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तपता हिमालय: हिल स्टेशनों में भी चलाने पड़ते हैं एसी-कूलर

हिमालयी राज्यों में लगातार बढ़ती गर्मी ने स्थानीय लोगों का मिजाज ही बदल दिया है। गर्म होते हिमालयी राज्यों की खास रिपोर्ट की चौथी कड़ी-

By Raju Sajwan, Akshit Sangomla, Manmeet Singh, Rohit Prashar, Rayies Altaf

On: Tuesday 06 April 2021
 
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के एक सरकारी भवन में लगे एयरकंडीशनर। फोटो: रोहित पराशर
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के एक सरकारी भवन में लगे एयरकंडीशनर। फोटो: रोहित पराशर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के एक सरकारी भवन में लगे एयरकंडीशनर। फोटो: रोहित पराशर

इतिहास का दूसरा सबसे गर्म वर्ष 2020 रहा, लेकिन 2021 के शुरुआती तीन महीने रिकॉर्ड के नए संकेत दे रहे हैं। खासकर भारत के लिए ये तीन महीने खासे चौंकाने वाले हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि भारत के मौसम के लिए बेहद अहम एवं संवेदनशील माने जाने वाले हिमालय से मिल रहे संकेत अच्छे नहीं हैं। पिछले तीन माह के दौरान हिमालयी राज्यों में बढ़ती गर्मी और बारिश न होने के कारण वहां के लोग चिंतित हैं। डाउन टू अर्थ ने पांच हिमालयी राज्यों के लोगों के साथ-साथ विशेषज्ञों से बात की और रिपोर्ट्स की एक ऋंखला तैयार की। पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे हिमालयी राज्यों में मार्च में ही लू के हालात बन गए। दूसरी कड़ी में आपने पढ़ा कि जनवरी-फरवरी में कई हिमालयी राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी। अगली कड़ी में आपने पढ़ा, तपते हिमालय से पर्यटन और कृषि को हो रहा है नुकसान । पढ़ें, आगे की कड़ी-  

 

 

गर्मी के आदी न होने के कारण पहाड़ी लोगों की दिक्कतें बढ़ गई हैं “मुझे याद है कि लगभग 40 साल पहले तक बर्फ की वजह से हम घर से बाहर नहीं निकल पाते थे। सर्दियों का मौसम शुरू होते ही परिवार वाले पहले ही खाने-पीने का सामान घर के अंदर रख लेते थे। जंगल से लकड़ी लेकर घर के अंदर रख लेते थे। जानवर भी बाहर नहीं रखते थे। लेकिन धीरे-धीरे बर्फ पड़नी कम हुई और अब तो कई साल से बर्फ के दर्शन ही नहीं हुए। अब तो ज्येष्ठ के महीने में इतनी गर्मी पड़ती है कि पंखे के बिना नहीं रहा जाता। मौसम के साथ बहुत कुछ बदल गया।”

70 वर्षीय कमल सिंह महर अपनी पोती की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इसे तो लगता है कि बर्फ गिरने की बात मेरी कपोल कल्पना है। कमल सिंह उत्तराखंड के नई टिहरी जिले के कस्बे बौराड़ी में रहते हैं, जो समुद्र तल से लगभग 1,500 मीटर की ऊंचाई पर है। उनकी पोती महक महर 18 साल की हैं। वह कहती हैं,“जब दादा जी बताते हैं कि कुछ साल पहले तक हमारा यह सारा इलाका बर्फ से ढका रहता था तो विश्वास ही नहीं होता। बहुत मन करता है कि मैं भी बर्फ से खेलूं, लेकिन अब कभी बर्फ नहीं पड़ती।”

