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मसूरी में बनेगा हिमालयन ड्राफ्ट, जानें क्या होंगी खास बातें 

जून में साइंस एडवांसेस रिसर्ज जनरल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक यदि इसी रफ्तार से हिमालयी ग्लेशियर पिघलते रहे तो समूचे एशिया में जल संकट तेजी से बढ़ेगा

By Varsha Singh

On: Monday 22 July 2019
 
Photo: Varsha Singh
Photo: Varsha Singh Photo: Varsha Singh

 ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हिमालयी ग्लेशियर्स वर्ष 2000 से 2016 के बीच तेजी से पिघल रहे हैं। वर्ष 1975 से 2000 के बीच जितनी बर्फ़ पिघली,उसकी दोगुनी मात्रा में बर्फ इस सदी की शुरुआत से अब तक पिघल चुकी है। हिमालयी ग्लेशियर्श पर 40 वर्षों के अंतराल में आए बदलाव को लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय से जुड़े जोशुआ मॉरर ने अध्ययन किया। जून महीने में ये अध्ययन साइंस एडवांसेस रिसर्ज जनरल में प्रकाशित हुआ। यदि इसी रफ्तार से हिमालयी ग्लेशियर पिघलते रहे तो समूचे एशिया में जल संकट तेजी से बढ़ेगा।

इस अध्ययन को देखते हुए और भविष्य के खतरे पर नजर रखते हुए, ये समय हिमालयी राज्यों के लिए ऐसी नीतियां बनाने और लागू करने का है जिससे हिमालयी पर्यावरण का संरक्षण किया जा सके। हिमालयी राज्यों के लिए किस तरह की नीतियां होनी चाहिए, ग्लोबल वॉर्मिंग से हिमालय के इको सिस्टम को कैसे बचाया जाना चाहिए, हिमालयी इकोलॉजी की रक्षा के साथ ही विकास का लाभ यहां के लोगों तक कैसे पहुंचाया जाए, क्या हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस मिलना चाहिए, ये कुछ सवाल हैं जिस पर 28 जुलाई को मसूरी में हो रहे हिमालयन कॉन्क्लेव में मंथन किया जाएगा।

उत्तराखंड में पहली बार हिमालयन कॉन्क्लेव का आयोजन किया जा रहा है। पिछले वर्ष हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में हिमालयी राज्य के प्रतिनिधि मिले थे। इस वर्ष हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री, अधिकारी और विशेषज्ञ  हिमालय के संरक्षण पर मंथन करेंगे। उत्तराखण्ड के साथ जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, आसाम, अरूणाचलप्रदेश, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, मिजोरम और मणिपुर राज्यों के प्रतिनिधि कॉन्क्लेव में शामिल होंगे। नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार के भी इस कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना है। कार्यक्रम का मकसद है हिमालयन ड्राफ्ट तैयार करना। जिसे नीति आयोग को सौंपा जाएगा। ताकि पर्वतीय राज्यों की मुश्किलों, संवेदनशीलता को देखते हुए विकास का रोडमैप तैयार किया जा सके।

चंडीगढ़ में डॉयलॉग हाईवे ट्रस्ट के देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि इस समय में हमें हिमालय इको सिस्टम सर्विसेज का आंकलन करना चाहिए ताकि हम हिमालय के इको सिस्टम सर्विस को समझ पाएं। आसान भाषा में समझाने के लिए वे कहते हैं कि उदाहरण के तौर पर यदि कोई पहाड़ काटकर 200 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट लगाया जा रहा है, तो पहले हमें उस पहाड़ का मूल्यांकन करना चाहिए। संभव है कि उस पहाड़ का मूल्य 400 करोड़ हो, जिसे आपने 200 करोड़ के लिए काट दिया, तो ये नुकसान का सौदा हुआ।

देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि उत्तराखंड पूरे देश को पानी देता है तो इको सिस्टम सर्विसेज़ के तहत उत्तराखंड को उस पानी का रॉयल्टी देना चाहिए। ये रॉयल्टी पर्वतीय क्षेत्रों में रह रहे लोगों तक पहुंचनी चाहिए। क्योंकि यहां जो नदियां बह रही हैं, उन नदियों से वहां रहने वाले लोग सीधे तौर पर जुड़े हैं, इन नदियों को बचाये रखने में इन समुदायों के योगदान का आंकलन करना चाहिए। तभी हम पलायन जैसी समस्या से भी निपट पाएंगे। इसलिए जरूरी है कि पर्वतीय राज्यों के लोगों को इको सिस्टम सर्विसेज के तहत लाभान्वित करें। इस तरह हम स्थानीय समस्याओं से भी निपटेंगे और वैश्विक चिंताओं को भी दूर कर सकेंगे।

जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन इनवायरमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के डायरेक्टर डॉ डीएस रावल कहते हैं कि हिमालयन कॉन्क्लेव में जो भी नीति तैयार की जाए, उसमें हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता का ध्यान जरूर रखा जाए। डॉ रावल कहते हैं कि जब हम विकास की बात करते हें तो पर्यावरण और इकोलॉजी की बात दबकर रह जाती है। वे भी हिमालय की सर्विसेज़ के आंकलन और हिमालयी राज्यों को प्रोत्साहन राशि देने की बात कहते हैं। जिससे मैदानी क्षेत्रों को स्वच्छ हवा-पानी मिलता है।

हिमालयन ड्राफ्ट को लेकर हेस्को संस्था के अनिल जोशी कहते हैं कि जब तक हम गांव आधारित नीति नहीं बनाते हम उस क्षेत्र का विकास नहीं कर सकते। वे कहते हैं कि हिमालय को बचाने कौन आ रहा है, कम्यूनिटी। अनिल जोशी कहते हैं कि गांव की दृष्टि कभी हमारी नीतियों में शामिल नहीं होती। हिमालयी क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई योजना ही हिमालयी क्षेत्र का विकास कर सकेगी।

इस कॉनक्लेव को लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि मसूरी में जो चर्चा होगी, वो भविष्य में हिमालयी राज्यों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने में मददगार साबित होगी। इससे नीति आयोग और वित्त आयोग को हिमालयी राज्यों की वास्तविक स्थिति को जानने में आसानी रहेगी।

उनके मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल स्त्रोत हिमालय और यहां की जीवनदायिनी नदियों पर संकट मंडरा रहा है। हिमालयी इकोलॉजी की रक्षा के साथ कैसे विकास का लाभ यहां के लोगों तक पहुंचाया जा सकता है, ये कान्क्लेव का मुख्य एजेंडा रहेगा। साथ ही ये भी समझने की कोशिश की जाएगी कि हिमालय के संसाधनों का उपयोग कैसे यहां की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने करने में किया जा सकता है ताकि यहां के युवाओं को रोजगार के लिए पलायन न करना पड़े। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलशक्ति मंत्रालय बनाकर जल संरक्षण व जल संवर्धन की बड़ी पहल की है। इसमें हिमालयी राज्यों की सहभागिता बहुत जरूरी है। इसके साथ ही ग्लेशियरों,  नदियों,  झीलों, तालाबों  व वनों को ग्लोबल वार्मिंग से बचाना भी कान्क्लेव का मुख्य एजेंडा होगा। हिमालयी राज्यों में सतत विकास की कार्ययोजना भी तैयार की जाएगी।