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प्रवासी श्रमिकों ने चार महीनों में जीवित किए 1,000 तालाब

उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक श्रमदिवस सृजित करने वाला जिला सिद्धार्थनगर रहा। जिले में लॉकडाउन के दौरान कुल 1.51 लाख प्रवासी श्रमिक लौटे

By Vivek Mishra

On: Tuesday 11 August 2020
 
सिद्धार्थनगर के भिटिया गांव में मनरेगा से विकसित हुआ हर्बल पार्क। फोटो: विवेक मिश्रा
सिद्धार्थनगर के भिटिया गांव में मनरेगा से विकसित हुआ हर्बल पार्क। फोटो: विवेक मिश्रा सिद्धार्थनगर के भिटिया गांव में मनरेगा से विकसित हुआ हर्बल पार्क। फोटो: विवेक मिश्रा

“हमें नहीं मालूम है कि यह तालाब इस गांव में कब से मौजूद है। हमारे पुरखों को भी नहीं पता था। हम सबने बस इसे ऐसे ही देखा है। तालाब का इस्तेमाल बीच में कम हुआ और यह बहुत गंदा हो गया था लेकिन 2007 में पहली बार महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून योजना (मनरेगा) के तहत  इसकी सफाई कराई गई। तबसे सिंचाई और अन्य कामों में इसका इस्तेमाल होता है। अब कुल 13 वर्षों बाद प्रवासी व स्थानीय श्रमिकों को मनरेगा के तहत काम देकर इसे फिर से साफ कराया गया है।“ 

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में भिटिया गांव के 45 वर्षीय रामबृज इस तालाब को साफ करने वालों में से हैं। वह बताते हैं कि अपने परिवार का भरण-पोषण करने और बेहतर जीवन के लिए गुजरात के सूरत में सिलाई का काम करते थे। कोविड-19 के कारण लंबे चले लॉकडाउन ने उनसे रोजगार छीन लिया। बेरोजगारी और तंगी के कारण उन्हें  वापस गांव लौटना पड़ा। मार्च से जून, 2020 के बीच लॉकडाउन के विभिन्न चरणों के दौरान रामबृज की तरह कुल 147 प्रवासी मजदूर देश के अलग-अलग हिस्सों से जनपद के भिटिया गांव लौटे थे।

सिद्धार्थनगर के जिला मुख्यालय नौगढ़ से करीब 12 किलोमीटर दूर उसका बजार ब्लॉक में भिटिया गांव है। इसे मनरेगा के तहत आदर्श ग्राम घोषित किया गया है। डाउन टू अर्थ ने गांव पहुंचकर लॉकडाउन के दौरान किए गए कामकाज का जायजा लिया।  

प्रवासी श्रमिक रामबृज जब सूरत से वापस भिटिया गांव आए तो वहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत प्राथमिक विद्यालय के बगल मौजूद एक पुराने तालाब की गाद निकालकर उसे गहरा किया जा रहा था। इसके अलावा तालाब  सौंदर्यीकरण के साथ ही गांवों में संपर्क रोड और एक हर्बल पार्क जैसे निर्माण कार्य भी हो रहे थे। 

रामबृज ने बताया, “जेब में पैसे नहीं थे। उस वक्त गांव में मनरेगा का काम चल रहा था। मेरा जॉब कार्ड पहले से ही बना हुआ था। ऐसे में मैंने भी (मई में) 20 दिन का काम तालाब की सफाई में और फिर अलग-अलग समय पर गांव में सड़क निर्माण आदि का काम किया। प्रत्येक दिन के 201 रुपए मजदूरी मिल जाते थे। भले ही गुजरात के सूरत में मिलने वाली दैनिक मजदूरी का यह आधा भी नहीं था लेकिन लॉकडाउन के दौरान यह मिलना भी बहुत था। बारिश जारी है, अब यहां कुछ खास काम होगा नहीं। लॉकडाउन और कोरोना की समस्या हटे तो वापस लौटूंगा। 

