2013 के बाद सबसे ठण्डा रहा मई, लेकिन सामान्य से 0.77 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था तापमान

इस वर्ष मई का औसत तापमान 20वीं सदी के औसत तापमान से 0.77 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था, जो उसे इतिहास का नौवां सबसे गर्म मई बनाता है

By Lalit Maurya

On: Friday 17 June 2022
 
गर्मी की तपिश में फुर्सत के वक्त बिताते बच्चे; फोटो: आमिर जिना, फ्लिकर
गर्मी की तपिश में फुर्सत के वक्त बिताते बच्चे; फोटो: आमिर जिना, फ्लिकर गर्मी की तपिश में फुर्सत के वक्त बिताते बच्चे; फोटो: आमिर जिना, फ्लिकर

इस साल मई का महीना इतिहास का नौवां सबसे गर्म मई का महीना था जब तापमान सामान्य से 0.77 डिग्री सेल्सियस ज्यादा किया गया। हालांकि इसके बावजूद 2013 के बाद यह पहला मौका है जब मई के महीने में तापमान इतना कम दर्ज किया गया है। जो स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इसका बढ़ना अब सामान्य होता जा रहा है। 

बढ़ते तापमान की गंभीरता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते है कि यह लगातार 449वां महीना है जब तापमान 20वीं सदी के औसत तापमान से ज्यादा दर्ज किया गया है। वहीं यदि सिर्फ मई से जुड़े आंकड़ों को देखें तो यह लगातार 46वीं बार है जब मई में तापमान औसत से ज्यादा दर्ज किया गया है। यह जानकारी नेशनल ओसेनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के नेशनल सेंटर फॉर एनवायर्नमेंटल इंफॉर्मेशन (एनसीईआई) द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट में सामने आई है।

देखा जाए तो यह कोई पहला मौका नहीं है जब बढ़ता वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। इससे पहले अप्रैल 2022 का महीना 143 वर्षों के इतिहास में पांचवा सबसे गर्म अप्रैल था, जब तापमान सामान्य से 0.85 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था। वहीं एशिया ने अपने इतिहास के सबसे गर्म अप्रैल का सामना किया था, जब औसत तापमान सामान्य से 2.62 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया था।

गौरतलब है कि 143 वर्षों के इतिहास में वर्ष 2016 और 2020 में मई का तापमान सबसे ज्यादा दर्ज किया गया था जब तापमान में होती वृद्धि 0.94 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई थी। इसके बाद 2015 में 0.89, 2017 में 0.87, 2019 में 0.86, 2018 और 2021 में 0.81 और 2014 में 0.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई थी। 

रिपोर्ट के मुताबिक जहां उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, दक्षिण अमेरिका के मध्य भाग, पश्चिमी यूरोप, मध्य अफ्रीका, उत्तरी और मध्य एशिया और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में तापमान औसत से ज्यादा था। वहीं उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों, दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी छोर, पूर्वी यूरोप, दक्षिणी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में तापमान औसत से ज्यादा ठंडा था।

सामान्य बनता जा रहा है बढ़ता तापमान

वहीं यदि मार्च से मई के सीजन की बात करें तो इन महीनो में तापमान सामान्य से 0.85 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया है जो उसे रिकॉर्ड का छठा सबसे गर्म  मार्च से मई का सीजन बनाता है। इन महीनों में जहां उत्तरी गोलार्ध ने अपने पांचवें सबसे गर्म बसंत का अनुभव किया था वहीं दक्षिणी गोलार्ध ने अपनी 10वीं सबसे गर्म शरद ऋतु देखी थी। 

इसी तरह यदि जनवरी से मई के बीच का अब तक का औसत तापमान देखें तो वो सामान्य यानी 20 वीं सदी के औसत तापमान (13.1 डिग्री सेल्सियस) से 0.85 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। जो इन महीनों को इतिहास की छठी सबसे गर्म अवधि बनाता है। 

यदि मई के दौरान आए तूफानों की बात करें तो इस साल मई 2022 में कुल चार नामित तूफान आए थे, जिनमें से दो उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहीं ज्यादा शक्तिशाली थे जिनकी गति 74 मील प्रति घंटा तक पहुंच गई थी। इनमें सबसे प्रभावशाली तूफान पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में आया तूफान 'अगाथा' था, जिसकी वजह से दक्षिणी मेक्सिको में भारी बारिश और बाढ़ आ गई थी। देखा जाए तो अगाथा 2022 में पश्चिमी गोलार्ध में आने वाला पहला नामित तूफान था और मई में मैक्सिको के प्रशांत तट से टकराने के बाद यह सबसे शक्तिशाली तूफान बन गया था। 

वहीं मई 2022 में आर्कटिक में जमा समुद्री बर्फ के आंकड़ों को देखें तो वहां जमा बर्फ औसत से कम थी। पिछले महीने समुद्री बर्फ का औसत कवरेज 1.28 वर्ग किलोमीटर था, जोकि पिछले 44 साल के रिकॉर्ड में 14 वां सबसे छोटा कवरेज है। वहीं यदि 1979 से 2022 के बीच के मई आर्कटिक में जमा मासिक बर्फ की सीमा को देखें तो वो प्रति दशक 2.5 फीसदी की दर से गिर रही है।

धरती की बर्बादी के लिए हम इंसान ही हैं जिम्मेवार

देखा जाए तो इस बढ़ते तापमान के लिए हम इंसान ही जिम्मेवार हैं। इससे पहले एनओएए और स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला था कि वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का मासिक औसत स्तर भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।

गौरतलब है कि मई 2022 में सीओ2 का मासिक औसत स्तर रिकॉर्ड 420.78 पार्टस प्रति मिलियन (पीपीएम) दर्ज किया गया था। देखा जाए तो यह स्तर औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 50 फीसदी ज्यादा है, जोकि सच में एक बड़ी चिंता का विषय है।

यह आंकड़े एक बार इस ओर इशारा करते हैं कि अपने इस ग्रह को बर्बादी की ओर ले जाने के लिए हम इंसान ही जिम्मेवार हैं और यदि हम अब भी नहीं संभले तो शायद भविष्य में हमारे पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

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