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बढ़ सकता है जलवायु परिवर्तन का असर, महासागरों में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण में वृद्धि

महासागरों के कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी से गर्मी पैदा करने वाली गैस वातावरण में मिल जाएगी, जिससे दुनिया भर में अधिक गर्मी होगी।

By Dayanidhi

On: Saturday 30 November 2019
 
Photo: Creative commons

पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से प्रभावित है, जहां एक ओर बाढ़ की विभीषिका है तो दूसरी ओर सूखा पड़ा है। इस प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं के लिए कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार है। एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन, प्रकृति में संतुलन बनाए रखने वाले कवकों (फंगस) के काम करने के तरीकों पर प्रभाव डाल रहा है। एक अन्य रिपोर्ट पौधों के 350 गुना तेजी से विलुप्त होने के बारे में सचेत कर रही है। वहीं इन सब से समुद्र भी अछूता नहीं है वहां भी कुछ न कुछ उथल-पुथल जारी है।

नेचर क्लाइमेट चेंज पत्रिका में प्रकाशित एक नवीनतम अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन पश्चिमी अंटार्कटिक प्रायद्वीप से दक्षिणी महासागर की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता को बदल रहा है, इस बदलाव के कारण जलवायु परिवर्तन लंबे समय तक बढ़ सकता है।

पश्चिमी अंटार्कटिक प्रायद्वीप पृथ्वी का सबसे तेजी से होने वाले जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसके तापमान में नाटकीय रूप से वृद्धि हो रही है, ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और इसमें समुद्र की बर्फ का तेजी से पिघलना शामिल है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्रमुख ग्रीन हाउस गैस जो दुनिया के सभी महासागरों द्वारा अवशोषित होती है, दक्षिणी महासागर कार्बन डाइऑक्साइड के लगभग आधे हिस्से को अवशोषित करता है।

प्रमुख अध्ययनकर्ता माइकल ब्राउन कहते है कि "यह समझना आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन दक्षिणी महासागर द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण को कैसे प्रभावित करेगा, विशेष रूप से पश्चिमी अंटार्कटिक प्रायद्वीप जैसे तटीय अंटार्कटिक क्षेत्रों में, जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रभावों की भविष्यवाणियों में सुधार करने के लिए महत्वपूर्ण है," माइकल ब्राउन, डिपार्टमेंट ऑफ़ मरीन एंड कोस्टल साइंसेज ऐट दि स्कूल ऑफ़ एनवायर्नमेंटल एंड बायोलॉजिकल साइंसेज में समुद्र विज्ञान के डॉक्टरेट छात्र है।

अध्ययन ने दक्षिणी महासागर में 25 सालों तक समुद्र की माप की और इस क्षेत्र में अधिक निगरानी की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

शोध में पता चला कि पश्चिमी अंटार्कटिक प्रायद्वीप से सतह के पानी द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण ऊपरी सागर की स्थिरता के साथ-साथ मौजूद शैवाल की मात्रा और उसके प्रकार से जुड़ा हुआ है। महासागर की बढ़ती आदर्श परिस्थितियां शैवालों के लिए लाभदायक है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान, शैवाल महासागर के सतह से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाते हैं, जो बदले में वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है।

1993 से 2017 तक, पश्चिम अंटार्कटिक प्रायद्वीप से समुद्री बर्फ की गतिशीलता में बदलाव ने ऊपरी महासागर को स्थिर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप शैवालों के अधिक क्षारीय सांद्रता और क्षारीय प्रजातियों के मिश्रण में बदलाव हुआ। इसके कारण गर्मियों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण में लगभग पांच गुना वृद्धि हुई है। शोध में कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण के ट्रेंड का एक मजबूत उत्तर-दक्षिण अंतर भी पाया गया। प्रायद्वीप के दक्षिणी हिस्से जो आज तक जलवायु परिवर्तन से कम प्रभावित हुए हैं, इस हिस्से में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण में सबसे अधिक वृद्धि हुई है, इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन सबसे धीमी गति से हुआ है अथवा यहां ना के बराबर प्रभाव पड़ा है।

परिणाम भी अकसर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दिखाते हैं। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगया है कि पश्चिम अंटार्कटिक प्रायद्वीप से ऊपरी समुद्र की स्थिरता अंततः आने वाले दशकों में घट सकती है, क्योंकि समुद्री बर्फ में गिरावट जारी है। एक बार जब समुद्री बर्फ गंभीर रूप से निम्न स्तर तक पहुंच जाती है, तो ऊपरी समुद्र में मिश्रित हवा को रोका नहीं जा सकता है, या पिघले हुए बर्फ के पानी को स्थिर नहीं किया जा सकेगा। और इसके परिणामस्वरूप लंबे समय तक दक्षिणी महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण कम हो सकता है।

महासागरों के कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी से दुनिया भर में अधिक गर्मी पैदा करने वाली गैस वातावरण में मिल सकती है।