पिछले 35 वर्षों से वर्षावन के पेड़ों की मृत्यु दर दोगुनी हो गई है: अध्ययन

जैसे-जैसे वातावरण गर्म होता है, यह पौधों से अधिक नमी खींचता है, जिसके परिणामस्वरूप पेड़ों में पानी का दबाव बढ़ जाता है और अंततः मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।

By Dayanidhi

On: Thursday 19 May 2022
 
पिछले 35 वर्षों से वर्षावन के पेड़ों की मृत्यु दर दोगुनी हो गई है: अध्ययन

इस बार देश के कई हिस्सों में पारा 49 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक को पार कर गया है। गर्मी से बचने के लिए हम पेड़ों की छाया ढूढ़ते हैं। साथ ही वातावरण के कार्बन को अवशोषित कर ये बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन बेहताशा बढ़ती ग्रीनहाउस गैस को अवशोषित करना पेड़ों को भारी पड़ रहा है। इस सबके चलते तापमान में भारी बढ़ोतरी हो रही है, जिसकी वजह से पेड़ मरते जा रहे हैं।

अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि वर्षा वनों में उष्णकटिबंधीय वन 1980 के दशक से पिछली दर की तुलना में दोगुनी दर से मर रहे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु के प्रभावों के कारण ऐसा हो रहा है। एक लंबे समय तक किए गए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के निष्कर्षों में इस बात का खुलासा किया गया है। शोध से पता चला है कि पिछले 35 वर्षों में उष्णकटिबंधीय पेड़ों की मृत्यु दर दोगुनी हो गई है, क्योंकि बढ़ते तापमान के चलते इनके सूखने की दर बढ़ गई है।

इस तरह के जंगलों के नष्ट होने से बायोमास और कार्बन भंडारण कम हो जाता है, जिससे वैश्विक तापमान के लक्ष्य को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना मुश्किल हो जाता है, जैसा कि पेरिस समझौते में सुझाया गया था।

स्मिथसोनियन एनवायर्नमेंटल रिसर्च सेंटर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं और फ्रेंच नेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया कि अध्ययन में वर्षा वनों से संबंधित लंबे समय के आंकड़ों के रिकॉर्ड का उपयोग किया गया है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि इन जंगलों में पेड़ों की औसत मृत्यु दर पिछले चार दशकों में दोगुनी हो गई है। उन्होंने पाया कि लगभग आधे पेड़ लंबे समय तक जीवित रहते हैं, जो पूरे क्षेत्र में प्रजातियों और जगहों के अनुरूप एक पैटर्न बनाते है। शोध टीम ने बताया कि इस तरह के प्रभाव 1980 के दशक से देखे जा सकते हैं।

स्मिथसोनियन, ऑक्सफोर्ड और आईआरडी में एक उष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकीविद् और अध्ययनकर्ता डॉ. डेविड बाउमन कहते हैं कि पेड़ों की मृत्यु दर के इस तरह की उल्लेखनीय वृद्धि का पता लगना एक तरह का सदमा था। मृत्यु दर के लगातार दोगुने होने का मतलब होगा कि पेड़ों में जमा कार्बन वातावरण में दोगुना तेजी से लौट जाएगी।

स्मिथसोनियन के शोध वैज्ञानिक और अध्ययनकर्ता डॉ शॉन मैकमोहन कहते हैं कि लंबे समय तक जीवित रहने वाले जीवों में होने वाले बदलावों का पता लगाने के लिए कई दशकों के आंकड़ों की आवश्यकता होती है, जिनसे बदलावों के संकेत को समझा जा सकता है।

बाउमन और मैकमोहन कहते हैं कि इस अध्ययन के माध्यम से न केवल हम मृत्यु दर में वृद्धि का पता लगाते हैं, बल्कि यह वृद्धि 1980 के दशक से शुरू हुई  है, जो यह दर्शाता है कि पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणालियां बदलती जलवायु के प्रति प्रतिक्रिया कर रही हैं।

ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर तथा अध्ययनकर्ता यदविंदर मल्ही कहते हैं कि हाल के वर्षों में ग्रेट बैरियर रीफ के मूंगों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को सभी जानते  हैं।

हमारे अध्ययन से पता चलता है कि यदि आप रीफ से किनारे की ओर देखते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध वर्षावन भी तेजी से बदल रहे हैं। इसके अलावा, हम इनको बदलने वाले संभावित कारणों की पहचान करते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण वातावरण की बढ़ती सुखाने की शक्ति, पेड़ की मृत्यु दर में समान रूप से वृद्धि कर रही है, जो दुनिया के उष्णकटिबंधीय जंगलों में अक्सर होता है। अगर ऐसा है, तो उष्णकटिबंधीय वन जल्द ही कार्बन स्रोत बन सकते हैं और तब ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करने की चुनौती और कठिन हो सकती है।

जेम्स कुक विश्वविद्यालय में उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी के प्रोफेसर सुसान लॉरेंस कहते हैं कि इस तरह के लंबे समय के डेटासेट बहुत दुर्लभ हैं और जलवायु परिवर्तन के मुकाबले के लिए पेड़ों में आने वाले बदलावों का अध्ययन करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्षावन के पेड़ लंबे जीवन जीने के लिए जाने जाते हैं, इनकी मृत्यु हमेशा तत्काल नहीं होती है।

अमेजोनिया में हाल के अध्ययनों ने यह भी सुझाव दिया है कि उष्णकटिबंधीय पेड़ की मृत्यु दर बढ़ रही है, इस तरह कार्बन सिंक या अवशोषण कमजोर हो रहा है। लेकिन इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं।

बरकरार उष्णकटिबंधीय वर्षावन कार्बन के प्रमुख भंडार हैं और अब तक कार्बन का अवशोषण रहे हैं। पेड़ लोगों की भलाई के लिए कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लगभग 12 फीसदी तक अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन की दर पर लगाम लगाने का काम करते हैं।

अधिक मृत्यु दर वाले पेड़ों की प्रजातियों की जलवायु श्रेणियों की जांच करते हुए, टीम ने कहा कि मुख्य रूप से गर्म होती जलवायु वातावरण की बढ़ती सुखाने की शक्ति के लिए जिम्मेवार है। जैसे-जैसे वातावरण गर्म होता है, यह पौधों से अधिक नमी खींचता है, जिसके परिणामस्वरूप पेड़ों में पानी का दबाव बढ़ जाता है और अंततः मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।

शोधकर्ताओं ने जब संख्याओं के बारे में पता लगाया कि पिछले दशकों में पेड़ों के इस मृत्यु दर में वृद्धि से बायोमास का नुकसान, पेड़ के विकास और नए पेड़ों के उगने के माध्यम से उनकी भरपाई नहीं हुई है। इसका तात्पर्य है कि मृत्यु दर में वृद्धि ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए इन वनों की क्षमता में भारी कमी की है। यह अध्ययन नेचर नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

Subscribe to our daily hindi newsletter