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उत्तराखंड: पलायन आयोग की रिपोर्टों से हासिल क्या होगा?

पलायन आयोग ने 16 जून की शाम टिहरी पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इससे पहले पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा पर आयोग अपनी रिपोर्ट दे चुका है

By Varsha Singh

On: Thursday 18 June 2020
 
उत्तराखंड के टिहरी इलाके से पलायन पर एक रिपोर्ट हाल ही में सरकार को सौंपी गई है। फोटो: वर्षा सिंह
उत्तराखंड के टिहरी इलाके से पलायन पर एक रिपोर्ट हाल ही में सरकार को सौंपी गई है। फोटो: वर्षा सिंह उत्तराखंड के टिहरी इलाके से पलायन पर एक रिपोर्ट हाल ही में सरकार को सौंपी गई है। फोटो: वर्षा सिंह

चैन्नई के एक होटल में काम कर रहे टिहरी के प्रतापनगर ब्लॉक के न्यूंडा गांव के अमित कुमांई 27 मई को ऋषिकेश लौटे। उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजीटिव थी। ऋषिकेश और फिर टिहरी के क्वारंटीन सेंटर में रहने के बाद अब 18 जून को उन्हें डिस्चार्ज किया जा रहा है। वह गांव के अपने घर में क्वारंटीन रहेंगे।

टिहरी के बहुत से युवा होटल इंडस्ट्री में काम करने के लिए जाने जाते हैं। अमित इससे पहले  दिल्ली और सउदी अरब में भी काम कर चुके हैं। लॉकडाउन में चेन्नई से टिहरी तक पहुंचना, फिर कोरोना से मुकाबला, अमित के लिए ये एक मुश्किल लड़ाई थी। इसके बावजूद हालात सामान्य होने पर वे उसी 15-20 हजार रुपए की नौकरी के लिए वापस लौटने की बात करते हैं क्योंकि गांव में रोजगार नहीं है।  

ये पूछने पर कि सरकार प्रवासियों के लिए रोजगार की कई योजनाएं लायी है। जिसमें उन्हें सब्सिडी पर ऋण दिया जा रहा है। खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। निराशा के साथ अमित खेती की मुश्किलें गिनाते हैं। जंगली जानवरों को सरकार किस तरह रोक रही है। ऋण वापस नहीं लौटा सके तो क्या होगा? टिहरी में पर्यटन की संभावनाएं भी अमित जैसे युवाओं में रोमांच नहीं भर पा रही।

अमित उस पूरे समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो लॉकडाउन के बाद एक महीना भी महानगरों में पैर नहीं टिका पाया। घर लौटना जिनकी मजबूरी थी और वापस जाना भी मजबूरी ही होगी।

पलायन आयोग ने 16 जून की शाम टिहरी पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इससे पहले पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा पर आयोग अपनी रिपोर्ट दे चुका है। टिहरी की रिपोर्ट में भी पलायन की वही वजहें बतायी गई हैं जो पहले कही जा चुकी हैं।

टिहरी पर पलायन आयोग की रिपोर्ट

टिहरी के गांवों में बसे लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन खेती है। फिर मजदूरी और सरकारी सेवा। राज्य में भी यही रोजगार के तीन बड़े ज़रिया हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस वर्षों में 585 ग्राम पंचायतों से पूरी तरह पलायन हुआ है। यहां 18,830 लोगों की आबादी अपने घरों पर ताले डाल कर, खेत बंजर छोड़ कर या बेचकर, पूरी तरह पलायन कर चुकी है। जबकि 934 ग्राम पंचायतों के 71,509 लोगों ने अस्थायी पलायन किया है। जिनका घर आना-जाना लगा रहता है। 58 गांव भुतहा हुए, यहां कोई आबादी नहीं बची।

पिछले दस वर्षों में उत्तराखंड के 3,946 गांव भुतहा हो चुके हैं, यहां के 118,981 लोग पूरी तरह पलायन कर चुके हैं या फिर बहुत कम गांव आना होता है। इसके अलावा 6,338 गांव ऐसे हैं जहां से पलायन तो हुआ है, लेकिन गांव से रिश्ता बना हुआ है। ऐसे लोगों की संख्या 383,726 है।

पलायन की मुख्य वजहों में रोजगार 52.43%, शिक्षा का अभाव 18.24%, चिकित्सा सुविधा का अभाव 7.84%, कृषि पैदावार की कमी 6.17%, जंगली जानवरों से खेती का नुकसान 4.26%, सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव 3.07%, एक-दूसरे की देखा-देखी पलायन 2.47% बताया गया है। पूरे राज्य के संदर्भ में भी आंकड़े इसी के आसपास हैं।

