हम अपने शहरों, घरों का निर्माण किस तरह करें कि गर्मी का असर कम से कम हो

सीएसई के मुताबिक गर्मियों के दौरान उत्तरी मैदानी इलाकों के शहर रात में ठंडे हो जाते थे, लेकिन आजकल यहां भी रातों में गर्मी रह जाती है, जो यहां रहने वाले लोगों की नींद में खलल डाल रही है।

By Dayanidhi

On: Wednesday 09 June 2021
 
हम अपने शहरों, घरों का निर्माण किस तरह करें कि गर्मी का असर कम से कम हो
Photo: Wikimedia Commons Photo: Wikimedia Commons

ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के चलते लोगों के जीवन पर कई तरह का प्रभाव पड़ रहा है। बढ़ता तापमान दुनिया भर के कई हिस्सों में जीवन की गुणवत्ता पर तेजी से असर डाल रहा है।

इसके चलते भवन निर्माण के मामले में वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और शहरी योजनाकारों के सामने नई चुनौतियां आ रही हैं। अब किंग अब्दुल्ला विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (कौस्त) के शोधकर्ताओं ने इस समस्या को समझने और उससे निपटने के लिए एक अध्ययन किया है।

शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में जिन देशों में गर्मियों के दौरान तापमान काफी बढ़ जाता है, खासकर सऊदी अरब और पड़ोसी क्षेत्रों में बाहर से पड़ने वाली गर्मी के कारण होने वाली परेशानी और असहजता का विश्लेषण किया है।

शोधकर्ता हरि दसारी कहते हैं कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने की स्थितियां विशेष रूप से बदलती जलवायु से प्रभावित हो रही हैं। हर साल कई करोड़ लोग तेजी से बढ़ती गर्मी की चुनौतियों का सामना करते हैं। 2014 से 2018 के बीच, गर्मी के महीनों में औसत तापमान अक्सर 80 प्रतिशत आर्द्रता के साथ 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया था।

टीम ने 1980 से 2018 तक एकत्र किए गए तापमान और आर्द्रता रिकॉर्ड से गणना की, तथा थर्मल असुविधा सूचकांक (डिस्कम्फर्ट इंडेक्स, डीआई) नामक माप में परिवर्तनशीलता और प्रवृत्तियों की जांच की। डीआई इस बात का मूल्यांकन करता है कि ये दो कारक गर्मी के तनाव और परेशानी से किस तरह जुड़े हुए हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि सऊदी अरब के अधिकांश शहरों ने पिछले 20 वर्षों के दौरान असुविधा सूचकांक (डीआई) स्तरों में सुधार दर्ज किया, लेकिन कुछ शहरों में ऐसा नहीं हुआ, जो यानबू, मक्का, मदीना और ताइफ थे। मक्का क्षेत्र में डीआई स्तरों में वृद्धि के खतरे की पुष्टि नैदानिक अभिलेखों की जांच से हुई, जो गर्मी से संबंधित मौतों के साथ संबंध रखते हैं।

दसारी कहते हैं कि हममें से कई लोग इस बात को मानते हैं कि हाल के दशकों के दौरान ग्लोबल वार्मिंग और शहरीकरण में तेजी से वृद्धि के कारण बढ़ते तापमान ने मानव के आराम के स्तर को कम कर दिया है। संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और कतर सहित अरब की खाड़ी के पड़ोसी क्षेत्र वे इलाके हैं जो गर्मी से होनी वाली परेशानी के मुख्य केन्द्र हैं। यह शोध जीओहेल्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ता इब्राहिम होटेइट का कहना है कि निष्कर्ष क्षेत्रीय अधिकारियों, इंजीनियरों और वास्तुकारों को पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और आराम में सुधार के लिए बुनियादी ढांचे, भवन डिजाइन और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावी विकास की योजना बनाने में मदद करेंगे।