इसी कस्बे से थोड़ी दूरी पर बसी नई टिहरी को कुछ साल पहले ही बसाया गया था। इस शहर को बसाने का काम टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट लिमिटेड (टीएचडीसी) ने किया था। टीएचडीसी के अधिकारी बताते हैं कि परियोजना के कारण पुराना शहर डूब गया था और वहां के लोगों को बसाने के लिए नए शहर का निर्माण 2,000 मीटर की ऊंचाई पर किया गया। इतनी ऊंचाई पर न तो कभी पंखे चलते थे और एसी तो दूर की बात थी। लिहाजा, नई टिहरी में किसी भी सरकारी कार्यालय या आवासीय परियोजना के भवन में पंखों के लिए हुक नहीं लगाया गया। लेकिन अब लोग अपनी छतों को ड्रिल कर पंखे लगा रहे हैं। टिहरी से कुछ ही किलोमीटर पहले कीर्ति नगर के पास 1,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है मगरों गांव।

यहां के रहने वाले यशपाल सिंह नेगी बताते हैं कि कुछ साल पहले तक उनके गांव में जल धाराएं और झरने हुआ करते थे, लेकिन अब ये सूख चुके हैं और 2019 में तो हालात इतने गंभीर हो गए कि गर्मी शुरू होते ही पानी के टैंकर मंगाने पड़े। नैनीताल के 70 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन शाह बताते हैं कि आज से 30 साल पहले तक मई और जून में भी कोट और स्वेटर पहने जाते थे। सर्दियों का यह हाल था कि जिला प्रशासन को पेयजल लाइनों की पाइपों पर एक विशेष प्रकार की घास लगानी पड़ती थी। दरअसल, उस समय सर्दियों में पानी की पाइपलाइन जम जाती थी। कई जगह बड़ी पाइपों के नीचे आग जलाई जाती थी। लेकिन अब तो कई होटलों में एयरकंडिशन लग चुके हैं।

गढ़वाल के इतिहासकार और शोधकर्ता महिपाल नेगी बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर पक्षियों और वनस्पति पर भी पड़ा है। उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल काफी ऊंचाई वाले इलाकों में रहता है। लेकिन वह सर्दियों में 1,000 मीटर तक भी आ जाता था क्योंकि यहां भी उसे बर्फ मिल जाती थी। लेकिन पिछले 40 सालों में वह 2,000 मीटर से नीचे नहीं देखा गया है। उसी तरह उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में देवदार होता है और निचले इलाकों में चीड़ का जंगल पाया जाता है। अब चीड़ 2,500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों तक पहुंच गया है क्योंकि उसे गर्माहट मिलने लगी है।

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) के ताजा शोध में पता चला कि हिमालयी बेसिन और मध्य हिमालय में तापमान में वृद्धि हो रही है। इस कारण गर्म मौसम में रहने वाले जानवर ऊंचाई वाले स्थानों तक पहुंच गए हैं और वहां स्थायी हो गए हैं। डब्ल्यूआईआई के निदेशक वीबी माथुर बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से जंगली जानवरों के व्यवहार में बदलाव हो रहा है। मसलन, जो लंगूर गर्म इलाकों में रहते थे, वो अब लेह लद्दाख के साथ ही केदारनाथ में दिखने लगे हैं। यहां तक कि कई जगह तो 4,876 मीटर या 16 हजार फीट तक भी दिखा है। इसी तरह कई जंतु हैं, जो पहले निचले इलाकों में ही पाए जाते हैं। उनमें से कुछ अब ऊंचाई वाले इलाकों में पहुंच चुके हैं। डब्ल्यूआईआई के लगभग 50 वैज्ञानिक 10 जानवरों और जंतुओं पर सघन निगाह रखे हुए हैं।

2020 में प्लस वन जर्नल में छपे शोध में भारत, कनाडा और जापान के वैज्ञानिकों ने पाया कि जलवायु परिवर्तन और मौसम में आ रहे बदलावों की वजह से सेब बागवानी बड़ी तीव्र गति से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रही है। शोध के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में जहां 1980 के दशक में सेब बागवानी 1,200 से 1,500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होती थी, वो वर्ष 2000 तक 1,500 से 2,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों और वर्ष 2014 तक 3,500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंच गई।

