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पलायन की पीड़ा-8: प्रवास, विस्थापन को कम किया जा सकता है, रोका नहीं जा सकता

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क़े अवकाश प्राप्त अध्यापक, माइग्रेशन के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ तथा “वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2020” के सह-संपादक बिनोद खदरिया ने डाउन टू अर्थ से बात की

On: Monday 13 April 2020
 

जलवायु के कारकों का माइग्रेशन पर क्या असर पड़ता है?

सूखा, बाढ़, चक्रवात, अप्रत्याशित बारिश और हीटवेव जैसी घटनाओं को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। इसमें से कुछ का धीरे-धीरे असर होता है जैसे सूखा या हीटवेव का। लेकिन बाढ़, चक्रवात और अप्रत्याशित बारिश का प्रकोप अचानक होता है। कहीं-कहीं बाढ़ हर साल होती है, जैसे असम में। लोग मजबूर होते हुए भी बाढ़ के लिए तैयार रहते हैं। जलवायु परिवर्तन का प्राकृितक आपदाओं के इन रूपों पर अलग-अलग असर रहता है। यह क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।

आजकल क्लाइमेट रिफ्यूजी शब्द चलन में है। इसे किस रूप में देखते हैं?

क्लाइमेट रिफ्यूजी टर्म को संयुक्त राष्ट्र ने स्वीकार नहीं किया है। हालांकि आमजन में यह शब्द प्रचलित है। दरअसल रिफ्यूजी शब्द रिफ्यूज लेने यानी अपने आपको बचाने के लिए शरण लेने की प्रक्रिया से बना है। यह एक नकारात्मक टर्म नहीं है, लेकिन आमतौर पर कुछ देश और लोग रिफ्यूजियों को स्वीकार करने से कतराते हैं। रिफ्यूजियों को वे अपने अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण की तरह देखते हैं। इस शब्द को मान्यता दे दी गई तो जलवायु से विस्थापित लोगों को शरण देने के लिए नीतियां बनानी पड़ेंगी और संधियों पर हस्ताक्षर करने होंगे। संधि से देश शरण देने के बंधन में बंध जाएंगे। यही कारण है कि इसे मान्यता नहीं मिली है।

भारत में विस्थापन अथवा माइग्रेशन से कौन लोग ज्यादा प्रभावित होंगे?

सबसे अधिक प्रभावित समुद्री तट और द्वीप समूहों में रहने वाले लोग होंगे। समुद्र का जलस्तर बढ़ने या सुनामी आने से विस्थापन बहुत बढ़ जाता है। मैंने 2009 और 2011 में “इंडिया माइग्रेशन रिपोर्ट” के दो संस्करण कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित किए थे, जिसमे मालदीव का उदाहरण देकर बताया था कि उसकी एक कैबिनेट मीटिंग समुद्र में पानी के नीचे हुई थी। इस मीटिंग के जरिए उन्होंने विश्व को बताना चाहा था कि उनके जैसे द्वीप समुद्री जलस्तर बढ़ने से डूब सकते हैं।

माइग्रेशन अधिकांश शहरों में हो रहा है। शहरों पर इसका क्या असर देखा जा रहा है?

छोटे शहरों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा लेकिन बड़े शहरों की सुविधाएं प्रभावित होंगी। इससे शहरों में झुग्गी बस्तियों की वृद्धि होती हैं। प्रवासी और स्थानीय लोगों में अक्सर टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है, अपराधों की संख्या भी बढ़ती है। माइग्रेशन से प्रवासी और स्थानीय लोगों के बीच संदेह पनपता और आपसी विश्वास में कमी आती है।

प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले विस्थापन को क्या रोका जा सकता है?

माइग्रेशन और विस्थापन दोनों की ही पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता। आपदा आएगी तो पलायन तो होगा ही। आपदा के प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है। सबसे पहले बाढ़ाक्रान्त तटबंधों को सुदृढ़ करने और नए बांध बनाने की जरूरत है। घर बनाने में लगने वाली सामग्रिया ऐसी होनी चाहिए ताकि वे आपदाएं झेलने में सक्षम हो सकें। भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में मजबूत होने के साथ-साथ लचकदार ढांचे बनाकर नुकसान की कुछ हद तक रोका जा सकता है। नुकसान कम होंगे तो विस्थापन में भी कमी आ सकती है।