पलायन करने वालों में 35.69% राज्य के अन्य जिलों में गए, 28.72% राज्य से बाहर, 19.46% नजदीकी कस्बों में, 15.18% जनपद मुख्यालय में और 0.96% देश से बाहर गए।

टिहरी के 1039 ग्राम पंचायतों में से 44 अब भी सड़क मार्ग से नहीं जुड़े हैं। 33 गांव ऐसे हैं जहां पानी एक किलोमीटर के भीतर उपलब्ध नहीं है ( राज्य में ऐसे 399 गांव हैं)। 58 गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है (राज्य में 660 गांव)।

पलायन आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में किसानों की समस्याओं पर बात की है। किसानों के उत्पाद खरीदने के लिए मंडियों की कमी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, कृषि मशीनीकरण का न होना, फल प्रसंस्करण केंद्र न होना, कोल्ड स्टोरेज-बीज गोदाम न होने जैसी समस्याएं किसानों के सामने बनी रहती हैं। कृषि विभाग में फील्ड स्टाफ की कमी भी उजागर की गई है।

आजीविका बढ़ाने के लिए टिहरी झील में मछली उत्पादन को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा तीर्थाटन, राफ्टिंग, ट्रैकिंग को बेहतर बनाने की बात कही गई है। टिहरी में ही गोट विलेज, नागटिब्बा, जैसे ग्रामीण पर्यटन के सफल उदाहरण भी हैं।

कोरोना के बाद लौटे प्रवासियों को रोकने के लिए कृषि, बागवानी, पशुपालन और स्वरोजगार पर ध्यान देने को कहा गया है। आतिथ्य, इको टूरिज्म और सूक्ष्म उद्यमों को शुरू करने की सलाह दी गई है।

17 दिसंबर 2017 में बने पलायन आयोग की पौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और अब टिहरी की रिपोर्टें खेती, पशुपालन, पर्यटन और स्थानीय संसाधनों के ज़रिये ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत करने के सुझाव दिए गए हैं। अब चमोली-उत्तरकाशी जैसे जिलों का डाटा तैयार किया जाएगा। ढाई वर्षों के इन आंकड़ों से क्या सरकार कुछ बेहतर नीतियां तैयार कर पायी।

क्या होगा हासिल?

‘पलायन एक चिंतन’ संस्था के रतन असवाल कहते हैं कि पलायन आयोग की रिपोर्ट के ज्यादातर आंकड़ें अर्थ और संख्या निदेशालय पहले ही प्रकाशित करता है। बहुत से एनजीओ और पलायन को लेकर काम कर रहे व्यक्ति भी सरकार को अलग-अलग मंचों के ज़रिये इस तरह के सुझाव दे चुके हैं। असवाल कहते हैं कि मौजूदा सरकारी योजनाएं ही ठीक तरीके से लागू हो पाती तो स्थितियां बेहतर होतीं। उनके मुताबिक कोरोना के चलते गांव लौटे दो लाख प्रवासियों में से ज्यादातर वापस लौट जाएंगे, वही प्रवासी गांवों में रुक सकते हैं जो पांच-दस हजार के मामूली वेतन पर महानगरों की धूल खा रहे थे।

हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर के संस्थापक महेंद्र कुंवर कहते हैं कि पलायन आयोग ने हमें जरूरी डाटा उपलब्ध कराया है। पहाड़ों के रिसोर्स के हिसाब से यदि यहां कृषि विज्ञान केंद्र बनाए गए होते, जंगल-पानी से जुडे रोजगार पर काम किया गया होता तो शायद ऐसी स्थिति न आती। हमने नौकरियों को तवज्जो दी इसलिए आज के नौजवान नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं।

पिथौरागढ़ के गंगोलीघाट में कई गांवों को दूध के व्यवसाय से आत्मनिर्भर बनाने वाले राजेंद्र बिष्ट पलायन आयोग से बहुत उम्मीद नहीं रखते। उत्तराखंड के छोटे जोत वाले किसान खेती से महीने के 7-8 हज़ार रुपये भी बमुश्किल कमा पाते हैं। उनका ज़ोर गांव के उत्पादों को बाजार से जोड़ने पर है। गांव के एक परिवार को न्यूनतम 15 हजार रुपये देने का इंतजाम करिए।