शोधकर्ताओं ने कहा अब हम खतरों का खाका बनाने के साथ डीआई स्तरों का एक एटलस बनाने की योजना बना रहे हैं। यह एक ऑनलाइन इंटरैक्टिव विज़ुअलाइज़ेशन और विश्लेषण इंटरफ़ेस के माध्यम से रुझानों को दर्शाता है जो इस विषय के जानकार नहीं है वो लोग भी इसका उपयोग कर सकते हैं। यह विभिन्न बाहरी गतिविधियों के प्रबंधन करने और स्वास्थ्य को होने वाले हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए एक पूर्वानुमान प्रणाली भी है।

भारतीय शहरों पर बाहर से पड़ने वाली गर्मी का प्रभाव
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने विश्लेषणों के आधार पर बताया है कि गर्मियों के दौरान उत्तरी मैदानी इलाकों के शहर रात में ठंडे हो जाते थे, लेकिन आजकल यहां भी रातों में गर्मी फंसकर रह जाती है जो यहां रहने वाले नागरिकों की नींद हराम कर रही है।

यदि हम उदाहरण के लिए दिल्ली को लेते हैं तो, भारत मौसम विज्ञान विभाग और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-मद्रास द्वारा 2017 में किए गए संयुक्त विश्लेषण में पाया कि दिल्ली के ताप सूचकांक ने राष्ट्रीय औसत की तुलना में बढ़ोतरी दर्ज की है। दिल्ली का ताप सूचकांक गर्मियों में प्रति दशक 0.6 डिग्री सेल्सियस और मानसून के दौरान 0.55 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ गया है।

इसके अलावा, दिल्ली तथा अधिकांश भारतीय शहरों का पारंपरिक भवन डिजाइन और शहरी रूप से छाया वाली गलियों से गमीं का प्रभाव कम होता है। इन जगहों पर लोग गर्मियों के दौरान ठंडे रह सकते हैं। ऐसे में शहरी रूप में एयर कंडिशनर (एसी) की शुरूआत पूरे पड़ोस को गर्म कर देती है।

सीएसई के एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि मई 2018 में रोज का न्यूनतम औसत तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं गिरा। वास्तव में, शहर में मध्यरात्रि के बाद परिवेश का तापमान लगातार 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर था। सोने में होने वाली असहजता की स्थिति में रात के समय बिजली की मांग को बढ़ा रही है। शहर में प्रति घंटे मांग का विश्लेषण इस अवलोकन की पुष्टि करता है कि रात में गर्मी संबंधी (थर्मल) आराम में पडने वाला खलल, शहर में एक बहुत बड़ा मुद्दा है।

सीएसई के अविकल सोमवंशी ने बताया कि नए भारत को मूर्त रूप देने वाली ऊंची-ऊंची इमारतों का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी और हरे भरे स्थान तेजी से घट रहे हैं। एसी के उपयोगकर्ता गर्मी बढ़ाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। शहरी एयर शेड में मिनी-हीट जेट, शहर में शारीरिक और आर्थिक तनाव पैदा करते हैं और जीवन की समग्र गुणवत्ता को कम करते हैं।

सीएसई की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत के हर घर में साल में सात महीने एअर कंडीशनर चलाया जाए तो वर्ष 2017-18 के दौरान उत्पादित कुल बिजली की तुलना में बिजली की आवश्यकता 120 फीसदी अधिक हो सकती है।

ठंडे करने से जुड़ी पद्धतियों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है
सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि गर्मी से निजात पाने के लिए बड़े स्तर पर वास्तु डिजाइन के अलावा ठंडे से जुड़े तरीको को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इन तरीकों में कम बिजली खपत एवं ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों का उपयोग प्रमुखता से शामिल है।

आपके घर हवादार होने चाहिए
हाल ही में केंद्र सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय से जारी नई गाइडलाइंस में इस बात पर जोर दिया गया है कि घरों में वेंटिलेशन की बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही नए भवनों का डिजाइन भी उसी तरह बनाने का सुझाव दिया गया है। जहां वेंटिलेशन बेहतर होगा वहां कोरोनावायरस या बीमारियां टिक नहीं सकती हैं।

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