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उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन: रोल मॉडल तैयार करे राज्य सरकार

दुखद बात यह है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में पहाड़ों से पलायन और तेजी से बढ़ा

On: Tuesday 08 September 2020
 

राजेंद्र पी. ममगाईं

यूं तो पलायन कोई नई बात नहीं है। दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पलायन का अपना इतिहास है। कुछ राज्यों से ज्यादा पलायन हुआ तो कुछ से कम। उत्तराखंड से पलायन भी कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन दुखद बात यह है कि अलग राज्य बनने के बाद यहां से पलायन और तेज हो गया। पलायन का बड़ा कारण राज्य में रोजगार के अवसरों की कमी है। 35-40 साल पहले उत्तराखंड से पलायन की वजह यह थी कि लोग नियमित आमदनी चाहते थे। यहां कृषि पारंपरिक थी। खेत बिखरे हुए थे, लोगों के पास खेती की जमीन अधिक नहीं थी। जो आबादी बढ़ने के साथ अब और कम हो गई है। अनुमान है कि अधिकतर लोगों के पास एक एकड़ प्रति परिवार से कम खेती की जमीन है। जब पूरी खेती की जाती थी तो भी लोग अपना पेट भरने लायक ही अनाज पैदा कर पाते थे। इसके अलावा आय के दूसरे साधन नहीं थे।

पहले जो लोग किसी तरह पढ़ लिख गए थे, उन्होंने नियमित नौकरी के लिए पहाड़ छोड़ा और दूसरे राज्यों में जाकर तरक्की भी की। लेकिन इनके साथ-साथ रोजगार के अभाव में कम पढ़े-लिखे युवा भी पहाड़ छोड़ते रहे। खासकर, जब बड़े शहरों में श्रम बाजार में बदलाव आया और अकुशल और शिक्षित लोगों की भी मांग बढ़ी तो ये युवा बड़े शहरों की ओर आ गए। अन्य राज्यों की अपेक्षा उत्तराखंड के प्रवासियों की शिक्षा का स्तर बेहतर है। जो लोग रोजगार के लिए मैदानी राज्यों में आए, तो वे अपने बच्चों को और बेहतर शिक्षा देने के लिए स्थायी रूप से अपने साथ ले आए। तीसरा बड़ा कारण यह रहा कि साधनों के अभाव में मैदान के मुकाबले पहाड़ी जीवन बेहद मुश्किल भरा है, इसलिए लोगों में मैदानी इलाकों के प्रति आकर्षण बढ़ा। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी एक कारण है, लेकिन मेरी नजर में इन सबसे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। सरकारों ने पलायन को रोकने के लिए कभी ग्रासरूट स्तर पर गंभीर प्रयास नहीं किए।

दूसरे राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड का पलायन कुछ अलग है। यहां लोग पूरे परिवार के साथ पलायन कर जाते हैं और फिर लौटते नहीं हैं। घर टूट जाते हैं और एक दिन पूरा गांव खाली हो जाता है। पिछले दो दशक के दौरान इसमें बहुत तेजी आई और राज्य में सैकड़ों गांव भुतहा घोषित हो गए। दो दशक पहले तक उत्तराखंड में मनीऑर्डर अर्थव्यवस्था मानी जाती थी। लोग मैदानी इलाकों में कमा कर गांव में मनीऑर्डर भेजते थे, इससे पहाड़ की अर्थव्यवस्था चलती थी। लेकिन अब गांव का प्रधान और सामाजिक कार्यकर्ता भी अपनी कमाई गांव में खर्च करने की बजाय मैदानी इलाकों में खर्च कर रहा है। वह मैदानी इलाकों में मकान बनाता है और अपने बच्चों को वहां रहने भेज देता है। पहाड़ पर तैनात सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, अध्यापकों का घर-परिवार मैदानी इलाकों में है।

कोविड-19 लॉकडाउन होने के बाद दूसरे राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी प्रवासी वापस आए हैं। राज्य सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। इससे पहले सरकार लगातार दावे करती रही है कि वे पलायन को रोकने के लिए कई कदम उठा रही है, लेकिन अब तो प्रवासी लौट आए हैं। क्या सरकार इनको रोक पाएगी? मई के पहले सप्ताह में मैंने एक पेपर तैयार किया था। इसके लिए मैंने उत्तराखंड लौटे लगभग 90 प्रवासियों से बात की थी। जब इनसे पूछा कि क्या वे अब उत्तराखंड में ही रहेंगे तो 85 फीसदी लोगों ने मुझसे उल्टे सवाल किया कि क्या यहां रहा जा सकता है? वे यहां क्या करेंगे, जितना वे मैदानी इलाकों में कमा रहे हैं, उससे आधी आमदनी भी पहाड़ में संभव नहीं है, इसलिए उनके सामने लौटने के अलावा कोई चारा नहीं है, लेकिन सुखद बात यह है कि लगभग 15 फीसदी प्रवासी अपने गांव में ही रहना चाहते हैं। इन्हें रोकने के लिए सरकार ने भी कई योजनाओं की घोषणा की, लेकिन सरकार के प्रयास जमीन पर पहुंचे या नहीं, यह जानने के लिए फिर से मैंने उन्हीं लोगों से बात की तो सबका कहना था कि उन्हें इन योजनाओं के बारे में पता ही नहीं चला। हालांकि कई प्रवासियों ने अपने स्तर पर वहां काम शुरू कर दिया है।

वाकई सरकार अगर इस वैश्विक आपदा को अवसर में बदलना चाहती है तो केवल 5 प्रतिशत प्रवासियों को रोकने का प्रयास करना चाहिए, इनकी सफलता को रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत किया जाए तो अगले पांच साल में 50 प्रतिशत प्रवासी लौट आएंगे। सरकार को क्लस्टर बेस्ड डेवलपमेंट मॉडल अपनाना होगा। राज्य में गांव छोटे-छोटे हैं और संसाधन काफी कम हैं, इसलिए एक गांव की बजाय गांवों का समूह बना कर उनके विकास की योजनाएं बनानी होंगी। राज्य से बाहर रहे सफल लोगों को राज्य के युवाओं के साथ जोड़ना होगा, ताकि ये लोग अपने अनुभव का लाभ युवाओं को दे सकें। बड़ी अजीब बात है कि अकसर यह कहा जाता है कि पहाड़ के उत्पादों को मैदानी राज्यों तक पहुंचाने के लिए सप्लाई चेन बनाना आसान नहीं है, लेकिन मैदान के उत्पाद जैसे कि अमूल दूध, मैगी आदि पहाड़ के दूरदराज इलाकों तक कैसे पहुंच जाते हैं, इस पर सवाल क्यों नहीं किया जाता।  यदि कोविड-19 आपदा को अवसर में तब्दील नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में उत्तराखंड पहाड़ी राज्य का दर्जा खो देगा।

(लेखक राजेंद्र पी. ममगाईं, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद में एसआर शंकरन चेयर प्रोफेसर हैं ये उनके निजी विचार हैं)