Sign up for our weekly newsletter

प्राकृतिक तरीके से जैविक कपड़े बनाती हैं ये महिलाएं

वर्धमान और नाडिया जिले की महिलाएं न केवल प्राकृतिक तरीके से जैविक कपड़े बना रही हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी योगदान दे रही हैं

By Moushumi Basu

On: Thursday 18 April 2019
 
कपास
पश्चिम बंगाल की महिलाएं कच्चे कपास को पर्यावरण अनुकूल जमदानी में बदल रही हैं (फोटो: मौसमी बासु) पश्चिम बंगाल की महिलाएं कच्चे कपास को पर्यावरण अनुकूल जमदानी में बदल रही हैं (फोटो: मौसमी बासु)

पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के बगीला गांव में रहने वाली 30 वर्षीय लोखीमोनी दास दो वर्ष पहले तक एक साधारण-सी गृहिणी थी। जहां एक ओर उनके पति अपनी 1-1.5 बीघे (0.12-0.16 हेक्टेयर) जमीने में पसीना बहाते थे, वहीं दूसरी ओर लोखीमोनी सामुदायिक तालाब से मछलियां पकड़तीं, मवेशियों की देखभाल करतीं तथा परिवार के लिए हथकरघे पर बुनाई करतीं थीं। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने वर्धमान और नाडिया जिले के लोगों की जिंदगी बदल दी। लोखीमोनी कहती हैं, “अब मैं अपनी पारंपरिक बुनाई के ज्ञान का इस्तेमाल करके अपने परिवार का पेट भर सकती हूं।”

यहां के तालाबों में मिट्टी और कीचड़ भर गया है जिससे यहां पाई जाने वाली मछलियां लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। लोखीमोनी बताती हैं, “अब बारिश नियमित रूप से नहीं होती। यह देरी से होती है, वह भी कभी बहुत ज्यादा तो कभी बहुत कम। खेती में भी कोई स्थिरता नहीं रह गई है। इसलिए मेरे पति को काम के लिए दूसरे राज्य में जाना पड़ा।” दूसरे किसानों ने धान की अधिक उपज देने वाली रासायनिक खेती को अपना लिया है। इससे जमीन की जैव-विविधता खत्म हो रही है तथा मवेशियों को भोजन उपलब्ध कराने वाले तालाब नष्ट हो रहे हैं।

लोखीमोनी की तरह ही आसपास के लगभग दर्जनभर गांवों की 60 महिलाओं ने अपने जीवनयापन के लिए “पर्यावरण अनुकूल” सूती धागों से बुनाई करना शुरू कर दिया है। गैर-लाभकारी संगठन एमजी ग्राम उद्योग सेवा संस्थान (एमजीजीएसएस) की सह-संस्थापक रूबी रक्षित बताती हैं, “वे जिस कपास से बुनाई करती हैं, उसका रेशा छोटा होता है जो सिर्फ प्राकृतिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से ही तैयार हो सकता है।”

यह गैर-लाभकारी संगठन पर्यावरण अनुकूल कपड़े बनाने के लिए 60 महिलाओं का मार्गदर्शन कर रहा है। इस काम में बिजली की जरूरत नहीं होती तथा बहुत कम प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। यहां तक कि उनके द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला कच्चा कपास भी प्राकृतिक रूप से उगाया तथा प्रसंस्कृत किया जाता है और इसकी रंगाई भी बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से होती है। वह जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में अपना छोटा-सा योगदान दे रही हैं तथा उनके इस काम में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बहुत ही कम है।

धागा बनाना

एमजीजीएसएस की शुरुआत 2010 में कोलकाता में हुई थी। यह संगठन महिला बुनकरों की सहायता के लिए देशभर के विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर काम करता है।

सूत्रकार नामक ब्रांड के तहत कार्य करने वाला एमजीजीएसएस महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित ग्राम सेवा मंडल से हर महीने 200 किलोग्राम कच्चा धागा खरीदता है। यह धागा महाराष्ट्र के अकोला जिले में प्राकृतिक रूप से उगाए गए कपास से बनता है। यहां सीमांत किसान गैर-लाभकारी संगठन चेतना ऑर्गेनिक के साथ मिलकर काम कर रहे हैं जो महाराष्ट्र के अलावा ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी जैविक खेती से जुड़ा हुआ है।

चेतना ऑर्गेनिक के राज्य संयोजक राहुल बोले बताते हैं, “अकोला में सात गांवों के 92 छोटे और सीमांत किसान 115 हेक्टेयर भूमि पर देसी कपास उगाते हैं। इनमें 15 महिलाएं हैं।” जिन किसानों के पास 1 से 2 हेक्टेयर भूमि है, वे प्रति एकड़ (0.5 हेक्टेयर) 4 से 5 क्विंटल (400 से 500 किग्रा.) छोटे रेशे वाले कपास उगाते हैं। राहुल कहते हैं, “हम उनके कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा 6,000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीद लेते हैं। यह खुले बाजार की कीमत से 600-800 रुपए ज्यादा है। हम ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं क्योंकि हाइब्रिड कपास की तुलना में देसी कपास से बीज और फाहा की प्राप्ति ज्यादा होती है।” पिछली कटाई के बीजों से उगाए गए कपास की मात्रा और गुणवत्ता खराब होती है। खुले बाजार में यह 5,000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बेचा जाता है।

