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प्री-प्राइमरी शिक्षा से वंचित हैं दुनिया के सबसे कमजोर तबके के 80 फीसदी बच्चे

प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए दी जा रही मदद का अनुपात 2015 में 0.8 फीसदी से बढ़कर 2019 में 0.9 फीसदी पर पहुंच गया है

By Lalit Maurya

On: Friday 23 July 2021
 

कहते हैं बच्चे भविष्य का आधार हैं, जिन पर हमारा कल निर्भर है। यही वजह है कि देश दुनिया में बच्चों की शिक्षा पर इतना महत्व और ध्यान दिया जाता है। इसके बावजूद आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर में शिक्षा के विकास के लिए दी जा रही मदद का एक फीसदी से भी कम हिस्सा प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए दिया जा रहा है।

यदि इसे प्रति बच्चे के हिसाब से देखें तो हर बच्चे की प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर प्रतिवर्ष करीब 25 रुपए की मदद दी जा रही है। ऐसे में आप खुद ही समझ सकते हैं कि दुनिया में प्री-प्राइमरी एजुकेशन की क्या स्थिति होगी। यही वजह है कि गरीब और कमजोर तबके से संबंध रखने वाले करीब 80 फीसदी बच्चे आज भी प्री-प्राइमरी एजुकेशन से वंचित हैं।

अनुमान है कि लगभग 5 करोड़ बच्चे और बच्चियां पैसों की कमी के चलते प्री-प्राइमरी शिक्षा से वंचित हैं। यह जानकारी हाल ही में जारी रिपोर्ट 'अ बेटर स्टार्ट' में सामने आई है, जिसे बच्चों के लिए काम कर रही संस्था कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी एकेडमिक्स फॉर देयरवर्ल्ड द्वारा जारी किया गया है। 

शोध से पता चला है कि प्री-प्राइमरी एजुकेशन बच्चे के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए बहुत मायने रखती है। जो बच्चे जीवन के शुरुवाती वर्षों में सीखने से चूक जाते हैं वे प्राथमिक शिक्षा शुरू होने से पहले ही पिछड़ जाते हैं। वहीं जिन बच्चों ने कम से कम एक वर्ष प्री-प्राइमरी शिक्षा ग्रहण की थी, उनके मानसिक विकास और कौशल में वृद्धि होने की सम्भावना कहीं अधिक थी। साथ ही उनमें आगे चलकर स्कूल छोड़ने की सम्भावना भी कम देखी गई थी।

इसके बावजूद अभी भी दुनिया भर में बच्चों की प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आज भी प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए दी जा रही सहायता राशि काफी कम है विश्लेषण के अनुसार प्री-प्राइमरी एजुकेशन की तुलना में माध्यमिक शिक्षा के लिए औसतन 37 गुना अधिक धनराशि मदद स्वरुप दी जा रही है। 

दुनिया भर में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मदद करने वाले 30 प्रमुख देशों और सस्थाओं में से आठ ने प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर एक रुपए भी खर्च नहीं किए थे।  इनमें नीदरलैंड, कतर, स्वीडन और सऊदी अरब शामिल हैं। वहीं अमेरिका, फ्रांस, डेनमार्क और जर्मनी सहित 16 देशों ने अपने शिक्षा सहायता बजट का आधा फीसदी से भी कम हिस्सा प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए दिया था। वहीं यूके 1.1 फीसदी, इटली 1.8 फीसदी, बेल्जियम 1.9 फीसदी, चेक गणराज्य और दक्षिण कोरिया ने करीब 2.2 फीसदी इस पर खर्च किया था।

सभी डोनर्स में से केवल यूनिसेफ और ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन ही ऐसे हैं जिन्होंने पिछड़े देशों में प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए अपने शिक्षा सहायता बजट का कम से कम 10 फीसदी हिस्सा दिया था। इसके बाद आपातकाल के लिए बनाए फण्ड, एजुकेशन कैन नॉट वेट ने प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए अपने शिक्षा बजट का 8.6 फीसदी हिस्सा दिया था। इसके बाद न्यूजीलैंड 6.7 फीसदी और वर्ल्ड बैंक 3.8 फीसदी का नंबर आता है। हालांकि वो प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए अनुशंसित 10 फीसदी के लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 

प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर एक रुपए का निवेश भविष्य में देगा 17 रुपए का फायदा

हालांकि विश्लेषण से जुड़े आंकड़ें दिखाते हैं कि प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए दी जा रही मदद का अनुपात बढ़ रहा है पर वो काफी धीरे हैं। जहां 2015 से 2019 के बीच यह 0.8 फीसदी से बढ़कर 0.9 फीसदी पर पहुंच गया है, जोकि करीब 1,063 करोड़ रुपए के बराबर है । वहीं अनुमान है कि यदि डोनर वैश्विक स्तर पर प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए सिफारिश किए गए 10 फीसदी के बजट को हासिल कर लेते हैं तो एक साल में इसका फायदा पिछड़े और कम आय वाले देशों में रहने वाले 64 लाख बच्चों को मिलेगा।

कहते हैं आप जैसे बोते हैं वैसा ही काटते हैं यदि इस निवेश के लाभ की बात करें तो बच्चों की देखभाल और बुनियादी शिक्षा पर लगाए गए प्रत्येक रुपए के बदले 17 रुपए का फायदा मिलेगा। वहीं यदि अफ्रीका की बात करें तो यह रिटर्न 33 रुपए के बराबर है।    

रिसर्च फॉर इक्विटेबल एक्सेस एंड लर्निंग (आरईएएल), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की निदेशक और इस रिपोर्ट से जुड़ी पॉलीन रोज ने कहा कि इस मामले में इंटरनेशनल डोनर्स को तुरंत करवाई करने की जरुरत है। किसी बच्चे के जीवन के शुरुवाती पांच वर्ष आगे चलकर उसके विकास के लिए बहुत मायने रखते हैं ऐसे में इसपर किया निवेश समाज के सबसे कमजोर और पिछड़े तबके से सम्बन्ध रखें वाले बच्चों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होगा।

उन्होंने आगे कहा कि यह किसी त्रासदी से कम नहीं है कि विश्व के नेता इस क्षेत्र में खर्च को प्राथमिकता देने में विफल रहे हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तुरंत कार्रवाई करने की जरुरत है, नहीं तो दुनिया के सबसे गरीब, पिछड़े और हाशिए पर रह रहे लोग और पिछड़ते जाएंगें। वहीं देयरवर्ल्ड की अध्यक्ष सारा ब्राउन ने कोविड-19 के शिक्षा पर पड़ रहे असर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कोविड -19 ने वैश्विक शिक्षा पर संकट को और बढ़ा दिया है। जिसने दुनिया के सबसे गरीब, पिछड़े बच्चों को हाशिये पर धकेल दिया है। लेकिन हम इसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते।