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गर्मीं के कारण होने वाली 37 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेवार है तापमान में हो रही वृद्धि

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जिस तरह वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, उसके चलते भीषण गर्मी से मरने वालों का यह आंकड़ा समय के साथ और बढ़ता जाएगा

By Lalit Maurya

On: Tuesday 01 June 2021
 

1991 से 2018 के बीच दुनिया भर में गर्मीं के कारण हुई करीब 37 फीसदी मौतों के लिए वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि जिम्मेवार थी। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और बर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है।

उन्होंने दुनिया भर के 43 देशों में 732 स्थानों के आंकड़ों का अध्ययन किया, जिन्हें महामारी और जलवायु मॉडलिंग के क्षेत्र की प्रमुख परियोजनाओं से लिया गया था। यह ऐसा पहला शोध है गर्मी के कारण बढ़ने वाली मृत्यु दर में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को स्पष्ट करता है। इस शोध में 1991 से 2018 के बीच गर्मी के कारण होने वाली मौतों का अध्ययन किया गया है।

अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में छपे इस शोध में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर गर्मी के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा स्थान के आधार पर कहीं कम कहीं ज्यादा था, जोकि 20 से 76 फीसदी तक पाया गया था। शोध के अनुसार सबसे ज्यादा मौतें दक्षिण अमेरिका के इक्वाडोर और कोलंबिया में रिकॉर्ड की गई थी जहां जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी के चलते 76 फीसदी तक मौतें हुई थी वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया में यह 48 से 61 फीसदी के बीच रही थी।

साथ ही दक्षिण-पश्चिम एशिया में ईरान और कुवैत, पूर्वी एशिया में फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों में गर्मी के कारण होने वाली 50 फीसदी से ज्यादा मौतों के लिए तापमान में हो रही वृद्धि जिम्मेवार थी।

वहीं यदि कुछ प्रमुख शहरों से जुड़े आंकड़ों को देखें तो सैंटियागो डी चिली में इसके चलते हर वर्ष 136 मौतें हुई थी, जोकि शहर में गर्मी के कारण होने वाली कुल मौतों का करीब 44.3 फीसदी है। एथेंस में 189 मौतें (26.1 फीसदी), रोम में 172 (32 फीसदी), टोक्यो में 156 (35.6 फीसदी), मैड्रिड में 177 (31.9 फीसदी), बैंकॉक में 146 (53.4 फीसदी), लंदन में 82 (33.6 फीसदी), न्यूयॉर्क में 141 (44.2 फीसदी) और हो ची मिन्ह सिटी में जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पन्न हुई गर्मी की विषम परिस्थितियों से 137 मौतें हुई थी, जोकि औसतन हर वर्ष गर्मी से हुई कुल मौतों का करीब 48.5 फीसदी है।

तापमान बढ़ने के साथ और बढ़ता जाएगा गर्मी का कहर

शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसा नहीं है कि तापमान में हो रही इस वृद्धि का परिणाम केवल मृत्यु के रूप में ही सामने आ रहा है। बढ़ती गर्मी का असर स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है, इसके चलते ह्रदय और सांस सम्बन्धी बीमारियों का जोखिम और बढ़ जाता है जिसके कारण अस्पताल में भर्ती तक होना पड़ता है। यह समस्याएं आम तौर पर कहीं ज्यादा सामने आती हैं, जिसका असर स्वास्थ्य सम्बन्धी खर्च पर पड़ता है।

इस विश्लेषण में पूरे विश्व को कवर नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए इसमें अफ्रीका और दक्षिण एशिया के बड़े हिस्सों को आंकड़ों की कमी के चलते शामिल नहीं किया गया है। हालांकि अफ्रीका और दक्षिण एशिया में इसके खतरे को नकारा नहीं जा सकता। दुनिया की करीब एक चौथाई आबादी दक्षिण एशिया में रहती है। जिसके लिए बढ़ता तापमान एक बड़ा खतरा है। इस क्षेत्र में पहले ही काफी ज्यादा गर्मी पड़ती है साथ ही मौसम नम रहता है। लोग गरीब हैं, इस वजह से एयर कंडीशन उनकी पहुंच से बाहर है।

लोग घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहते हैं और करीब 60 फीसदी लोग कृषि कार्यों में लगे हुए हैं। ऐसे में उनका घर में रहकर तो गुजरा होगा नहीं उन्हें अपने परिवार का पेट भरने के लिए खुले में काम करना ही होगा, जो उनपर लू के जोखिम को और बढ़ा देता है। गौरतलब है 2015 में भारत और पाकिस्तान में लू के चलते करीब 3,500 लोगों की जान गई थी।

हाल ही में लू और जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध पर किए एक अन्य शोध से पता चला था कि भविष्य में तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ ही लोगों के इसकी चपेट में आने का जोखिम भी 2.7 गुना बढ़ जाएगा। ऐसे में भारत जैसे देश जो पहले ही तापमान बढ़ने का कहर झेल रहे हैं वहां लू का आना आम हो जाएगा

इस शोध की प्रमुख शोधकर्ता एना एम विसेडो-कैब्रेरा के अनुसार जिस तरह से वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है यदि उसे रोकने और जलवायु अनुकूलन के लिए कुछ नहीं किया गया तो गर्मी से होने वाली मौतों का अनुपात समय के साथ बढ़ता जाएगा। अब तक वैश्विक तापमान में औसतन 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। ऐसे में यदि उत्सर्जन इसी तरह अनियंत्रित तरीके से बढ़ता रहा तो भविष्य में इसका प्रभाव कहीं ज्यादा होगा।

जब सारी दुनिया में लोग बढ़ती गर्मी का शिकार बन रहे हैं, तो यह जरुरी हो जाता है कि तापमान में हो रही इस वृद्धि को रोकने के लिए बढ़ते उत्सर्जन पर लगाम लगाई जाए। साथ ही जलवायु में आ रहे बदलावों के चलते स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने के लिए बेहतर नीतियां बनाई जाए। इसके लिए जलवायु अनुकूलन और शमन सम्बन्धी रणनीतियों पर तत्काल ध्यान दिया जाना जरुरी है। जलवायु परिवर्तन एक ऐसे समस्या है जिसे हल करने के लिए समस्त विश्व को साथ मिलकर काम करना होगा।