आवरण कथा: आदिवासियों ने वन भूमि को विकसित कर दूर किया संकट

अकोला जिले के वाडला गांव में विकसित वन भूमि से चारा मिलने से लोगों का पलायन काफी हद तक रुक गया है

By Vivek Mishra

On: Wednesday 20 July 2022
 
महाराष्ट्र के अकोला जिले में आदिवासियों ने चारे की समस्या पर काबू पा लिया है
महाराष्ट्र के अकोला जिले में आदिवासियों ने चारे की समस्या पर काबू पा लिया है महाराष्ट्र के अकोला जिले में आदिवासियों ने चारे की समस्या पर काबू पा लिया है

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महाराष्ट्र के अकोला जिले के वाडला गांव ने जंगल की जमीन को विकसित कर चारे की समस्या से छुटकारा पा लिया। गांव में रहने वाले राठोड साहेबा बताते हैं कि गांव में कुल 71 परिवार हैं और सभी फासे पारडी आदिवासी समुदाय से हैं। उनके अनुसार, “हमारे हर कुटुंब में दो से तीन गाय मौजूद हैं और सभी चारे के लिए आत्मनिर्भर हो गए हैं। यह 2008 में जंगल की जमीन पर विकसित किए गए घास के मैदान की वजह से हुआ है। इसमें अब पूरे साल हरा चारा मिलता है।”

वर्ष 2008 से पहले वाडला गांव के लोगों को गायों के साथ चारे की तलाश में दूसरे जिलों में दो से तीन महीने के लिए पलायन करना पड़ता था। अब पलायन रुका है क्योंकि गांव के बगल में मौजूद 250 एकड़ रिजर्व फॉरेस्ट लैंड को गांव वालों ने ग्रास लैंड में बदल दिया है। गांव वालों का अनुभव है कि देसी गाय कुछ खास किस्म की देसी घास ही पसंद करती है। इसलिए घास के मैदान में 30 तरह की देसी घास की किस्में लगाई गई हैं।

जंगल की जमीन पर विकसित किए गए ग्रासलैंड में पउना, तिखालि, कुंडा, मारवेली प्रजाति की देसी घास प्रमुखता से लगाई गई है। राठोड साहेबा बताते हैं कि देसी गायों की पहली पसंद पउना घास है। जबकि कुंडा घास ग्रेट इंडियन बस्टर्ड प्रजाति के पक्षियों के प्रजनन के लिए मुफीद माहौल तैयार करती है। पहले यहां पक्षी नहीं दिखते थे। लेकिन अब इन घास के मैदानों में इन्हें देखा जा सकता है।

ग्रामीण विकसित की गई इस ग्रास लैंड में घास की कटाई करते हैं। आपसी सहमति के तहत आधी घास वहीं छोड़ दी जाती है, जबकि आधी घास ग्रामीण ले लेते हैं। छोड़ी गई घास सूख जाने पर संकट के वक्त काम आती है।

गैर सरकारी संस्था फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एंड इकोलॉजी डेवलपमेंट के निदेशक कौस्तुभ पांढरीपांडे बताते हैं कि उनकी संस्था का अध्ययन है कि महाराष्ट्र में करीब 2.5 लाख हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट है जो ग्रासलैंड में बदला जा सकता है। इससे न सिर्फ ग्रासलैंड की समस्या से छुटकारा मिल सकता है बल्कि जैवविविधता का संकट भी संभल सकता है।

वह बताते हैं कि पहले हमारा पशुपालन पूरी तरह खेती पर आश्रित था, यह खेती का सहायक काम था जबकि आज पशुपालन पूरी तरह से बाहरी तत्वों पर निर्भर हो गया है। ऐसे में ग्रासलैंड को विकसित किया जाना और संरक्षित करना बेहद जरूरी है। अकोला के वाडला गांव में हमारी पुरानी संस्था संवेदना ने आदिवसियों के देसज ज्ञान के साथ कायाकल्प करके दिखाया है। अब हम महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर और जगहों पर भी इस तरह का काम कर रहे हैं।

नागपुर स्थित सेंटर फॉर पीपुल्स कलेक्टिव के रिसर्चर सजल कुलकर्णी डाउन टू अर्थ से बताते हैं कि राज्य में चारे की दिक्कत को लेकर कोई रोडमैप नहीं है। यहां ज्यादा निर्भरता हरी घास पर है। ऐसे में समुदाय की भागीदारी के साथ ग्रासलैंड और गोचर विकसित किए जाने चाहिए। एक सरकारी कमेटी में हम लोगों ने अपनी सिफारिशें दी हैं कि गोचर यानी गायरान (कॉमन्स) लैंड और ग्रासलैंड का पुनरुद्धार करने के बारे में फॉरेस्ट डिपार्टमेंट और एनिमल हस्बेंडरी डिपार्टमेंट को कदम उठाना चाहिए।

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