वहीं भिटिया के ही निवासी और प्रवासी श्रमिक हरीराम पासवान बताते हैं कि जब वे गांव लौटे और 14 दिन एकांतवास में रहने के बाद उन्हें सरकार के तरफ से राशन की कोई सहायता नहीं दी गई। वह अभी तक उसकी मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा “ मनरेगा के तहत लगातार काम नहीं मिल पाया क्योंकि श्रमिकों की संख्या बहुत ज्यादा थी और काम सीमित था, तो शिफ्ट में काम मिलता रहा। खैर इसी से हमें बहुत राहत मिली। यदि यह काम भी न मिला होता तो हम नोन-रोटी को तरस जाते।“

भिटिया गांव के निवासी व अन्य प्रवासी मजदूरों ने कहा कि मनरेगा योजना के अभाव में उनका गांव में बेकाम रहना शायद मुसीबत को और बढ़ा देता। 5 दिन से लेकर 15 और 20 दिन तक मनरेगा के तहत रोजगार का काम श्रमिकों को मिलता रहा। 360 परिवार और 2,000 से अधिक आबादी वाले भिटिया गांव में अप्रैल से जुलाई के दौरान मनरेगा के तहत 3,100 श्रमदिवस हुए और तालाब व अन्य कामों में प्रतिदिन औसतन 100 से 120 व्यक्तियों को रोजगार मिला। मनरेगा के ब्लॉक स्तरीय अधिकारी के मुताबिक इतना काम कभी इस गांव में मनरेगा के तहत नहीं हुआ था।

वहीं, डाउन टू अर्थ ने जिला मुख्यालय नौगढ़ से करीब 50 किलोमीटर दूर बांसी तहसील के बिहटा गांव में मजदूरों से मनरेगा के कामकाज को लेकर स्थिति का भी जायजा लिया। एक बेहद छोटे से बाजार और कीचड़ से सनी हुई सड़कों के बीच हम बिहटा गांव में दाखिल हुए। दूर-दूर तक धान के खेतों की हरियाली छाई है। गांव में दाखिल होने वाली कच्ची सड़कें मनरेगा के तहत इस बार प्रवासी और स्थानीय श्रमिकों ने मिलकर बनाई हैं। सड़कों की पटाई के लिए गड्ढ़ों की खुदाई का भी काम कराया गया है। वहीं, गांव में एक पोखर को फिर से कई वर्षों बाद साफ कराया गया है। 

मुंबई से गांव लौटे प्रवासी श्रमिक राहुल बताते हैं कि 500 किलोमीटर की पैदल यात्रा करने के बाद वह अपने गांव पहुंच पाए थे। 14 दिन क्वरंटीन रहने के बाद उन्होंने करीब 14 दिन मनरेगा का काम किया। उन्होंने कहा “ज्यादा लोगों के कारण बराबर काम नहीं मिला, इस बार बारिश भी बहुत ज्यादा हुई है, इससे काम प्रभावित रहा। लेकिन कम ही सही काम सभी को मिला है, चकरोड (कच्ची सड़कों का निर्माण), तालाब की सफाई जैसे काम मैंने किए। अब हम खेती-किसानी का काम कर रहे हैं। यहां हमें मनरेगा से थोड़ा ज्यादा मजदूरी (250 रुपये) मिल रही है लेकिन जैसे ही स्थिति सुधरेगी मुंबई लौट जाऊंगा।“

मनरेगा के तहत सिर्फ भिटिया और बेलवा जैसे गांवों के तालाब नहीं सुधरे बल्कि उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में इस वित्त वर्ष लॉकडाउन के दौरान पहली बार मनरेगा के तहत एक साथ कुल 1,000 तालाबों के जीर्णोद्धार का काम शुरू हुआ। वहीं, अप्रैल से लेकर जुलाई के बीच में कुल 300 तालाबों का काम पूरा किया जा सका। साथ ही 64 तालाब निजी जमीनों पर बनाए गए।

कोरोनाकाल में ही मनरेगा के क्रियान्वयन में उत्तर प्रदेश के कई जिले फिसड्डी रहे लेकिन सिद्धार्थनगर जिले ने मनरेगा के तहत श्रमिकों को काम देने के मामले में रिकॉर्ड कायम किया। आखिर योजना का सफल तरीके से क्रियान्वयन कैसे हुआ?

