Sign up for our weekly newsletter

जहां थी पहले नदी, वहां बिछाई जा रही है मेट्रो लाइन?

कोलकाता के बहूबाजार में मेट्रो की सुरंग बनाते वक्त निकला पानी, आसपास के घरों में आई दरार, हादसे के डर से 700 लोगों को हटाया

By Umesh Kumar Ray

On: Monday 16 September 2019
 
कोलकाता के बहूबाजार में सुरंग बनाने के चलते हो रहा पानी रिसाव। फोटो: उमेश कुमार राय
कोलकाता के बहूबाजार में सुरंग बनाने के चलते हो रहा पानी रिसाव। फोटो: उमेश कुमार राय कोलकाता के बहूबाजार में सुरंग बनाने के चलते हो रहा पानी रिसाव। फोटो: उमेश कुमार राय

मध्य व उत्तर कोलकाता शहर का सबसे पुराना हिस्सा है। सुबीर कुमार दत्ता के पूर्वज बहूबाजार में ही रहते थे। कहते हैं, “करीब 200 साल से हमारे पूर्वज यहां रहते थे। 1 सितंबर से हमें अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा। फिलहाल हम परिवार के साथ एक गेस्टहाउस में ठहरे हुए हैं और प्रशासन से मदद का इंतजार कर रहे हैं।” सुबीर कुमार दत्ता की तरह ही अन्य परिवार भी अपना आशियाना छोड़ कर इधर-उधर भटक रहे हैं।” सुबीर का परिवार उन परिवारों में से एक है, जिन्हें पिछले कुछ दिनों के दौरान अपना घर छोड़ कर जाना पड़ा।

दरअसल, केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना ईस्ट वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के बहूबाजार में दो हफ्ते पहले सुरंग खोदनी शुरू की गई थी। इसके लिए ड्रिलिंग मशीन से गड्ढा करना शुरू किया गया, लेकिन उस वक्त इंजीनियरों के होश फाख्ता हो गए, जब गड्ढे से पानी का रिसाव होने लगा और आसपास की बिल्डिंगों में दरारें आने लगीं। इस वजह से काम तत्काल के लिए रोक दिया गया है और करीब 700 लोगों को सुरक्षा कारणों से शिफ्ट करना पड़ा।

इस घटना को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि इंजीनियरों व सर्वे टीम ने स्थानीय इतिहास की अनदेखी की है, जिसका खामियाना स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वे कोलकाता के पुराने मानचित्रों की मदद से दावा करते हैं कि पहले उस रास्ते से होकर एक छोटी नदी बहती थी, जिसे अंग्रेजी में ‘क्रीक’ कहा जाता है। बांग्ला में इसे ‘खाल’ कहते हैं।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के फैकल्टी मेंबर व नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के गेस्ट लेक्चरर प्रो. आलोक कुमार कहते हैं, “इसको लेकर हमने पुराने कलकत्ता के कई मानचित्रों का अध्ययन किया है। इनमें वर्ष 1784-85 में कर्नल मार्क वुड और 1792-93 में ए. अपजॉन द्वारा तैयार किए गए मानचित्र सबसे अहम हैं। इन मानचित्रों का अध्ययन करते हुए मैंने पाया कि जिस जगह पर बिल्डिंगें टूटी हैं और उनमें दरारें आई हैं, वहां से होकर कभी पानी की धारा बहती थी।”

कोलकाता का पुराना नक्शा दिखाते प्रो. आलोक कुमार। फोटो: उमेश कुमार राय

बताया जा रहा है कि ये धारा हुगली नदी से निकली थी और बाबू घाट, हेस्टिंग्स स्ट्रीट, क्रीक रोड, सियालदह आदि से होते हुए साल्टलेक तक गई थी। जानकार बताते हैं कि इस छोटी नदी की वजह से ही बहूबाजार में एक सड़क का नाम क्रीक रोड पड़ा है।

