है।"
 
आंकड़ों के मुताबिक केवल एक वर्ष में गैस के प्रवाह में 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि तीन देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, वेनेजुएला और रूस के कारण हुई है। अमेरिका ने गैस के प्रवाह में 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो तीनों देशों में सबसे अधिक है और यह समग्र वैश्विक वृद्धि में योगदान करते हैं। वेनेजुएला और रूस ने 2018-19 के दौरान क्रमशः 16 और 9 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की।
 
वहीं, कई देशों में स्थानीय संघर्षों के कारण गैस के प्रवाह में काफी वृद्धि हुई है क्योंकि इस कीमती संसाधन के अपव्यय को रोकने के लिए कोई उचित ध्यान नहीं दिया गया है। उदाहरण के लिए, सीरिया में यह 35 प्रतिशत और वेनेजुएला में 16 प्रतिशत बढ़ा है। विश्व बैंक के अनुसार, सीरिया में तेल उत्पादन स्थिर है, जबकि वेनेजुएला में यह 40 प्रतिशत तक कम हो गया है।
 
क्रिस्टोफर कहते हैं  “वर्तमान में कोविड-19 महामारी ने अतिरिक्त चुनौतियों पेश की हैं। वहीं, स्थिरता और जलवायु चिंताओं  जैसे गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है। हमें नियमित तौर पर होने वाले प्राकृतिक गैस के अपव्यय की इस चिंता की प्रवृत्ति को एक बार सभी के लिए पलट देना चाहिए।"
 
संबंधित सरकारों का एक वैश्विक निकाय, तेल कंपनियां और संस्थाएं, जिन्हें ग्लोबल गैस फ्लेयरिंग रिडक्शन पार्टनरशिप (जीजीएफआर) कहा जाता है, गैस फ़्लेयरिंग की निगरानी करती है और फ़्लेयरिंग और कचरे को कम करने के तरीकों पर काम करती है। 2012 में शक्तिशाली सेंसर के माध्यम से दुनियाभर में गैस के प्रवाह का अनुमान लगाने के लिए एक समर्पित उपग्रह तैनात किया गया था। इन साझेदारों का लक्ष्य 2030 तक प्राकृतिक गैस के प्रवाह संबंधी अपव्यय को शून्य तक पहुंचाना है। 
 
विश्व बैंक द्वारा प्रबंधित जीजीएफआर ट्रस्ट फंड के कार्यक्रम प्रबंधक जुबिन बामजी कहते हैं कि हम जीरो रूटीन फ्लेरिंग के तहत 2030 तक लक्ष्य की पूर्ति के लिए सरकारों और कंपनियों के साझेदारों से अच्छी प्रतिबद्धिता हासिल कर रहे हैं। अभी तक 80 सरकारों और कंपनियों ने साझेदारी की है जो दुनिया के आधे से ज्यादा गैस प्रवाह अपव्यय को खत्म करने व 160 साल पुराने तरीके को खत्म करने के लिए आगे आए हैं। 
 
हालांकि, इससे कुछ आर्थिक रिकवरी भी है। 2020 के वित्त वर्ष की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में, 30 शीर्ष गैस फ्लेयरिंग देशों में 10 प्रतिशत की कमी हुई है। वास्तव में शीर्ष चार गैस फ्लेरिंग देशों - रूस, इराक, अमेरिका और ईरान के बीच 2012-2019 के दौरान 9 बीसीएम से कम हुई है।