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अलग हो रहे हैं पौधे और फंगस, बढ़ रहा है ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन: अध्ययन

इंसानी हस्तक्षेप के चलते एक साथ रहने वाले पौधे और कवक (फंगस) अलग-अलग हो गए हैं, इससे जहां वनस्पतियां कम हो रही हैं, वहीं ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन भी बढ़ा है

By Dayanidhi

On: Friday 08 November 2019
 
Photo: Creative commons
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एक नए वैश्विक मूल्यांकन से पता चला है कि इंसानी हस्तक्षेप के चलते एक साथ रहने वाले पौधे और कवक (फंगस) अलग-अलग हो गए हैं, इससे जहां वनस्पतियां कम हो रही हैं, वहीं ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन भी बढ़ा है। क्योंकि पौधे और फंगस मिलकर मिट्टी से कार्बन को अलग करने का काम करते हैं, जिससे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम होता है।

नेचर कम्युनिकेशंस नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन से पता चलता है कि एक्टोमाइकोरिसल सिम्बायोसिस अथवा पारिस्थितिक तंत्र में पौधे और कवक की सहजीविता की कमी के कारण मिट्टी से कार्बन को अलग करने की क्षमता कम हुई है।  क्योंकि पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में मनुष्य द्वारा की गई छेड़छाड़ ने पौधे और कवक के साथ-साथ रहने वाले पैटर्न को प्रभावित किया है जिसे माइकोराइजा यानी सहजीवी संबंध के रूप में भी जाना जाता है। इनमें विशेष प्रकार के कवक जिन्हें माइकोराइजा, एक्टोमाइकोरिस के रूप में जाना जाता है, जोकि जमीन में कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अधिकांश पौधों की प्रजातियां विभिन्न कवकों के साथ रहते हैं, जिसमें कवक पौधों को पोषक तत्व प्रदान करते हैं, बदले में पौधे कवक को कार्बन प्रदान करते हैं। पिछले शोधों से पता चला है कि पौधे और कवक का यह संबंध वायुमंडल से सीओ2 को निकालने हेतु वनस्पति की क्षमता को बढ़ाना तथा निकाले गए सीओ2 को मिट्टी में मिला देने से है।

हालांकि, कवक और पौधों के बीच संबंधों की जटिलता तथा कई प्रजातियों के शामिल होने के कारण, इनकी कमी से होने वाले प्रभावों का अनुमान लगाना कठिन है। ऑस्ट्रिया स्थित, इंस्टिट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस के इस अध्ययन में पौधों-कवकों के द्वारा कार्बन स्टॉक में योगदान के अनुमान लगाने के साथ-साथ दुनियाभर में माइकोराइजल वनस्पतियों के विस्तार के बारे में जानकारी दी गई है।

अध्ययन में पाया गया है कि पारिस्थितिक तंत्र में माइकोरिजल सिम्बायोसिस ( पारिस्थितिक तंत्र में पौधे और कवक की सहजीविता) वैश्विक स्तर पर 350 गीगाटन कार्बन को संग्रहीत करती है जबकि अन्य वनस्पतियां सिर्फ 29 गीगाटन कार्बन ही संग्रहीत करती है।

मानव गतिविधियां जैसे कि कृषि के बदलते पैटर्न ने पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र को 50-75 फीसदी तक बदल दिया है, जिसके कारण प्राकृतिक तौर पर कार्बन को अलग करने वाले मायकोरिज़ल को नुकसान हुआ है। इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईएएएसए ) के शोधकर्ता इयान मैक्लम कहते हैं कि पृथ्वी की सतह पर उगने  वाले पौधों में बदलाव के कारण इनकी पृथ्वी में कार्बन भंडारण की क्षमता कम हुई है, जिससे वायुमंडल में सीओ2 में वृद्धि हुई है। 

यह अध्ययन एक ऐसे संभावित तंत्र की पहचान करने का दावा करता है जिसका उपयोग पृथ्वी में अधिक कार्बन भंडारण करके वायुमंडलीय सीओ2 को कम करने के लिए किया जा सकता है। अध्ययनकर्ता कहते है कि बंजर जमीन, या ऐसी जमीन जिसका उपयोग न हो रहा हो, उस पर ऐसी देशी वनस्पतियों को बहाल करना चाहिए जिनके साथ एक्टोमाइकोरिसल जैसे कवक भी रह सकें, जो कार्बन को जमीन में संग्रहित करते हैं, जिससे वायुमंडलीय ग्रीनहाउस गैसों में कमी आती है। 

वायुमंडलीय सीओ2 हटाने के लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए, हमारे पास वनस्पतियां और जमीन में कार्बन का संग्रहण एक बहुत अच्छा तरीका है, जिसमें माइकोरिज़ल सिम्बायोसिस एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।