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मनरेगा से दस साल में पहली बार जलमग्न होगा पुष्कर सरोवर

मनरेगा योजना के तहत राजस्थान के पारंपरिक जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है

By Anil Ashwani Sharma

On: Tuesday 21 July 2020
 
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राजस्थान के गनाहैडा गांव में सफाई करते मनरेगा मजदूर। फोटो: अनिल अश्विनी शर्मा राजस्थान के गनाहैडा गांव में सफाई करते मनरेगा मजदूर। फोटो: अनिल अश्विनी शर्मा

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) केवल रोजगार ही नहीं उपलब्ध करा रही है, बल्कि यह राजस्थान के पारंपरिक जल स्त्रोतों को भी पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

अजमेर से 14 किलोमीटर दूरी पर अरावली की सर्पीली पहाड़ियों के बीच बना पुष्कर सरोवर की वास्तुकला अपने आप में एक बेजोड़ नमूना है। लेकिन वर्तमान में यह बेजोड़ नमूना पानी के अभाव में बड़ी खाई के रूप में ही दिखाई देता है, क्योंकि सरोवर को भरने वाले फीडर मिट्टी और रेत से अटे हुए हैं।

लेकिन देश में कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के बाद यहां हालात बदलने लगे हैं। अप्रैल के आखिरी हफ्ते में अरावली की पहाड़ियों, जिसे स्थानीय लोग नाग पर्वत के नाम से जानते हैं। इस नाग पर्वत के बीच बने पांच फीडरों पर मनरेगा के तहत सफाई का काम शुरू हुआ है और अब तक तीन फीडर पूरी तरह से साफ हो चुके हैं। बाकी पर काम चल रहा है।

इस सरोवर में नाग पर्वतों से बह कर आने वाले पानी को प्राकृतिक और पांच निर्मित फीडरों के माध्यम से जल संचित किया जाता है, लेकिन पहाड़ियों से आने वाले पानी के साथ मिट्टी और रेत बड़ी मात्रा में इन फीडरों को आधा पाट दिया है। ऐसे में सरोवर में पिछले दस सालों से पानी पहुंच ही नहीं पा रहा है।

इन फीडरों की तकनीकी पहलुओं पर नजर रखने वाले सहायक अभियंता शलभ टंडन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इन फीडरों की सफाई के बाद हमें उम्मीद है कि इस बार यह सरोवर अवश्य भरेगा। वह बताते हैं कि इन फीडरों की सफाई कार्य पिछले दस साल में पहली बार हो रही है। 

हालांकि जब आप जब इस सरोवर की कल्पना करते हैं तो आप चारों ओर हरियाली लिए पहाड़ियों के बीच बने इस सरोवर को लबालब देखते हैं, लेकिन हकीकत की धरातल पर इसे निहारते हैं तो यह एक सूख चुके एक बड़े आकार का गढ्डे के रूप में नजर आता है।

लगभग दस मीटर गहरे इस सरोवर के फीडर पर कानसकर गांव से गुजरते फीडर पर काम कर रहे यशवंत ने कहा कि हमें इस बात का संतोष है कि हमें एक तो लॉकडाउन की विकट परिस्थितियों के बीच काम मिला और दूसरा कि हमारे इस काम से पवित्र सरोवर भरेगा। कई सालों से तो मैं भी देखता आया हूं कि इस सरोवर तक पानी पहुंचता ही नहीं। लेकिन यह नहीं मालूम था कि इन फीडरों में गले तक भरी हुई रेत के कारण सारा पानी ये रेत ही सोख लेती थी। अब उम्मीद है कि इस बार थोड़ा भी बारिश हुई तो वह पानी हर हाल में सरोवर तक पहुंचेगा। 

 मनरेगा के तहत  मिट्टी व गंदगी से अटे पुष्कर व बूढ़ा पुष्कर सरोवर के पांच बरसाती फीडरों की सफाई का काम शुरू किया गया था। इन फीडरों को भी प्राकृतिक फीडर से पानी लेना पड़ता है। इसलिए इन फीडरों में जमा मिट्टी हटाने में ग्राम पंचायत गनाहेड़ा व कानस के लगभग पांच सौ से अधिक श्रमिकों काम मिला है।

लॉकडाउन की मार झेल रहे दोनों पंचायतों बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार मिला है। गनाहेड़ा ग्राम पंचायत में श्रमिकों ने पुष्कर सरोवर के मुख्य फीडर, कपिल कुंड फीडर व सावित्री फीडर में मिट्टी व बालू पूरी तरह से हटा दी है। 

अजमेर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गजेंद्र सिंह राठौर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस सरोवर की सफाई इसलिए भी आवश्यक है कि आगामी अक्टूबर-नवंबर में यह एक बड़े मेला का आयोजन होता है। ऐसे में पानी की उपलब्ध्ता जरूरी हो जाती है। वह कहते हैं कि इस सरोवर का कैचमेंट एरिया लगभग 22 किलोमीटर में फैला हुआ है। और जल क्षमता 790,000 घन मीटर है।