चेतना ऑर्गेनिक के कृषि विज्ञानी अशोक कुमार महावाडी कहते हैं, “ये किसान गाय के गोबर, गोमूत्र तथा घरेलू रूप से निर्मित अन्य उर्वरकों जैसी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। वे नीम का कीटनाशक के रूप में उपयोग करते हैं तथा भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए फसलों में नियमित बदलाव, मिश्रित खेती और समय पर छटाई जैसे प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह मि‍ट्टी की नैसर्गिक प्रकृति और जैव-विविधता बनी रहती है।” इस तरह यह संगठन देश के अधिकांश हिस्सों में रासायनिक रूप से उगाए जाने वाले बीटी कॉटन की खेती को रोकता है।

सूत्रकार द्वारा उत्पादित देसी धागों का एक हिस्सा रंगाई के लिए तमिलनाडु के इरोड में स्थित गैर-लाभकारी संगठन वृक्षाटन को भेजा जाता है। दूर होने के बावजूद चेतना ऑर्गेनिक द्वारा वृक्षाटन के साथ काम करने को प्राथमिकता दी जाती है। इस बारे में रूबी कहती हैं, “वे विश्वसनीय प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त गहरे और चमकदार रंगों का प्रयोग करते हैं। वृक्षाटन के पास देश में सर्वश्रेष्ठ रंगीन धागे उपलब्ध कराने का कौशल और ज्ञान है। देश के पूर्वी भाग की तुलना में इरोड का कम नमी वाला मौसम धागों के जल्दी सूखने में मदद करता है।” रूबी के अनुसार, “हमें वृक्षाटन के साथ काम करते हुए चार वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं इसलिए हमें यह विश्वास है कि वे प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं। यह बहुत जरूरी है क्योंकि इसी से खरीदारों के बीच हमारी विश्वसनीयता तय होती है।”

वृक्षाटन के सह-संस्थापक ए शिवराज विस्तार से बताते हैं कि कच्चे धागों को रीठा के गाढ़े घोल में दो दिन तक भिगोकर रखा जाता है ताकि इससे बाहरी अशुद्धियां जैसे तेल, चिकनाई और मोम निकल जाएं। धोने के बाद ये धागे, पौधों से प्राप्त उत्पादों जैसे फूल, पत्ते और पेड़ों की छाल से बने रंगों से रंगने के लिए तैयार हो जाते हैं। डेल्फिनीयम के सूखे फूल लाल नीले रंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। चमकीला सुनहरा पीला रंग गेंदे के फूल से मिलता है। टकोमा के घंटी के आकार के फूल हल्के पीले रंग का स्रोत बनते हैं।

शिवराज कहते हैं, “हम ऐसे 18 तरह के कच्चे माल का इस्तेमाल करते हैं जो मुख्य रूप से स्थानीय वन्य समुदायों से खरीदा जाता है। सूखे पत्तों, फूलों या पौधे के अन्य हिस्सों को 2,500-3,000 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा जाता है।” दुर्लभ फूल साल में एक बार खिलते हैं। उदाहरण के लिए, डेल्फिनीयम का फूल दिसंबर के आखिर से लेकर फरवरी के बीच ऊटी और कोडईकनाल में खिलता है। ज्यादा कीमत होने के बावजूद वृक्षाटन डेल्फिनीयम के 35 से 50 किलोग्राम फूल खरीदता है। प्राकृतिक रूप से उगने वाले 100 किग्रा. जंगली फूलों से 8 से 10 किग्रा. रंग मिल जाते हैं। शिवराज बताते हैं, “ऐसे फूलों से काफी ज्यादा रंग मिलते हैं।” यह संगठन तमिलनाडु और इसके आसपास स्थित 10 से 12 गांवों के स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करता है।

वृक्षाटन के एक अन्य सह-संस्थापक ए थिरुमुरुगन कहते हैं, “रंग बनाने में काम आने वाला नौचार नामक पदार्थ भी प्राकृतिक होता है। इसे घास खाने वाले पशुओं जैसे गाय, बकरी, ऊंट, हिरण के अपशिष्ट या धान, गेहूं, बाजरा और दाल के अपशिष्ट से तैयार किया जाता है। नौचार को राजस्थान में बनाया जाता है लेकिन इसे मदुरै के स्थानीय व्यापारियों से खरीदा जाता है।”

