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सबसे गरीब राज्य बिहार में क्या कर रही है नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी की संस्था?

अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाले अभिजीत बनर्जी की संस्था सालों से बिहार में काम कर रही हैं, यह संस्था दुनिया के लगभग 40 देशों में काम करती हैं 

By Pushya Mitra

On: Friday 18 October 2019
 
2008 में भारत दौरे पर आए थे अभिजीत बनर्जी। फोटो: जे पॉल
2008 में भारत दौरे पर आए थे अभिजीत बनर्जी। फोटो: जे पॉल 2008 में भारत दौरे पर आए थे अभिजीत बनर्जी। फोटो: जे पॉल

बिहार की राजधानी पटना के पाटलीपुत्र कॉलोनी में एक पुराना सा दो मंजिला भवन है। इस भवन के पहले माले पर दो-ढाई कमरे में जे-पाल का दफ्तर चलता है. यहां आसपास रहने वाले लोगों को आज तक मालूम नहीं कि यह संस्था क्या काम करती है और इसका महत्व क्या है। इसी संस्था जे-पाल (अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब) के संस्थापक अभिजीत बनर्जी को इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला है। जे-पाल वैसे तो दुनिया के चालीस से अधिक मुल्कों में गरीबी के खिलाफ चल रहे अभियान में किसी न किसी तरह अपना योगदान दे रही है, मगर बिहार में चल रहा उनका यह अभियान महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिहार आज भी मानव विकास और सतत विकास लक्ष्य के मामले में अन्य राज्यों के मुकाबले काफी नीचे है। 

जे-पाल बिहार-ओड़िशा की रिसर्च मैनेजर रश्मि भट कहती हैं कि बिहार में हमारा काम मुख्यतः सरकार के आजीविका अभियान जीविका मिशन के साथ है और सभी जिलों में है. पिछले साल से बिहार सरकार ने अगस्त महीने में जीविका मिशन के जरिये सतत जीविकोपार्जन योजना की शुरुआत की है। इसी योजना के साथ जुड़ कर हम प्रोसेस इवेल्युएशन का काम कर रहे हैं. दरअसल इस योजना के तहत अत्यंत गरीब समुदाय के लोगों के साथ जुड़कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने का काम किया जाता है। उन्हें उनकी जरूरत के हिसाब से आठ हजार रुपये तक की आजीविका सामग्री जैसे बकरी, ठेला, रिक्शा, सिलाई मशीन आदि उपलब्ध कराया जाता है और फिर 18 महीने तक लगातार उनसे नियमित संपर्क बनाकर उन्हें हर तरह की वैसी मदद की जाती है, जिससे उनका छोटा सा कारोबार खड़ा हो सके। हम इसी योजना में सरकार के साथ जुड़कर उसका नियमित विश्लेषण करते हैं. यह योजना राज्य के सभी 38 जिलों में काम कर रही है।

रश्मि कहती हैं कि दरअसल इससे पहले भी पश्चिम बंगाल और घाना में हमने इस तरह की योजना में अलग-अलग संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया है. इसे हम गरीबी हटाने का ग्रेजुएशन एप्रोच कहते हैं. पश्चिम बंगाल में हमारा यह प्रयोग बंधन बैंक के साथ चला था। तीन साल बाद हमने जब इसका आकलन किया तो हमने पाया कि अत्यंत गरीब लोगों में गरीबी को कम करने में यह उपाय काफी कारगर रहा, इसलिए साल 2015 से हम लगातार बिहार सरकार को इस प्रयोग को अपनाने के लिए कहते रहे। 2018 में सरकार इसके लिए सहमत हो गयी, अब हम सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

बिहार में जे-पाल का यह इकलौता काम नहीं है। इसके अलावा भी जे-पाल सरकार और विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर अलग-अलग काम कर रही है. इससे पहले मनरेगा में भी उसने बिहार सरकार के साथ मिलकर काम किया था. हां, उससे सभी काम शोध आधारित और विश्लेषणात्मक हैं। रश्मि कहती हैं कि उच्च स्तरीय आकलन करना ही उसकी संस्था का मुख्य काम है. हमने अपने विश्लेषणात्मक उपकरणों के जरिये यह आकलन करने की कोशिश करते हैं कि आखिर गरीबी को हटाने की दिशा में जो काम किये जा रहे हैं, वे प्रभावी हैं या नहीं। गरीबी को लेकर हमने अलग-अलग मानक तैयार किये हैं. उनमें सिर्फ आर्थिक गरीबी ही नहीं, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरे ऐसे कई मानक हैं. हम हर प्रयोग को इन मानकों के आधार पर कस कर देखते हैं।

साल 2012 में जे-पाल ने बिहार में मनरेगा को लागू करने में ई गवर्नेंस की भूमिका का आकलन किया था. सितंबर, 2012 से मार्च, 2013 तक चले इस आकलन को करने वाली टीम में इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पाने वाले जे-पाल के दोनों सदस्य अभिजीत बनर्जी और उनकी जीवन साथी एस्टर डुफलो शामिल थे। इस टीम ने पाया था कि ई गवर्नेंस के कारण मनरेगा के भ्रष्टाचार में 24 फीसदी तक की कमी आयी है. फर्जी जॉब कार्डों की संख्या में कम से कम 5 फीसदी की कमी आयी है और मनरेगा से जुड़े सरकारी कर्मियों की आय में भी औसतन 14 फीसदी की कमी दर्ज की गयी है। इन कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा हर साल सरकार को अपनी संपत्ति का ब्योरा दिया जाता है।

पहले मनरेगा में काफी सारा पैसा पड़ा रह जाता था, इस शोध से यह भी पता चला कि ई गवर्नेंस को अपनाने के बाद इसमें भी 33 फीसदी की कमी आयी. बाद में इस शोध के आधार पर इस प्रयोग को 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया।

जे-पाल पटना बिहार सरकार के विद्युत और मत्स्य विभाग के साथ भी आकलन का काम करता है। अभिजीत बनर्जी और एस्टर डुफलो को नोबेल मिलने के बाद इस संस्था के पटना कार्यालय में स्टाफ खास कर काफी खुश हैं। रश्मि कहती हैं कि अब तक आकलन के काम को अलग से महत्व नहीं दिया जाता था, अब तक हमें लोगों को बताने में मुश्किल होती थी कि हम करते क्या हैं, अब शायद लोग हमारे काम को गंभीरता से देखेंगे।

पटना के अलावा इस संस्था का देश के 15 शहरों में दफ्तर है. बिहार के साथ-साथ तमिलनाडु और पंजाब में यह सरकार के साथ मिलकर गरीबी को कम करने केे अभियान में जुटी है।