इस सवाल पर सिद्धार्थनगर के जिलाधिकारी दीपक मीणा ने बताया कि मनरेगा के क्रियान्वयन को लेकर शुरू में ही रणनीति के तहत काफी तैयारी कर ली गई थी। कुल 1,199 ग्राम पंचायतों से लौटने वाले प्रवासियों और स्थानीय कामगारों की संख्या और जिन कामों को मनरेगा के तहत गांवों में किया जा सकता था, उसकी जानकारी जुटाई गई। मनरेगा के तहत रोजगार देने और समय से भुगतान व जॉब कार्ड बनवाने जैसे कामों के लिए अभियान चलाकर लोगों को प्रोत्साहित किया गया। सर्वाधिक काम जल संरक्षण और कृषि व सड़क निर्माण से जुड़े रहे। भ्रष्टाचार जैसी शिकायतों के निवारण के लिए हेल्प डेस्क भी बनाया गया। जैसे-जैसे काम की डिमांड बढ़ती गई हमारी रणनीति और तैयारी ने मनरेगा के क्रियान्वयन संबंधी काम को आसान बना दिया।  

कोविड-19 के दौरान लगाए गए लॉकडाउन के दौरान देश में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूर वापस अपने गांव-घर लौटे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के मुताबिक, लॉकडाउन की अवधि में कुल 34 लाख प्रवासी अपने घरों को लौटें हैं। प्रवासियों की कुल संख्या के मामले में सर्वाधिक संख्या 3,30,693 जौनपुर जिले की है और दूसरे स्थान पर सिद्धार्थनगर जिला है, जहां कुल 151,026 प्रवासी कोरोना के दौरान लॉकडाउन की अवधि में लौटे हैं। प्रवासियों की संख्या के हिसाब से जौनपुर में मनरेगा का क्रियान्वयन बेहतर नहीं हुआ लेकिन सिद्धार्थनगर जिले में मनरेगा के कामकाज ने प्रदेश में रिकॉर्ड प्रदर्शन किया है। मिसाल के तौर पर समूचे प्रदेश में इस वित्त वर्ष अप्रैल से जुलाई तक मनरेगा के तहत श्रमदिवस सृजित करने के मामले में सिद्धार्थनगर अव्वल है। जुलाई तक जिले में कुल 59,91,384 श्रमदिवस सृजित हुए हैं।

सिद्धार्थनगर में अप्रैल महीने से ही मनरेगा के तहत काम मांगने वालों की संख्या बढ़ने लगी थी। जिले में लौटे कुल 1,51,026 प्रवासियों में 52 हजार से अधिक खासतौर से प्रवासी मजदूरों को मनरेगा के तहत काम दिया गया। जिले में आए हुए कुल प्रवासियों की संख्या में 88,713 प्रवासी अकुशल श्रमिक थे। वहीं, जिले के 14 ब्लॉक में डुमरियागांज ब्लॉक में सर्वाधिक 22,321 प्रवासी श्रमिक लौटे हैं।

मनरेगा के तहत बीते पांच वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक सिद्धार्थनगर जिले में इस वर्ष 2020-21 में पचास फीसदी अधिक कुल 62,135 जॉबकार्ड बनाए गए। वहीं, समूचे वित्त वर्ष में जितने काम की मांग पूरे वित्त वर्ष में होती है, उससे कहीं अधिक इस बार जिले में सिर्फ 4 महीनों के भीतर दर्ज की गई। बीते पांच वर्षों में जनपद के कुल 14 ब्लॉक में औसतन 1.8 लाख से 2.1 लाख के बीच काम की मांग की गई  है, जबकि इस वित्त वर्ष के तहत सिर्फ जुलाई तक चार महीनों के भीतर ही 2.5 लाख लोगों ने काम की मांग की। वहीं इस अवधि में करीब 2.3 लाख लोगों को रोजगार दिया गया। अगर योजना के तहत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या देखें तो बीते पांच वर्षों में औसतन 1.6 लाख परिवार से लेकर 1.8 लाख परिवार मनरेगा का लाभ लेते हैं लेकिन इस वित्त वर्ष में जुलाई तक कुल 2 लाख से भी अधिक परिवार को रोजगार दिया गया है।

