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गढ़बो नवा छत्तीसगढ़…

राज्य सरकार नए छत्तीसगढ़ को गढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसका रास्ता गांवों से होकर गुजरता है। देखना यह है कि सरकार कितनी सफल होती है 

On: Tuesday 25 June 2019
 
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के लोहरसी गाँव में बनी गोठान। फोटो: पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के लोहरसी गाँव में बनी गोठान। फोटो: पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के लोहरसी गाँव में बनी गोठान। फोटो: पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर

पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर 

“नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी, छत्तीसगढ़ के ये चार चिन्हारी” जिसका मतलब है, यह प्राकृतिक नाले, पशुधन, कचरा या अपशिष्ट पदार्थों का भण्डार और बाड़ी का मतलब छोटी बागवानी या घर से सटे सब्जी की खेती। इस तरह से नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी, छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। चुनाव से पहले किए गए वादे के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार इस योजना को लागू कर रही है।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के संबलपुर गाँव के एक बुजुर्ग किसान पंचकौड़ राम का कहना है कि यह योजना अच्छी तो लग रही है। हालांकि पूरा लागू होने के बाद पता चलेगा। घरों में घुरुआ बनाने के ग्राम सेवक आया था सर्वे के लिए, हमारे घर में 11 गाय-बैल हैं पर जगह नहीं होने के कारण हम गोबर और दूसरा कचरा बाहर फेंकते हैं, इस लिए हमारे यहां घुरुआ नहीं बन सकता। गौठान को उन्होंने बहुत उपयोगी माना। यह किसानों के साथ-साथ बरदिहा  (गाय चराने वाले) लोगों के लिए भी अच्छा है। गौठान में गायों के लिए आवश्यक पैरा, पानी और वरदिहांओं के लिए आराम करने का एक छोटा सा कमरा भी बनाया गया है। यहां मवेशी सुबह आकर जमा होते हैं और फिर चरवाहों के साथ निकल पड़ते हैं। इस से चरवाहों को भी सुविधा हो गई है। एक गेट होने की वजह से मवेशियों के पीछे दौड़ भाग नहीं करना पड़ता।

इस तरह के और गोठान धमतरी जिले के लोहरसी ग्राम पंचायत के लोहरसी गांव में भी दिखाई दे रहे हैं। पहले खुला मैदान था, अब इसके चारों ओर अहाता है। पंचायत सचिव बेनीराम पाल इसे बहुत उपयोगी बताते हैं, लेकिन उपसरपंच गोपाल साहू उतने उत्साहित नजर नहीं आये। उन्होंने कहा कि यह योजना लागू करने से पहले हमसे सलाह नहीं ली गई, इसमें पैरा (धान की सूखी घास) आदि संग्रहण में जन सहयोग की बात की गई है, किसान पैरा तो दे रहे हैं, लेकिन उसे गौठान तक कैसे लायें, यह एक समस्या है जिसके लिए कोई फण्ड नहीं है।

छत्तीसगढ़ जहां 18 प्रतिशत लोग भूमिहीन किसान / मजदूर हैं और 56 प्रतिशत किसान दो एकड़ से कम जमीन वाले हैं, इस आबादी के दो-तिहाई हिस्से में पानी या नाले (नरवा), पशुधन (गरवा), उर्वरक (घुरवा) और पोषण के स्रोत (बारी) बहुत महत्वपूर्ण हैं। और इसलिए, गोथन (मवेशियों) की योजना, जिसमें आवारा मवेशी, जो परेशानी का सबसे बड़ा कारण बन गए हैं, को एक ही स्थान पर निषेचन और ऊर्जा प्रदान करने की मूल इकाई के रूप में चिह्नित किया गया है, और उसी की प्रतिक्रिया इस प्रकार है यह अभूतपूर्व है। 

गौरतलब है की, छत्तीसगढ़ में, लगभग 1200 मिलीमीटर वर्षा-जल 56,000 से अधिक तालाबों और 32500 नालों के माध्यम से नदियों में जाता है। तालाब और नदियों के बीच मौजूद ये जल निकासी छत्तीसगढ़ में भूजल रिचार्ज करने का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

कृषक समुदाय की एक बैठक में, जब भादी गाँव के महेतर राम मंडल किसानों की आय पर चर्चा कर रहे थे, तो एक किसान ने कहा, अगर आवारा पशुओं को नियंत्रित किया जाता है, तो किसान अपनी आय को दोगुना कर देगा। आप सिर्फ मवेशियों को नियंत्रित करें, बाकी किसानों को छोड़ दें। यह सिर्फ एक ग्रामीण की आवाज नहीं है, बल्कि पूरे भारत के किसानों की आवाज है। ट्रैक्टरों की बढ़ती उपस्थिति, कंबाइन हार्वेस्टर और घटती चरागाह भूमि के उपयोग ने बैल को गांवों में लगभग अनावश्यक संसाधनों में बदल दिया है। इसी तरह गायें भी उसी हालत में आ रही हैं। चर्चाओं में एक बात यह भी थी कि हमारे पूर्वज हमेशा सांड की बाहरी नस्ल लाते थे, लेकिन गायों को कभी नहीं लाते थे। इसके दो कारण थे।

मुख्य कारण यह था कि कम वजन वाली स्थानीय गाय की नस्ल को गोबर की प्रचुर मात्रा प्रदान करते समय कम से कम देखभाल की आवश्यकता होती है, जिसका उपयोग किसान भूमि के लिए जैविक घटक के मुख्य स्रोत के रूप में करते रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से परंपराओं के टूटने के कारण, उत्पादन लागत में वृद्धि हुई है, नई प्रजातियां बढ़ी हैं। इस परिप्रेक्ष्य ने गोठान की प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित किया है। गौठान, तीन एकड़ से कम नहीं, एक सुरक्षित भूमि, जहां गायों को आराम करने के लिए जगह, पीने के लिए पानी, साथ ही खाने के लिए पूर्ण या आंशिक चारा होता है, जिससे गोबर और अवशिष्ट चारे से उच्च गुणवत्ता की खाद बनती है और इस तरह किसानों को यह वापस मिल जाती है उचित मूल्य। यह पूरी तरह ऊर्जावान आत्मनिर्भर क्षेत्र होगा, जहां विभिन्न उपयोगों के लिए गोबर गैस और सौर ऊर्जा से ऊर्जा उत्पन्न की जाएगी। यह क्षेत्र मवेशियों के लिए दिन (डे केयर सेंटर) में एक दिन का विश्राम दिवस भी होगा और रात में आवारा पशुओं के लिए आरामगाह के रूप में काम करेगा।”

ज़ाहिर है अभी तो शुरुआत है, अभी से इसका आंकलन करना सही नहीं होगा लेकिन लगता है यह किसानों के और पर्यावरण के हित में एक बड़ा कदम है, ज़रुरत है इसे इमानदारी से और लोगों को विश्वास में लेकर काम करना है।