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विशेष रिपोर्ट भाग-3 : स्थायी निवासी होने की शर्त प्रवासियों से छीन लेती है रोजगार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 किसी को भी जन्मस्थान और किसी अन्य बुनियाद के आधार पर भेदभाव से प्रतिबंधित करता है। 

By Vivek Mishra

On: Wednesday 29 April 2020
 

देश में रोजगार के लिए स्थायी निवासी (डोमिसाइल) होने की शर्त या अनिवार्यता के नाम पर अब भी प्रवासी मजदूरों के साथ भेद-भाव जारी है। राज्यों में इस तरह के कानूनी प्रावधान के चलते प्रवासी मजदूरों को रोजगार के अवसरों से वंचित होना पड़ता है, जबकि यह पूरी तरह असंवैधानिक है। आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय के अधीन 18 सदस्यीय वर्किंग ग्रुप ने सभी राज्यों से सिफारिश की है कि वे जल्द से जल्द बेहद सक्रियता के साथ रोजागार के कानूनी प्रावधानों में ‘डोमेसिल’ यानी स्थायी निवासी होने की शर्त को निकाल दें, ताकि दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को गंतव्य (डेस्टिनेटेड) राज्यों में आसानी से रोजगार मिल सके।

आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय के वर्किंग ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट के 2014 में (सिविल रिट याचिका संख्या 73/2013) चारू खुराना बनाम भारत सरकार के आदेश का हवाला भी दिया है। वर्किंग ग्रुप ने कोर्ट के आदेश के हवाले से कहा है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को देश में कहीं भी स्वंतत्र तरीके से प्रवास करने रहने-बसने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसके साथ ही संविधान का अनुच्छेद 15 किसी को भी जन्मस्थान और किसी अन्य बुनियाद के आधार पर भेदभाव से प्रतिबंधित करता है। वहीं, संविधान का अनुच्छेद 16 सभी को सार्वजनिक रोजगार के मामले में बराबरी के अवसर की गारंटी देता है। साथ ही खासतौर पर किसी भी सार्वजनिक रोजगार को जन्म स्थान और निवास के आधार पर पहुंच योग्य बनाने पर रोक लगाता है।

लॉकडाउन से उपजी अनिश्चितताओं के कारण 28 मार्च, 2020 से ही देश के प्रमुख दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े महानगरों से मजदूरों का अपने गांव-कस्बों में वापस पलायन जारी है। इस बीच वर्किंग ग्रुप की यह बात और ज्यादा उजागर हुई है कि देश में असंगठित मजदूरों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। साथ ही सबसे ज्यादा जोखिम भरा जीवन अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति (एससी) का है। वहीं, कई राज्यों में स्थायी निवासी (डोमेसाइल) होने की शर्त पर भेदभाव भी करते हैं।  

18 सदस्यीय विशेषज्ञों ने प्रवासी मजदूरों की सामाजिक, कानूनी सुरक्षा और योजनाओं संबंधी जागरुकता को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। इसे “रिपोर्ट ऑफ द वर्किंग ग्रुप ऑफ माइग्रेशन-2017” का नाम दिया गया है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से प्रवासी मजदूरों के कामकाज से जुड़े मुद्दे, कानूनी रुपरेखा के जरिए प्रवासी मजदूरों के साथ हो रहे भेदभाव का खात्मा, सार्वजनिक सेवाओं के लिए पोर्टेबिलिटी, प्रवासी मजदूरों को लेकर चल रही विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं का कन्वर्जेंस, शिक्षा, सेहत, हेल्पलाइन, दुरुस्त आंकड़ों को एकत्र करने व विधि में बदलाव की सिफारिशें की गई हैं।  

साथ ही चेताया गया है कि मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे प्रोग्राम को अगर रफ्तार दिया जाता है तो प्रवासियों की संख्या में और ज्यादा बढ़ोत्तरी होगी। ऐसे में प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और उनके प्रति भेदभाव को मिटाने पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होगी। खासतौर से गांव और शहरों के स्किल प्रोग्राम में  डोमिसाइल होने की शर्त को खत्म किया जाना चाहिए।

वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि प्रवासी मजदूर सामाजिक सुरक्षा और सार्वजिनक सहयोग दोनों हासिल करने में विफल हैं। यह भी गौर करने लायक है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) शहरी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असहज हैं। न ही इनके पास शहर में उपयोग लायक कौशल है और न ही सामाजिक नेटवर्क। ऐसे प्रवासी मजदूर निर्माण व ईंट-भट्ठों जैसे क्षेत्रों में चले जाते हैं।

इसी तरह काम की तलाश में जाने वाले वयस्कों के साथ शिक्षा के लिए अधिकांश युवा भी घर छोड़कर दूसरे जिलों और राज्यों में प्रवास कर रहे हैं है। इन्हें भी श्रमिकों की तरह आवास की बेहतर सुविधाएं नहीं मिलती हैं और साथ ही इन्हें भी डोमिसाइल यानी स्थायी निवासी की शर्त से जूझना पड़ रहा है। तमाम शैक्षणिक संस्थाएं इस शर्त के साथ प्रवासी युवाओं को शिक्षा से वंचित करती हैं। शैक्षणिक संस्थाओं में काम की तलाश में आने वाले प्रवासियों को भी यह शर्त परेशान करती है।

 

आगे पढ़िए : रोजगार की तलाश में दिल्ली काम की तलाश में आने वाले अनुसूचित जनजाति प्रवासियों का क्या हुआ ?