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मीथेन उत्सर्जन में 45 फीसदी की कटौती हर साल बचा सकती है 260,000 लोगों की जान

इस कटौती की मदद से मानव श्रम के 7,300 करोड़ घंटों को बचाया जा सकता है, साथ ही हर साल 2.5 करोड़ टन फसलों के होने वाले नुकसान को भी टाला जा सकत

By Lalit Maurya

On: Wednesday 12 May 2021
 

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी नई रिपोर्ट से पता चला है कि इस दशक में मानव द्वारा उत्सर्जित मीथेन को 45 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यह कटौती 2045 तक तापमान में होने वाली वृद्धि को 0.3 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकती है। इसकी मदद से पैरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।

इस कटौती की मदद से हर साल 260,000 लोगों की जान बचाई जा सकती है। साथ ही अस्थमा के कारण अस्पताल जाने को मजबूर 775,000 लोगों को इससे निजात मिल जाएगी। एक तरफ जहां इसकी मदद से अत्यधिक गर्मी के कारण बर्बाद होने वाले मानव श्रम के 7,300 करोड़ घंटों को बचाया जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ इससे हर साल होने वाले 2.5 करोड़ टन फसलों के नुकसान को टाला जा सकता है।

यदि पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में आज को देखें करें तो वायुमंडल में मीथेन का स्तर तीन गुना बढ़ गया है। वहीं यदि जलवायु परिवर्तन पर मीथेन के पड़ने वाले असर की बात करें तो यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से वातावरण को गर्म कर रही है। ग्लोबल वार्मिंग के मामले में यह कार्बन डाइऑक्साइड से करीब 28 गुना अधिक शक्तिशाली है।

गौरतलब है कि पूर्व औद्योगिक काल से अब तक वैश्विक तापमान में जितनी भी वृद्धि हुई है उसके करीब 30 फीसदी हिस्से के लिए मीथेन ही जिम्मेवार है। एनओएए द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हवा में मीथेन का अंश दिसंबर 2020 में 1,892.3 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) पर पहुंच गया था। यह गैस 2000 के मुकाबले 6 फीसदी बढ़ चुकी है जिसमें 119 पीपीबी की वृद्धि दर्ज की गई है। यहां एक पार्ट्स प्रति बिलियन का अर्थ है कि हवा के एक अरब कणों में एक अंश मीथेन का है।

हालांकि इस गैस के बारे में एक अच्छी खबर यह है कि यह कार्बनडाइऑक्साइड के विपरीत बहुत कम समय तक वातावरण में रहती है जहां सीओ2 को वातावरण से अपने आप खत्म होने में कई सदियां लग जाती हैं वहीं यह गैस दशक में ही खत्म होने लगती है। जिसका मतलब है कि यदि मीथेन उत्सर्जन में कटौती की जाए तो उसकी मदद से छोटी अवधि में ही तापमान में हो रही वृद्धि की दर में लगाम लगाई जा सकती है।

कौन हैं इसके उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार

रिपोर्ट के अनुसार इंसान द्वारा ज्यादातर उत्सर्जित होने वाली मीथेन तीन क्षेत्रों से आती हैं जिनमें जीवाश्म ईंधन, अपशिष्ट और कृषि शामिल हैं। जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में तेल और गैस के निष्कर्षण, प्रसंस्करण और वितरण के द्वारा करीब 23 फीसदी मीथेन उत्सर्जित होती है, वहीं कोयला खनन के कारण 12 फीसदी का उत्सर्जन होता है। अपशिष्ट क्षेत्र में, लैंडफिल और वेस्टवाटर के कारण 20 फीसदी गैस उत्सर्जित होती है। वहीं कृषि क्षेत्र, खाद और मवेशियों के कारण करीब 32 फीसदी मीथेन उत्सर्जित होती है जबकि धान की खेती 8 फीसदी मीथेन उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार है।

इस रिपोर्ट में उन उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है जिनकी मदद से इसके उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है। इसके अनुसार आसानी से उपलब्ध समाधानों की मदद से 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में 30 फीसदी की कटौती की जा सकती है। इसमें अधिकांश उपाय जीवाश्म ईंधन से जुड़े हैं जिनमें मीथेन गैस की लीकेज का पता लगाना और उसे ठीक करना शामिल है। इसी तरह कृषि और वेस्ट क्षेत्र में भी पहले से उपलब्ध समाधानों का प्रयोग किया जा सकता है।

क्या हैं समाधान  

इनमें से 60 फीसदी समाधान ऐसे है जिनकी लागत बहुत कम है साथ ही 50 फीसदी समाधान ऐसे हैं जिनके खर्च के मुकाबले फायदा ज्यादा है। इसकी सबसे बड़ी सम्भावना तेल और गैस उद्योग में है जहां इसके रिसाव को रोकना और इसे वातावरण से हटाने से अतिरिक्त कमाई की जा सकती है। इनके अतिरिक्त कुछ उपाय जैसे रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग, ऊर्जा दक्षता में सुधार, खाद्य पदार्थों की होने वाली हानि को कम करना और कचरे में कमी जैसे उपाय किए जा सकते हैं जिनकी मदद से 2030 तक इसके उत्सर्जन को 15 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यह ऐसे उपाय हैं जिनके एक नहीं अनेक फायदे हैं।

इस रिपोर्ट से जुड़े ड्रियू शिंडल के अनुसार जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड के साथ-साथ मीथेन उत्सर्जन को भी कम करना जरुरी है। इसके बारे में अच्छी खबर यह है कि इसकी रोकथाम के लिए उठाए कदम न केवल जलवायु के लिए फायदेमंद है साथ ही यह स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद हैं। सबसे जरुरी बात यह है कि इसके लिए जिन तकनीकों की जरुरत है वो पहले से ही उपलब्ध है।

इस विश्लेषण के अनुसार इसके उत्सर्जन को रोकने और कम करने की क्षमता क्षेत्रों और देशों के आधार पर अलग-अलग है। जहां भारत और यूरोप में अपशिष्ट क्षेत्र में सुधार से उत्सर्जन में कमी की जा सकती है वहीं चीन में कोयला क्षेत्र महत्वपूर्ण है। इसके बाद पशुधन क्षेत्र की मदद से उत्सर्जन में कटौती की सबसे ज्यादा सम्भावना है।

अफ्रीका में तेल और गैस के बाद पशुधन महत्वपूर्ण हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन और भारत को छोड़कर कोयला और अपशिष्ट क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। वहीं मध्यपूर्व, उत्तरी अमेरिका और रूस में तेल और गैस क्षेत्र इसके उत्सर्जन में कमी लाने के लिए सबसे ज्यादा महत्त्व रखता है, जबकि दक्षिण अमेरिका में पशुधन सम्बन्धी नीतियां मायने रखती हैं।

इस कटौती न केवल जलवायु के दृषिटकोण से फायदेमंद होगी, साथ ही इसके एक नहीं अनेक फायदे हैं। इससे दुनिया को जलवायु टिप्पिंग पॉइंट पर पहुंचने से रोकने में मदद मिलेगी। वायु प्रदूषण में गिरावट आएगी जिससे लाखों लोगों की जान बचाई जा सकेगी। फसलों को होने वाले नुकसान में कमी आएगी जिससे खाद्य सुरक्षा में सुधार आएगा। गर्मी से उत्पन्न तनावों में कमी उत्पादकता में वृद्धि करेगी और इसको रोकने के प्रयासों से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगें। जिसका फायदा सम्पूर्ण मानव जाति को मिलेगा।