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क्या प्रवासी मजदूरों के सैलाब को रोक सकते थे सस्ते किराए के मकान?

सोशल रेंटल हाउसिंग को लेकर भारत में बात तो कई सालों से चल रही है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि देश में इसकी सख्त जरूरत है

By Rajneesh Sareen, Mitashi Singh, Lalit Maurya

On: Tuesday 21 April 2020
 
फोटो:  विकास चौधरी
फोटो:  विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

देश भर में कोरोनावायरस के चलते तालाबंदी कर दी गयी है। जो जहां हैं वहीं फंसा है। ऐसे में काम धंधे के लिए दूर-दराज से आये गरीब तबके और मजदूरों पर तो जैसे विपत्ति का पहाड़ ही टूट पड़ा है। तालाबंदी है तो कोई बाहर नहीं आ सकता। घर में रहकर तो काम मिलेगा नहीं। और जब मजदूरों के पास काम नहीं होगा, तो मजदूरी कहां से मिलेगी। ऐसे में लाखों करोड़ों मजदूरों के सामने न केवल दाने पानी की समस्या है, साथ ही मकान का किराया भी एक बड़ी आफत है।

यही वजह है कि शहरों में रह रहे अनगिनत मजदूरों ने ऐसे समय में अपने गांव लौटने में ही भलाई समझी और देश में आज प्रवास की उलटी धारा बह रही है। जहां लोग काम के लिए अपने गांव कस्बों से शहरों की ओर जाते थे। अब वही लोग वापस अपने गांव की ओर लौट रहे हैं। और विडम्बना देखिये कि उनमें से कई तो पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने को तैयार हैं। दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ जैसे अनगिनत शहरों से इसी तरह से लोग अपने गावों की ओर लौट रहे हैं।

राज्य सरकारों के पास खाना तो है पर सभी को रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। ऐसे में सोशल डिस्टन्सिंग का भी ख्याल रखना है। दिल्ली को ही ले लीजिए, जहां करीब 18,478 लोगों के लिए अस्थायी तौर पर रहने की व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद हजारों कामगारों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। यही वजह है कि ओडिशा ओर दिल्ली जैसे कई राज्यों ने मकान मालिकों से अपील की है कि विपत्ति की इस घडी में या तो किराया माफ़ कर दें या फिर कुछ समय बाद वसूल करें।

ऐसे में एक बड़ा प्रश्नचिन्ह हमारी आवास सम्बन्धी नीतियों पर भी उठता है। जहां देश और राज्य स्तर पर अभी भी सोशल रेंटल हाउसिंग सम्बन्धी कोई नीति नहीं है। गौरतलब है कि सोशल रेंटल हाउसिंग का मतलब है कि गरीब और मजदूर तबके के लिए सस्ते किराये पर मकान की व्यवस्था करना। जिससे सभी को सिर छुपाने के लिए छत मिल सके। राज्य सरकारें बड़े जोश में लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए घरों का निर्माण कर रही है। केंद्र ने भी प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत की, जिसका मकसद है देश में मकानों की कमी की इस बढ़ती खाई को पाटा जा सके। यह योजना चार मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित है:-

  • झुग्गी बस्तियों का पुनरुद्धार करना।
  • जरूरतमंदों के लिए घरों का निर्माण करना।
  •  निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में सस्ते मकान उपलब्ध कराना।
  • लोगों को मकान खरीदने में मदद के लिए सब्सिडी देना।

पर इन सभी फ्लैगशिप स्कीम में सोशल रेंटल हाउसिंग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

धीरे ही सही, कुछ राज्यों में हो रहा है इस दिशा में काम

राष्‍ट्रीय शहरी आवास और पर्यावास नीति, 2007 में इसका प्रावधान किया गया था। इसके अंतर्गत शहरी क्षेत्रों में किराये पर मकान की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण को अपनाने पर जोर दिया गया था। जिसमें सोशल रेंटल हाउसिंग को भी शामिल किया गया था। इसके साथ ही केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने भी मजदूरों के लिए आवास बनाने पर जोर दिया था। जिसके लिए राज्यों को श्रमिक कल्याण कोष का उपयोग करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि धीरे धीरे राज्य सस्ते किराये पर मकान उपलब्ध करने की दिशा में काम कर रहे हैं, फिर भी इसके लक्ष्य को हासिल करने में उन्हें एक लम्बा वक्त लगेगा।

