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3 करोड़ साल पहले पृथ्वी की जलवायु पर कार्बन डाइऑक्साइड का प्रभाव किस तरह पड़ा: अध्ययन

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि गर्म पृथ्वी पर वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक हो सकता है

By Dayanidhi

On: Wednesday 09 September 2020
 
शोधकर्ताओं ने 3 करोड़ साल पहले के जलवायु का असर जानने की कोशिश की है। फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स
शोधकर्ताओं ने 3 करोड़ साल पहले के जलवायु का असर जानने की कोशिश की है। फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स शोधकर्ताओं ने 3 करोड़ साल पहले के जलवायु का असर जानने की कोशिश की है। फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स

किसी समस्या के निपटारे के लिए उसके मूल में जाना जरूरी है। उसी तरह आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग के बारे में बेहतर अनुमान लगाने का एक तरीका, अतीत में जलवायु परिवर्तन किस तरह हुआ था इसके बारे में जानना है।

अतीत में हुए जलवायु परिवर्तन को जानने के लिए एक नया शोध किया गया है। इस शोध में साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय सहित जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने भाग लिया है। शोधकर्ताओं ने 3 करोड़ साल पहले, जब वैश्विक तापमान वर्तमान की तुलना में 14 डिग्री सेल्सियस अधिक था, ईओसीन युग के दौरान जलवायु पर करीब से नज़र डाली है। यह शोध नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ है।

उन्होंने अनुमान लगाया कि गर्म पृथ्वी पर वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक हो सकता है।

इओसीन युग 3.4 से 5.6 करोड़ वर्ष के पहले का समय था। हालांकि पूरे इओसीन युग में, जलवायु ठंडी हो गई थी और इस युग में अंटार्कटिका के हिमनद के साथ हमारे वर्तमान के अनुभव एक जैसे रहे होंगे।

तब तक यह स्पष्ट नहीं था कि इस अवधि के दौरान जलवायु और सीओ2 एक-दूसरे से कैसे संबंधित थे। हाल के जलवायु मॉडल अध्ययनों ने बताया है कि गर्म जलवायु ठंडी जलवायु की तुलना में सीओ 2 परिवर्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील है। यह हमारे भविष्य की जलवायु के लिए  महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि सीओ2 बढ़ती है तो पृथ्वी लगातार गर्म होती है। इस नए अध्ययन में, जर्मनी, कीएल में ओशन रिसर्च गेओमार हेल्महोल्त्ज़ सेंटर, और साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा पहली बार बड़े पैमाने पर परीक्षण किया गया है।

सतह के पानी की अम्लता (पीएच) और महासागर में कैल्साइट की अधिकता के अनुमानों से, शोधकर्ताओं ने गणना की कि कैसे वायुमंडलीय सीओ 2 ईओसीन युग में बढ़ी। इस्तेमाल किए गए आंकड़े इओसीन युग के दौरान समुद्री तट पर जमा प्राचीन समुद्री प्लवक के जीवाश्म बोरान के समस्थानिक संरचना का अध्ययन करके प्राप्त किया गया था।

सीओ2 का नया रिकॉर्ड ईओसीन जलवायु विकास का एक नया और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। और सीओ 2 स्तर और गर्म जलवायु के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में सबूत देता है। यह बताता है कि ज्वालामुखीवाद, चट्टानों का नष्ट होना और कार्बनिक पदार्थों के दफन होने से सीओ 2 की प्राकृतिक मात्रा में वृद्धि हुई जिसने जलवायु को प्रभावित किया। इस नए सीओ 2 के रिकॉर्ड की तुलना करके इस बात की जानकारी दी गई है कि जलवायु को किस तरह से ठंडा किया जा सकता है, इस बात का भी पता चलता है कि जब इओसीन युग के शुरुआती हिस्सों में जलवायु गर्म थी, तब पृथ्वी सीओ 2 के परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील थी।

शोधकर्ता ने बताया की स्कूल ऑफ ओशन एंड अर्थ साइंसेज में जियोकेमिस्ट्री ग्रुप में रखे गए मास स्पेक्ट्रोमीटर और क्लीन लैब का उपयोग करके यह काम किया गया था। इसे विश्व के अग्रणी किट के उपयोग करके किया गया है, जिसमें आवश्यक सटीकता के लिए फोरामिनिफेरा में बोरान की बहुत कम मात्रा को भी माप सकते हैं। फोरामिनिफेरा एकल-कोशिका वाले जीव हैं।

डॉ. बबिला ने कहा अब जब हमने यह प्रदर्शित किया है कि गर्म होने पर जलवायु अधिक संवेदनशील हो जाती है। जैसे कि यह इओसीन युग के दौरान थी, ऐसा क्यों है और यह सुनिश्चित करें कि इस तरह का व्यवहार जलवायु मॉडल में अच्छी तरह से दर्शाया गया है, जो हमारी भावी जलवायु के अनुमान लगाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

साउथेम्प्टन में महासागर और पृथ्वी विज्ञान में आइसोटोप जियोकेमिस्ट्री के प्रोफेसर गाविन फोस्टर ने कहा ये विधियां वास्तव में हमें एक अद्वितीय जानकारी प्राप्त करने में सहायता करती हैं कि कैसे अतीत में जलवायु प्रणाली बदली, और क्यों बदली। वास्तव में, यह अतीत में वायुमंडलीय सीओ 2 को सटीक रूप से फिर से संगठित करने की क्षमता है, जिसका अर्थ है कि हम लाखों साल पहले जलवायु संवेदनशीलता का निर्धारण कर सकते हैं।