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“नया भारत” कितना नया?

स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाना गौरव की बात है लेकिन “नया भारत” बनाना लिखित संबोधन से कहीं बढ़कर है

By Richard Mahapatra

On: Wednesday 06 February 2019
 

तारिक अजीज / सीएसई

“सत्तर साल पहले सभी भारतीयों की ऐसी ही ऊर्जा, प्रयास और संकल्प ने देश को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्र किया था। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के 5 साल के भीतर देश स्वतंत्र हो गया। आज की तरह तब भी आधारशिला रखी गई थी लेकिन इसके लिए प्रतिबद्ध प्रयासों की जरूरत थी। प्रधानमंत्री की ओर से संकल्प से सिद्धि 2022-23 तक नए भारत के निर्माण का आवाहन है।” ये बातें नीति आयोग के उस दस्तावेज में हैं जो न्यू इंडिया@75 नाम से जारी किया गया है। इसकी प्रस्तावना में उन रणनीतियों का उल्लेख है जो नए भारत के निर्माण में सहायक हैं। ऐसा लग रहा है कि नया भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हमें उपहार में मिल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह चुके हैं कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से आजादी महज पांच साल (उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में शुरू किया था) में दिला दी थी। 2018 में एक रणनीतिक दस्तावेज और नया भारत हासिल कर वह भी इसे दोहरा सकते हैं।

योजना आयोग को भंग कर बने नीति आयोग ने करीब चार साल में जितने दस्तावेज निकाले हैं, उनमें सर्वाधिक चर्चा इसी की हो रही है। इसके पास देश के लिए एक दृष्टि है और यह देश के कार्यकारी प्रमुख की दृष्टि के समानांतर देखता है। दावा है कि इसने चार से पांच साल के लिए विकास का नया ब्लूप्रिंट बनाने में 1,300 सरकारी और गैर सरकारी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा किया है। प्रस्तावित नए भारत की तह में जाने से पहले, आइए देखते हैं कि दस्तावेज साफ तौर पर क्या कहता है। इसकी भाषा, संदर्भ और प्रस्तावना से प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी के बाद हमारे पास ऐसा एक और महात्मा है जो देश को एक नई व्यवस्था दे सकता है। नीति आयोग के इस दस्तावेज में भारत छोड़ो आंदोलन को बेंचमार्क बनाया गया है।

ऐसे में यह दलील दी जा सकती है कि आजादी के बाद यह भारत का पहला दृष्टिपत्र है। दस्तावेज की शुरुआती टिप्पणी में मोदी कहते हैं कि यह एक जन आंदोलन है। मोदी ने अपने कार्यकाल में इस शब्दावली का जमकर प्रयोग किया है। लगता है कि उन्होंने यह शब्दावली गैर सरकारी संगठनों से छीन ली है। इस मामले में हालिया इतिहास में कोई प्रधानमंत्री इतना कामयाब नहीं हुआ है। उनकी “नई” दृष्टि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के “नियति से भेंट” आवाहन से मिलती जुलती है। इसमें हैरानी नहीं है कि 2022-23 से पहले के पुराने भारत की तमाम बुराइयों के लिए नेहरू का संदर्भ दिया जा रहा है।

नए भारत के आवाहन के बीच जब रणनीतिक दस्तावेज को गौर से देखा जाए तो यह आवाहन औंधे मुंह गिरता है। बदलाव के मुख्य घटकों में रोजगार, आर्थिक विकास, किसानों की दोगुनी आय और सबके लिए आवास के अलावा सेवा क्षेत्र का विस्तार शामिल है। ध्यान से इन पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि जिस नए भारत की बात हो रही है उसमें कुछ भी नया नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये सभी घटक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं। इनके लिए बन रही रणनीतियां नई नहीं हैं। कहा जा रहा है कि देश में कृषि विकास दर बढ़ाने की जरूरत है, रोजगार के अवसर पैदा होने चाहिए और कृषि बाजार में सुधार की आवश्यकता है।

1950 के दशक में भी यही बातें होती थीं। तब नया-नया आजाद हुआ भारत विकास की रणनीतियों का खाका बना रहा था। तब भी नीति निर्माताओं और राजनीतिक नेतृत्व ने विकास के घटक चिन्हित कर लिए थे। अब भी वही स्थिति है। भारत अब तक इन घटकों को विकास के पथ पर अग्रसर नहीं कर पाया है। ऐसे में पुराना आवाहन दोहराना नए दृष्टिकोण के बजाय असफलताओं को स्वीकार करने के अलावा कुछ नहीं है।