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अनुमान से भी तेजी से बढ़ रही है नाइट्रस ऑक्साइड, पर्यावरण के लिए बना खतरा

खेतों में केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसकी वजह से वातावरण में एन2ओ अनुमान से भी अधिक तेजी से फैल रही है

By Dayanidhi

On: Thursday 21 November 2019
 
भारत में खेतों में रासायनिक उर्वरक डालने का चलन कम नहीं हो रहा है। फोटो: विकास चौधरी
भारत में खेतों में रासायनिक उर्वरक डालने का चलन कम नहीं हो रहा है। फोटो: विकास चौधरी भारत में खेतों में रासायनिक उर्वरक डालने का चलन कम नहीं हो रहा है। फोटो: विकास चौधरी

नाइट्रस ऑक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस है और यह हमारे ग्रह पर ओजोन को कमजोर करने वाली गैसो में से एक है। नए शोध के अनुसार, नाइट्रस ऑक्साइड पहले से जितना सोचा गया था, यह वातावरण में उससे अधिक मात्रा में फैल रही हैं।

हममें से अधिकांश नाइट्रस ऑक्साइड (एन2ओ) को "हंसने वाली गैस" के रूप में जानते हैं, जिसका उपयोग बेहोश करने के लिए जाता है। यह वास्तव में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) और मीथेन के बाद तीसरी सबसे लंबे समय तक वातावरण में रहने वाली ग्रीनहाउस गैसों में से एक है। 

इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए) के वैज्ञानिकों के नए शोध के अनुसार  कृषि पद्धतियों और नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के उपयोग ने पिछले दो दशकों से वातावरण में एन2ओ उत्सर्जन को बहुत बढ़ा दिया है। नॉर्वेजियन इंस्टीट्यूट फॉर एयर रिसर्च (एनआईएलयू) और यूरोप और अमेरिका के कई अन्य संस्थानों ने मिलकर यह शोध किया है।

यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन 1998 से 2016 के बीच यह अध्ययन किया गया। आईआईएएसए ने ग्रीनहाउस गैस और वायु प्रदूषण इंटरैक्शन और सिनर्जी (जीएआईएनएस) मॉडल से एन2ओ उत्सर्जन इन्वेंट्री डेटा को इकट्ठा किया है।

प्रमुख अध्ययनकर्ता और एनआईएलयू के वरिष्ठ वैज्ञानिक रोना थॉम्पसन कहते हैं कि हमने देखा कि पिछले दो दशकों के दौरान एन2ओ का उत्सर्जन काफी बढ़ गया है, विशेष रूप से 2009 के बाद से। हमारे अनुमान बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल आईपीसीसी द्वारा लगाए गए अनुमानों के मुकाबले एन2ओ का उत्सर्जन पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। 

अध्ययनकर्ता कहते हैं कि 20वीं सदी के मध्य से वातावरण में एन2ओ तेजी से बढ़ी है। यह वृद्धि वातावरण में नाइट्रोजन की वृद्धि होने के कारण हुई है। 20वीं सदी के मध्य से, वातावरण में काफी हद तक नाइट्रोजन उर्वरकों का उत्पादन, नाइट्रोजन-फिक्सिंग फसलों (जैसे तिपतिया घास, सोयाबीन, अल्फला, ल्यूपिन और मूंगफली) की खेती, और जीवाश्म और जैव ईंधन के जलने से नाइट्रोजन परत (सब्सट्रेट) में वृद्धि हुई है। 

थॉम्पसन बताते हैं कि नाइट्रोजन की अधिक उपलब्धता ने भोजन का अधिक उत्पादन करना संभव बना दिया है, लेकिन इसका खराब पहलू यह है कि इससे जुड़ी पर्यावरणीय समस्याएं जैसे वातावरण में एन2ओ का स्तर बढ़ रहा है।

अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि 2000-2005 और 2010-2015 के बीच एन2ओ में विश्व स्तर पर रह साल 1.6 टिजीएन (कुल वैश्विक उत्सर्जन का लगभग 10 फीसदी) की वृद्धि हुई है। यह संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए नाइट्रोजन उर्वरक और खाद की मात्रा तथा आईपीसीसी द्वारा तय उत्सर्जन से दोगुना है।

अध्ययनकर्ताओं के द्वारा उपयोग किए मांडल (इन्वेर्सिओन)-आधारित उत्सर्जन से, शोधकर्ताओं ने 2.3 या, 0.6% के वैश्विक उत्सर्जन का अनुमान लगाया है, जो कि संयुक्त रूप से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उत्सर्जन के लिए 1.375% के आईपीसीसी द्वारा तय उत्सर्जन से काफी अधिक है।

अध्ययन के नतीजों से स्पष्ट है कि, वैश्विक स्तर पर एन2ओ के उत्सर्जन को कम करने के लिए, उन क्षेत्रों में नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग कम किया जाना चाहिए जहां पहले से ही इसका बहुत अधिक उपयोग हो रहा हो। यह पूर्वी एशिया जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से आवश्यक है, जहां फसल की पैदावार को कम किए बिना नाइट्रोजन उर्वरक का अधिक कुशलता से उपयोग किया जाना चाहिए।