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बंजर जमीन को आबाद कर रही हैं महिलाएं

भीलवाड़ा के मारवों का खेड़ा गांव में मनरेगा से विकसित किया जा रहा है फार्म लैंड

By Anil Ashwani Sharma

On: Tuesday 28 July 2020
 
मारवों का खेड़ा गांव में 40 महिलाएं बदल रही हैं बंजर जमीन की दशा। फोटो: अनिल अश्वनी शर्मा
मारवों का खेड़ा गांव में 40 महिलाएं बदल रही हैं बंजर जमीन की दशा। फोटो: अनिल अश्वनी शर्मा मारवों का खेड़ा गांव में 40 महिलाएं बदल रही हैं बंजर जमीन की दशा। फोटो: अनिल अश्वनी शर्मा

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मारवों का खेड़ा गांव में मनरेगा से एक ऐसा फार्म लैंड विकसित किया जा रहा है जो न केवल गांववालों की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि भविष्य में रोजगार भी मुहैया कराएगा। इसके अलावा ग्रामीणों के कौशल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाएगा।

इस संबंध में मनरेगा के अधिकारी अमित कुमार कहते हैं कि हम यहां मनेरगा से ऐसा काम कर रहे हैं जो सस्टेनेबल हो। वह बताते हैं कि हम नहीं चाहते हैं कि मनरेगा योजना खत्म हो तो यह काम भी खत्म हो जाए।
मारवों का खेड़ा गांव से बाहर एक बंजर पड़े पहाड़ी इलाके की लगभग 25 एकड़ जमीन को गांव की ही चालीस विधवा महिलाओं ने लॉकडाउन शुरू होने से लेकर अब तक इस प्रकार से तैयार किया है एक बारगी देखने पर यह भरोसा नहीं होता कि यह जमीन कभी बंजर और वीरान थी। अब इसमें चारों ओर हरियाली दिख रही है। मछली पालन के लिए एक तालाब भी तैयार किया गया है।

Women are populating the barren landइसके अलावा इस जमीन पर ड्रिप सिंचाई हो रही है। इसके लिए पानी भी सौर ऊर्जा से तैयार बिजली के माध्यम से सप्लाई किया जा रहा है। बंजर जमीन पर पाइप से पानी लगा रही रूकणी कहती हैं कि मनरेगा ने तो हम जैसों को जिंदगी बख्श दी, नहीं तो कौन इस महामारी में हमारा खयाल रखता। वह बताती हैं, “हम इस जमीन को अपनी जमीन मानकर तैयार कर रहे हैं। साथ काम करने वाली कम से कम 15 ऐसी महिलाएं हैं जिनकी उमर हो चली है। वे अपने काम के लक्ष्य को दिन में पूरा नहीं कर पाती हैं। हम लोग उनकी मदद कर उनके लक्ष्य को पूरा करते हैं।”

यह जमीन एक छोटी पहाड़ी के इर्दगिर्द फैली हुई है। चूंकि मनरेगा का काम सुबह छह से एक बजे तक होता है और यहां से गांव काफी दूर है, इसलिए मनरेगा के अंतर्गत ही इन महिलाओं के लिए पहाड़ी पर एक शेड भी बना दिया गया है ताकि एक बजे के बाद भरी दोपहरी में उन्हें गांव न जाने पड़े। इस संबंध में जमुना देवी बताती हैं कि अब शरीर काम करने की इजाजत नहीं देता है, इसलिए काम के बाद चिलचिलाती धूप में गांव वापस जाने की हिम्मत नहीं पड़ती। वह कहती हैं कि इस जमीन से अब इतना लगाव हो गया है कि जब गुरूवार को हमारी काम की छुट्टी होती है तो तभी हम यहां गांव से आ जाती हैं और जितना संभव होता है, काम करती हैं।

मनरेगा की क्षेत्रीय अधिकारी किरण शर्मा ने बताया कि इस जमीन पर मछली पालन के लिए एक छोटा पक्का तालाब तैयार किया गया है और पानी प्राकृतिक रूप से बने फीडरों को इससे जोड़ा गया है ताकि आसपास का पानी अन्यंत्र न बह जाए। वह बताती हैं कि इस जमीन पर अब तक कुल 400 औषधीय पौधों को लगाया गया है और इनकी बकायदा कोडिंग की गई है। भविष्य में इन पौधों से होने वाली आय ग्राम पंचायत कोष में जाएगी और उसका उपयोग ऐसे ही और फार्म लैंड के विकसित करने में किया जाएगा।