जिले में मनरेगा के श्रम उपायुक्त संजय शर्मा ने डाउन टू अर्थ से बताया कि बहुत बड़ी संख्या में जिले में लौटे प्रवासी मजदूरों के सामने रोजगार का संकट था और उस वक्त तत्काल राहत के लिए अकेले मनरेगा योजना पर काफी दबाव था। लेकिन मनरेगा ने एक संबल का काम किया। कुल 14 ब्लॉक की 1,199 ग्राम पंचायतों में मनरेगा योजना के तहत अप्रैल से जुलाई के बीच पहली बार रिकॉर्ड स्तर पर काम मांगा गया। वहीं, जनपद में प्रत्येक दिन औसत 1.5 लाख लोगों ने जिले में योजना के तहत रोजगार हासिल किया। मनरेगा के तहत प्रवासी मजदूरों को काम मुहैया कराने के मामले में सिद्धार्थनगर जिला पहले स्थान पर रहा है।

सिद्धार्थनगर में किसानों ने बताया कि इस बार कोई दिन ऐसा नहीं रहा जब 24 घंटे के भीतर कुछ देर के लिए बारिश न हुई हो। ऐसे में काम भी प्रभावित हुआ है। अब भी मनरेगा के कई कार्यों की रफ्तार थम गई है। वहीं कोरोना संक्रमण के भय के चलते लोगों का आवागमन अभी सुलभ नहीं हो पाया है। कई विभागों में अधिकारी और कर्मियों में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है।

जल संरक्षण के लिए तालाबों के पुनरुद्धार औऱ सड़क निर्माण के अलावा मनरेगा के तहत खेतों में मेड़ बंदी का काम भी खूब किया गया है। प्रवासी श्रमिक हरीराम पासवान ने कहा कि मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी काफी कम है, जबकि खेती के काम में भी इस वक्त संख्या होने के कारण मजदूरी 250 रुपए के आसपास ही मिल रही है। मुख्य रूप से यहां धान की पैदावार होती है। धान संबंधी काम अब हो गए हैं और खेतों में अब हमारी जरूरत कम रह गई है। ऐसे में कोरोना संक्रमण के भय की स्थिति खत्म होते ही हम वापस महानगर जाएंगे।

सिद्धार्थनगर के मुख्य विकास अधिकारी पुलकित गर्ग ने बताया कि मनरेगा के तहत 95.5 फीसदी भुगतान किया गया है। वहीं इस वित्त वर्ष का श्रमिक बजट 192 करोड़ 75 लाख है जिसमें से 118 करोड़ 43 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। करीब 61.4 फीसदी श्रमिक बजट चार महीनों के भीतर खर्च किया जा चुका है।

मनरेगा के कामों की पारंपरिक श्रेणियों में विस्तार के लिए भी अधिकारी मांग कर रहे हैं। डीसी मनरेगा संजय शर्मा ने कहा “पूर्वी उत्तर प्रदेश कृषि प्रधान है। यहां खेती से जुड़े कई रोजगार हैं। ऐसे में खेती के कामकाज को भी यदि मनरेगा में शामिल किया जाए तो न सिर्फ कृषि की स्थिति सुधर सकती है बल्कि रोजगार का स्थायी समाधान भी हो सकता है जो प्रवास को रोकने में मददगार हो सकता है।“

बहुत से कुछ ऐसे प्रवासी श्रमिक भी रहे जो मनरेगा का लाभ नहीं ले पाए लेकिन उनके पास बची हुई थोड़ी खेती की जमीन ने उन्हें काम मुहैया करा दिया। बांसी तहसील के सेमरी गांव में मुंबई से लौटे मनोज ने बताया कि उनके संयुक्त पारिवार में कुल 18 लोग हैं। वह मार्च में लॉकडाउन की घोषणा होते ही वापस आ गए थे। प्रधान से मनरेगा कार्ड के लिए फरियाद लगाई थी लेकिन उनके पास थोड़ी खेती के लायक जमीन थी। उसमें खेती की है और अब स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं।

मनरेगा के तहत समूचे प्रदेश और जिले में न कभी इतना काम मांगा गया था और न ही इतना काम डिलीवर हुआ था। मनरेगा ने लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों की मुसीबत को न सिर्फ कम किया बल्कि ग्रामीण वित्तीय अर्थव्यवस्था भी पैसों के आवागमन से मंद गति से चलती रही, अन्यथा रोजगार खत्म होने का दुख अनंत हो जाता।