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बैठे ठाले: एक रुका हुआ फैसला

हमसे मत पूछो कैसे/ मंदिर टूटा सपनों का/ लोगों की बात नहीं है/ ये किस्सा है अपनों का...

By Sorit Gupto

On: Tuesday 11 February 2020
 
एक रुका हुआ फैसला
सोरित / सीएसई सोरित / सीएसई

हाल ही में एक बहुत बड़े घोटाले का पर्दाफ़ाश हुआ जब पाया गया कि देश की एक सबसे कठिन सरकारी परीक्षा में पैंतीस सफल परीक्षार्थियों में अट्ठारह एक बदनाम विश्वविद्यालय से हैं । इस घोटाले की जांच के लिए तुरत-फुरत एक उच्चस्तरीय-कमिटी गठित की गई। कमिटी ने उक्त बदनाम विश्वविद्यालय के चप्पे-चप्पे का दौरा किया। आखिरकार विश्वविद्यालय के उत्तरी गेट के सामने से उन्हें एक उत्तर-पुस्तिका (आन्सर-शीट) मिली जो चीख-चीख कर कह रही था कि परीक्षा के हफ्ते भर बाद प्रश्नपत्र लीक कर दिए गए थे। पेश है पूरी कार्यवाही का आंखों देखा हाल।

खोज टीम का एक सदस्य मिमियाते हुए चीख रहा है, “मीलार्ड! पहले प्रश्न में निम्न पक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या करने के लिए कहा गया है- चिंगारी कोई भड़के/तो सावन उसे बुझाए/सावन जो अगन लगाए/उसे कौन बुझाए?”

ज्यादातर परीक्षार्थियों ने इसे ऑस्ट्रेलिया के बुश फायर से जोड़कर देखा मीलार्ड। मगर देखिये यहां क्या लिखा गया है। यह परीक्षार्थी लिखता है, “प्रस्तुत पद्यांश में शायर समाज को भड़का रहा है। इन पंक्तियों में शायर एक खास दिन की चर्चा कर रहा है। लाइब्रेरी में छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। अचानक कुछ नकाबपोश लोग कॉलेज के विभिन्न हॉस्टलों में घुस आते हैं और छात्र-छात्राओं को तोड़ने-फोड़ने लगते हैं। छात्र पुलिस से गुहार लगाते हैं। पुलिस आती है और मार खाए लहूलुहान छात्रों को पकड़ कर ले जाती है।”

“मीलार्ड! परीक्षार्थी आगे लिखता कि शायर निम्न पंक्तियों में पूछ रहा है कि निहत्थे छात्र-छात्राओं को बचाने की जगह पुलिस इन निहत्थे-लहूलुहान छात्र-छात्राओं पर कार्यवाही करे तो कोई क्या करे?”

“अपनी अगली पंक्तियों में विश्वविद्यालय प्रशासन की आलोचना की गई है। कविता की लाइनें हैं- पतझड़ जो बाग उजाड़े/ वो बाग बहार खिलाए/जो बाग बहार में उजड़े/उसे कौन खिलाए?”

परीक्षार्थी लिखता कि शायर निम्न पंक्तियों में पूछ रहा है कि अगर विश्वविद्यालय में कोई समस्या है तो विश्वविद्यालय प्रशासन उसको सुधारता है पर अगर खुद विश्वविद्यालय प्रशासन ही गड़बड़ी करे तो उसे कौन सुधारेगा?”

“मीलार्ड! आगे की पंक्तियां हैं- हमसे मत पूछो कैसे/मंदिर टूटा सपनों का/ लोगों की बात नहीं है/ ये किस्सा है अपनों का। परीक्षार्थी लिखता है कि शिक्षा के मंदिर यानी विश्वविद्यालय में जो तोड़ फोड़ हुई है उससे वह आहत है क्योंकि यह सब कुछ प्रशासन के एक्टिव सपोर्ट से हुआ।”

“मीलार्ड! कविता में आगे है- ना जाने क्या हो जाता/जाने हम क्या कर जाते/पीते हैं तो जिन्दा हैं/ना पीते तो मर जाते। परीक्षार्थी लिखता है, हम छात्रों को बस अपने खून का घूंट पीकर रहना पड़ रहा है।

मीलार्ड! सफल परीक्षार्थियों में से कुल अट्ठारह लोगों ने हूबहू यही लिखा और सब के सब इसी बदनाम विश्वविद्यालय के छात्र हैं। कविता में है- दुनिया जो प्यासा रखे/ तो मदिरा प्यास बुझाए/मदिरा जो प्यास लगाए/ उसे कौन बुझाए।

मीलार्ड इन पंक्तियों से यह स्पष्ट है कि उक्त विश्वविद्यालय के छात्र नशेड़ी हैं। उच्चस्तरीय जांच कमेटी के सदस्यों ने विभिन्न कूड़ेदानों को खंगाल कर बड़ी मात्रा में अधजलि सिगरेट, बीड़ी और साथ ही पऊवा, खंभा बरामद किया है।

उच्चस्तरीय कमिटी अब पूरे मामले की आगे जांच कर रही है।