थिरुमुरुगन बताते हैं, “15 किग्रा. धागे को हल्का रंग देने के लिए दो किग्रा. नौचार मिलाया जाता है तथा 15 किग्रा. धागे को गहरा रंग देने के लिए 5 किग्रा. नौचार मिलाया जाता है। वृक्षाटन एक महीने में 100 किग्रा. रंग का इस्तेमाल करता है, जिसकी लागत 125 रुपए से 150 रुपए प्रति किग्रा. है। कुल मिलाकर यह कंपनी एक किलोग्राम धागे को रंगने में 500 रुपए निवेश करती है तथा सूत्रकार जैसे ग्राहकों को 600 से 700 रुपए में बेचती है। रंगाई के बाद जो पानी बचता है उसमें प्राकृतिक तत्वों की मौजूदगी के कारण पोटेशियम व अन्य पोषक तत्वों की अधिकता होती है जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके बाद धागे बंगाल की महिला बुनकरों के पास पहुंचते हैं।”

करघे के लिए धागा तैयार करने के वास्ते धागे को दो दिन तक नीबू के पानी में भिगोया जाता है ताकि वह साफ और मुलायम हो जाए। नाडिया गांव के बागडंगा गांव की नोतुबा बीबी कहती हैं, “हम रसायनों का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि नीबू की खटास के कारण इसे उपयोग में लाते हैं।”

सूखने के बाद धागे को पके चावलों व भीगे हुए चावलों के माड़ में साना जाता है। नोतुबा बीबी बताती हैं, “इससे धागा बुनाई में लगने वाले झटकों को सहने योग्य बन जाता है।” यह प्रथा केवल पश्चिम बंगाल में है। धागे को कम-से-कम दो दिन सूखने के लिए छोड़ा जाता है। इसे लकड़ी के परंपरागत आयताकार ढांचे में लपेटा जाता है, जब जाकर धागा बुनाई के लिए तैयार होता है।

करघे पर धागा

करघे पर महिलाओं को एक साथ कई धागे बुनते हुए देखना बड़ा ही अद्भुत अनुभव होता है। ये करघे जमीन से दो फुट नीचे होते हैं तथा पैर से चलाए जाते हैं। नाडिया के दीदीपाड़ा गांव की नीलिमा प्रमाणिक कहती हैं, “धरती मां से हमारा संबंध बहुत जरूरी है क्योंकि हमारे काम में मानसिक स्थिरता और एकाग्रता आवश्यक है जो केवल धरती मां ही दे सकती है।” बुनकर बहुत अच्छा मलमल या मोटा सूती कपड़ा बनाते हैं जिस पर बंगाली धरोहर का प्रतीक जमदानी चित्र उकेरे जाते हैं।

डिजाइन के आधार पर एक करघे पर दो बुनकर साथ काम कर सकते हैं। जहां एक बुनकर कपड़ा बुनता है वहीं दूसरा आमतौर पर इमली के पेड़ की लकड़ी से बनी विशेष प्रकार की सुइयों से बारीकी से डिजाइन बनाता है। आखिरकार साड़ी या सूट का कपड़ा या दुपट्टा बनकर तैयार होता है। 12,000 और 24,000 रुपए की एक जमदानी साड़ी तैयार करने में 25 दिन का समय लग जाता है। लेकिन बुनकरों को हर महीने केवल 4,000 से 5,000 रुपए ही मिलते हैं। ‍हालांकि हर बुनकर यह मानता है कि उनकी मेहनत और कपड़ा तैयार करने में लगने वाले समय की तुलना में आमदनी कम है, फिर भी उनकी प्राथमिकता अधिक से अधिक काम हासिल करना होता है। एमजीजीएसएस के सह-संस्थापक और रूबी के पति अरूप रक्षित बताते हैं, “यदि हमें यह कला जीवित रखनी है तो बुनकरों की आमदनी उनके उत्पाद की कीमत के बराबर करनी होगी।”

एमजीजीएसएस अब इन पर्यावरण-अनुकूल कपड़ों को बेचने की योजना पर काम कर रहा है। राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान की पूर्व छात्रा नलिनी पांडे कहती हैं, “ये उत्पाद उत्कृष्ट और पर्यावरण-अनुकूल होने के साथ-साथ बनावट, डिजाइन तथा रंग के मामले में भी बहुत अच्छे हैं।” नलिनी नागपुर में फैशन स्टूडियो चलाती हैं जहां ब्रांडेड कपड़े बेचे जाते हैं तथा वे दो वर्षों से सूत्रकार की ग्राहक हैं। ये उत्पाद विभिन्न वस्त्र मेलों तथा ग्रामीण और शहरी बाजारों में बेचे जाते हैं। रूबी की बेटी प्रेरणा रक्षित उन्हें ऑनलाइन भी बेचती हैं तथा सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों के जरिए इनका प्रचार करती हैं।

अब रूबी का लक्ष्य नए प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए इन बुनकरों के कौशल का विकास करना है। वह स्वयं भी प्रशिक्षित बुनकर हैं तथा वह न केवल महिलाओं को छोटे रेशों वाले कपास से धागा बनाने के लिए प्रेरित करती हैं बल्कि कपड़े के नए रंगों, डिजाइन और बनावट के बारे में भी जानकारी देती रहती हैं। रूबी का कहना है कि एमजीजीएसएस का मुख्य संदेश सभी को जैविककपड़े उपलब्ध कराने के साथ जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना है।