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर पर भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। कश्मीर घाटी पिछले एक दशक से मौसम और तापमान में साफ बदलाव देख रही है। तापमान में बदलाव का अर्थ अधिकतम तापमान से है। गर्मी के मौसम में तो कश्मीर में झुलसा देने वाली गर्मी पड़ने लगी है। हर साल पिछले सालों के मुकाबले अधिकतम तापमान का रिकॉर्ड टूट रहा है।

बढ़ते तापमान की वजह से कश्मीर घाटी में कई नई बीमारियां भी पनप गई हैं, जिनके बारे में स्थानीय लोगों ने सुना भी नहीं था। जैसे, एनोफेलीज मच्छर उन इलाकों में पाया जाता है, जहां गर्म तापमान और उमस भरा मौसम होता है। मच्छरों की वजह से डेंगू और मलेरिया जैसे बीमारियां होती हैं। ये बीमारियां अब कश्मीर घाटी में भी होने लगी हैं। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के सरकारी अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसन स्पेशलिस्ट फिरोज अहमद वानी कहते हैं कि कश्मीर जैसे तापमान वाले इलाके में एनोफेलीज मच्छरों का मिलना एक बड़ी चेतावनी है।

श्रीनगर में रह रहे 63 वर्षीय पीराजादा शबीर अहमद बताते हैं, “जब मैं छोटा था, तब कश्मीर में इतनी गर्मी नहीं पड़ती थी। हमें कभी पंखों की जरूरत महसूस नहीं हुई, लेकिन अब कूलर या एसी हमारी जरूरत बनते जा रहे हैं। मैं भी इस साल एसी लगवाने की सोच रहा हूं।” दक्षिणी कश्मीर के काजीगुंड इलाके में इलेक्ट्रॉनिक्स सामान बेचने वाले अताउला खान ने तीन साल के दौरान सैकड़ों हाईटेक कूलर और एसी बेचे हैं। उनका कहना है कि हर साल कूलर और एसी की मांग बढ़ती जा रही है। हालांकि एसी की कीमत अधिक होने के कारण लोग कूलर खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं। वर्ष 2020 में कश्मीर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा की गई स्टडी बताती है कि इस सदी के अंत तक जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के तापमान में 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शकील रामशू इस स्टडी के मुख्य लेखक हैं। वह कहते हैं कि आंकड़े साफ-साफ बताते हैं कि घाटी में तापमान बढ़ रहा है। यहां तक कि गुलमर्ग और पहलगाम में भी गर्मी बढ़ी है।

कश्मीर विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन के विषय पर अध्ययन कर चुकी दुर्दाना मट्टू कहती हैं कि कश्मीर में सर्दियों के दिन कम होने लगे हैं और पिछले सालों के मुकाबले सर्दी भी कम लगती है। बसंत का मौसम जल्द आ जाता है और गर्मियों के दिन बढ़ गए हैं। बढ़ते तापमान की वजह से जहां लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। वहीं स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद सरकार की ओर से कोई ठोस कार्ययोजना पर काम होता नहीं दिख रहा है।

हिमाचल के लाहौल-स्पीति जिले के एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के लोगों से डाउन टू अर्थ ने बात की। लाहौल के नालडा गांव के लेगी परिवार के 80 वर्षीय बुजुर्ग जयराम बताते हैं कि कभी उनके गांव में 7-8 फीट तक बर्फ पड़ती थी, पिछले कुछ सालों से बर्फबारी बहुत कम हो गई। वहीं 48 वर्षीय हरबंस लाल बताते हैं कि बर्फबारी की वजह से कई रास्ते बंद हो जाते थे, लेकिन अब 12 महीने रास्ते खुले रहते हैं। तीसरी पीढ़ी की 24 वर्षीय रुचि बताती हैं कि अब तो हमारे गांव में भी गर्मी पड़ने लगी है और गर्मी के मौसम में हम लोग भी मैदानी इलाकों की तरह फ्रिज का इस्तेमाल करने लगे हैं। शिमला में एसी के शोरूम के मालिक विक्रम नंदा का कहना है कि अब शिमला में भी गर्मियां बढ़ने लगी हैं, इसलिए यहां भी लोग एसी खरीदने लगे हैं।

कल पढ़ें, आगे की कड़ी-