कोलकाता के जलाशयों पर शोधपरक किताब ‘फाइव थाउजेंड मिरर्स’ लिखने वाले जाने-माने पर्यावरणविद मोहित रे ने डाउन टू अर्थ को बताया, “ये छोटी नदी हमारे लिए कोई नई जानकारी नहीं है। ऐतिहासिक दस्तावेजों में ये दर्ज है।”  उन्होंने कहा कि ‘क्रीक’ होने के कारण ही उसके आसपास हावड़ा से मछुआरे आकर बस गए थे। इसमें वे मछलियां पकड़ते थे और आसपास के बाजार में बेचते थे।  फाइव थाउजेंड मिरर्स में मोहित रे लिखते हैं, “मध्य कोलकाता का हिस्सा जो अब मोचीपाड़ा थाना क्षेत्र में आता है, को पहले जेलेपाड़ा (मछुआरों को बांग्ला में ‘जेले’ कहा जाता है। और ‘पाड़ा’ मोहल्ले को कहा जाता है) कहा जाता था। अभी ये हिस्से बहूबाजार के वार्ड नं. 47, 48, 50 और 51 में आते हैं।”

माल ढुलाई व आवाजाही में सहूलियत के लिए अंग्रेज जलमार्ग का ज्यादा इस्तेमाल करते थे। 17वीं व 18वीं शताब्दी के ऐसे तमाम साक्ष्य मिलते हैं, जो इसकी पुष्टि करते हैं। कोलकाता से गुजरनेवाली जिस नालानुमा नदी को  आज आदिगंगा कहा जाता है, उसे कभी टॉली नाला कहा जाता था, क्योंकि व्यापार की सहूलियत के लिए 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर कर्नल विलियन टॉली ने इसे गहरा करवाया था। इसी तरह बहूबाजार से होकर बहनेवाली धारा को भी अंग्रेजों ने गहरा करवाया था, ताकि जहाजों के आने-जाने में कोई दिक्कत न हो।

माना जाता है कि 1737 में आए एक भीषण तूफान और भूकंप ने इस नदी की मौत की पटकथा लिख दी थी। हालांकि, भूकंप का जिक्र प्रो. आलोक कुमार ने नहीं किया है, मगर करेंट साइंस में ‘ए प्रोब इंटू द कलकत्ता अर्थक्वेक ऑफ 1737’ शीर्षक से छपे एक  शोध में तूफान के साथ ही भूकंप का भी जिक्र किया गया है।

वर्ष 1737 में आया तूफान इतिहास में अब तक के सबसे विध्वंसकारी तूफानों की फेहरिस्त में दर्ज है। हैरिकेन साइंस की वेबसाइट के अनुसार, 11 अक्टूबर की सुबह कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में तूफान ने दस्तक दी थी। इस तूफान की रफ्तार करीब 330 किलोमीटर प्रति घंटे थी और महज 6 घंटे में 381 मिलीमीटर बारिश हुई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने दर्ज किया था कि इस तूफान के कारण कोलकाता में करीब 3000 लोगों की मौत हुई थी। तूफान में गंगा में खड़े 9 में 8 नाव लापता हो गए थे। 20 हजार से ज्यादा जहाज क्षतिग्रस्त हो गए थे।

वहीं, करेंट साइंस में सितंबर 1995 के संस्करण में छपे एक शोधपत्र में कई स्रोतों के हवाले से लिखा गया है, “ऐतिहासिक दस्तावेज के गहन अध्ययन के बाद लेखक पूरे विश्वास के साथ ये कहता है कि 11-12 अक्टूबर 1737 को कोलकाता में भूकंप आया था। अध्ययन से ये भी साफ है कि ये भूकंप, तूफान के लैंडफाल करने के दौरान आया था।” 

कहा जाता है कि तूफान और भूकंप के इस दोहरे असर से बहूबाजार से होकर गुजरनेवाली छोटी नदी से होकर पानी का बहाव रुक गया। कालांतर में जब इसका और कोई इस्तेमाल रह नहीं गया, तो इसे भर कर लोगों ने इस पर मकान बना लिया।

प्रो. आलोक कुमार कहते हैं, “मुझे संदेह है कि कोलकाता मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, जो ईस्ट-वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर की एक्जिक्यूटिंग एजेंसी है, ने सुरंग खोदने से पहले वहां के भूगर्भ की स्थिति का पता लगाने के लिए पुराने मैप का सहारा लिया होगा।” वहीं, मोहित रे ने कहा कि अगर इंजीनियरों ने बहूबाजार की लोकल हिस्ट्री जानने की जहमत उठाई होती, तो आज सैकड़ों लोग बेघर नहीं होते।