उदाहरण के लिए, मुंबई महानगर विकास प्राधिकरण, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत 8 शहरों में इस तरह के करीब 2.5 लाख मकानों के निर्माण पर काम कर रहा है। ओडिशा में भी बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड भी राज्य के श्रम विभाग के साथ मिलकर प्रवासी मजदूरों के लिए सस्ते घरों के निर्माण पर कार्य कर रहा है। इसके बावजूद इनमें अभी भी किसके रखरखाव, प्रबंध को लेकर काफी समस्याएं बाकी हैं। यह घर दूर दराज के क्षेत्रों में होने के कारण उपयोग नहीं हो पा रहे हैं। साथ ही इनके डिज़ाइन भी एक चिंता का विषय है।

अभी दूर है मंजिल 

किराये के लिए बने मकानों में निजी क्षेत्र की न तो कोई ज्यादा रूचि नहीं है। न ही यह उनकी प्राथमिकता में शामिल है। सरकार को इसपर अभी और ध्यान देने की जरुरत है। इसके लिए ज्यादा वित्त, ज्यादा ध्यान और आकर्षक पैकेज देना होगा। जिससे इसका भी विकास हो सके। इसी को देखते हुए 2015 में नेशनल अर्बन रेंटल हाउसिंग पॉलिसी को जारी किया गया था।

इसमें विभिन्न प्रकार के घरों की जरूरतों को ध्यान में रखा गया था। जो इस प्रकार हैं:

  • शहरों में रहने वाले बेघर गरीबों के लिए सस्ते किराये पर मकान उपलब्ध कराना।
  • प्रवासी मजदूरों, अकेले रहने वाले पुरुष और महिलाओं और छात्रों के लिए किराये पर घर उपलब्ध कराना।
  • अमीर तबके और सरकारी कर्मचारियों सहित जिन लोगों को किराये पर घर लेना है उनके लिए बाजार मूल्य पर आधारित किराये पर आवास देना|

इसके मसौदे में विभिन्न प्रकार के मॉडल सुझाए गए हैं। जो हर किसी के लिए अलग-अलग दर पर आवास उपलब्ध कराने के लिए रूपरेखा प्रदान करते हैं। इसमें रेंट-टू-ओन जैसे योजनाएं शामिल हैं। जिसमें कोई भी एक निश्चित अवधि के लिए लीज पर घर ले सकता है। इसके अंतर्गत घर लेने वाला व्यक्ति एक निश्चित मासिक क़िस्त का भुगतान करता है। जिसका कुछ हिस्सा किराया और शेष राशि बचत के रूप में होती है। इस योजना के तहत जब भुगतान की गई राशि कुल इकाई मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत को प्राप्त कर लेती है (लगभग 10 प्रतिशत या तय की गई)।  तब वो घर लाभार्थी के नाम पर पंजीकृत कर दिया जाता है। एक बार जब उसकी पूरी कीमत भुगतान कर दी जाती है तो लाभार्थी को उसका पूर्ण स्वामित्व दे दिया जाता है।

इस योजना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किरायेदार अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। क्योंकि इस योजना में मकान मालिक सरकार होती है। उम्मीद कर सकते हैं कि कोविड-19 के खतरे को देखते हुए इन लोक कल्याणकारी योजनाओं में तेजी आएगी। अब तक चंडीगढ़ रेंट-टू-ओन स्कीम लागू कर चुका है जबकि आंध्र प्रदेश में भी इसे बढ़ावा देने के प्रयास किये जा रहे हैं।

कोरोनावायरस के खतरे ने स्पष्ट कर दिया है कि हम जड़ नीतियों के बल पर इस तरह की समस्याओं और बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर सकते। इसलिए उनमें जल्द बदलाव किये जाने की जरुरत है। सोशल रेंटल हाउसिंग ऐसी ही एक जरुरत है।

आज नेशनल अर्बन रेंटल हाउसिंग पालिसी को शीघ्रता से लागु करने की जरुरत है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वो इस पर ध्यान दे। और खुद आगे बढ़कर इस अन्य हाउसिंग योजनाओं कि तरह ही इसे भी लागु करे। साथ ही राज्यों को भी चाहिए कि वो इसे प्राथमिकता दें और इन योजनाओं में जो दिक्कतें आ रही हैं उन्हें जितना जल्द हो सके दूर करें। क्योंकि प्रवास का जो संकट आज सामने आया है। उसपर अभी ध्यान देना जरुरी है। जिससे भविष्य में ऐसा संकट फिर न उत्पन्न हो| और किसी को बेघर होकर, दर-बदर ने भटकना पड़े।