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मनरेगा: लॉकडाउन में 1.55 करोड़ लोगों को नहीं मिला काम, नहीं मिला कोरोना राहत पैकेज

स्वयंसेवी संगठन पीपुल्स एक्शन फॉर इम्प्लायमेंट जनरेशन गारंटी ने मनरेगा पर अपनी रिपोर्ट जारी की

By Raju Sajwan

On: Thursday 10 September 2020
 
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग।
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग।

कोरोनावायरस संक्रमण को रोकने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान बेशक महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ही एकमात्र कार्यक्रम था, जिसके तहत लोगों को रिकॉर्ड रोजगार दिया गया, लेकिन फिर भी लगभग 1.55 करोड़ लोगों ने काम मांगा और उन्हें काम नहीं दिया गया। पीपुल्स एक्शन फॉर इम्प्लायमेंट जनरेशन गारंटी (पीएईजी) द्वारा जारी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।

10 सितंबर को पीईएजी ने एक प्रेस कांफ्रेस में यह रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में मनरेगा के लिए आवंटित राशि  छह माह के भीतर ही खर्च कर दी गई है। बजट में 60 हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था, जबकि नौ सितंबर 2020 तक 64,000 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। सरकार ने वादा किया था कि कोरोना राहत पैकेज के तौर पर मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपए जारी किए जाएंगे, जो अब तक जारी नहीं किए गए हैं। कई राज्यों ने आवंटित फंड से ज्यादा खर्च कर दिया है।

आठ सितंबर 2020 तक के आंकड़े बताते हैं कि बिहार को मनरेगा के तहत 4,149 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जबकि बिहार 4,373 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इसी तरह छत्तीसगढ़ सबसे अधिक 3,170 करोड़ रुपए अधिक खर्च कर चुका है। पीईएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र के मनरेगा मद में 481 करोड़ रुपए का नेगेटिव बैलेंस है। यानी कि यह राशि देनदारी की है। हालांकि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ को लगभग 3,200 करोड़ रुपए दे अतिरिक्त दे चुका है। उत्तर प्रदेश भी आवंटित बजट से लगभग 93.87 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च कर चुका है

जून के बाद घटा काम

रिपोर्ट बताती है कि 2020-21 में सबसे अधिक काम जून 2020 में दिया गया। इस माह में 3.9 करोड़ परिवारों को काम दिया गया, जबकि इससे पहले मई में 3.3 करोड़ और अप्रैल में 1.1 करोड़ परिवारों को काम दिया गया। लेकिन जून के बाद काम देने का सिलसिला कम होता गया। जुलाई 2020 में 2.8 करोड़ परिवारों को काम दिया गया, जबकि अगस्त में 1.8 करोड़ परिवारों को काम दिया गया।

केवल 1.4 फीसदी परिवारों को 100 दिन काम

रिपोर्ट में कहा गया है कि 6.8 लाख परिवारों ने 100 दिन का काम कर लिया है, लेकिन नरेगा के तहत दिए गए कुल रोजगार के मुकाबले यह केवल 1.2 प्रतिशत है। इसके अलावा 51 लाख परिवार 70 दिन का काम कर चुके हैं, जबकि पिछले पांच साल का औसत देखें तो 42 लाख परिवार ही साल भर में 100 दिन का काम कर पाते हैं।

बिहार में 2 हजार परिवार को ही मिला 100 दिन काम

अगर राज्यवार आंकड़े देखा तो सबसे अधिक आंध्र प्रदेश ने 2.65 परिवारों को 100 दिन का काम दिया है, लेकिन बिहार में केवल 2000 परिवार ही 100 दिन का काम कर पाएं हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन के चलते बिहार में बड़ी तादात में प्रवासी मजदूर लौटे थे और वहां मनरेगा का काम मांग रहे थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक प्रवासी मजदूर लौटे, लेकिन यहां केवल 29 हजार परिवारों को ही 100 दिन का काम दिया जा सका है।

16 फीसदी को नहीं मिला काम
लॉकडाउन के बाद पीएईजी ने तीन नरेगा ट्रेकर जारी किए हैं। पहला ट्रेकर 10 जुलाई 2020 को जारी किया, जिसमें बताया गया कि नरेगा के तहत काम मांगने वाले और काम पाने वाले परिवारों की संख्या में लगभग 1.76 करोड़ का अंतर था। यानी कि 1.76 करोड़ परिवारों को काम नहीं मिला। यानी कि 1.74 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया। 3 अगस्त 2020 को पीएईजी की रिपोर्ट में कहा गया कि 1.52 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया, जबकि 8 सितंबर 2020 तक 1.55 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया।

मनरेगा के तहत सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में काम मांगने वालों को काम नहीं मिल पाया। यहां 35 लाख लोगों को काम नहीं मिला। इसी तरह छत्तीसगढ़ में 11.74 लाख, राजस्थान में 13.7 लाख लोगों को मांगने के बावजूद काम नहीं मिल पाया।

कैसे मिलेगी 1200 करोड़ रुपए मजदूरी
रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच साल से जुलाई 2020 तक लगभग 5 करोड़ वित्तीय लेनदेन (ट्रांजेक्शन) रद्द हो चुके हैं और लगभग 4800 करोड़ रुपए की मजदूरी, मजदूरों को नहीं दी गई है। यानी कि 23 में से 1 ट्रांजेक्शन रिजेक्ट हुआ है। इस तरह लगभग 6.43 करोड़ दिन की मजदूरी लोगों को नहीं मिली है। सबसे अधिक ट्रांजेक्शन मध्य प्रदेश, फिर छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश में रिजेक्ट हुई है।