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गुजरात: मजदूरों को राहत पहुंचाने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

गुजरात सरकार ने निर्माण मजदूरों को 1,000 रुपए नगद देने की घोषणा की है

On: Tuesday 05 May 2020
 
फोटो: विकास चौधरी
फोटो: विकास चौधरी फोटो: विकास चौधरी

कलीम सिद्दीकी

किरीट अमलियार निर्माण श्रमिक हैं। जो गुजरात बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वेलफेयर (बीओसीडब्ल्यू) बोर्ड में पंजीकृत हैं। राज्य सरकार ने लॉकडाउन के चलते सभी पंजीकृत मजदूरों के बैंक खाते में सीधे 1000 रुपए डालने की घोषणा की है। किरीट अमलियार अपने बैंक खाते को रोजाना चेक करते हैं। परंतु अभी तक 1000 रुपए की राशि नहीं आई।

किरीट बताते हैं कि कुछ लोगों के खाते में राशि आई है। किरीट की तरह परेश नरसिंह वसावा दाहोद के रहने वाले निर्माण श्रमिक हैं। इनके खाते में भी राशि नहीं आई। आपको बता दें गुजरात सरकार निर्माण प्रोजेक्ट पर निर्माण क्षेत्र के मजदूरों के वेल्फेयर के लिए 1 फीसद सेस लेती है। जो बोर्ड के पास जमा होता है। इस समय वेलफेयर बोर्ड में 2900 करोड़ रुपए जमा हैं।

'बांध काम मजूर संगठन' के डायरेक्टर विपुल पांड्या बताते हैं कि सरकार द्वारा घोषित राशि बहुत कम है। राज्य में 6 लाख 38 हजार मजदूर पंजीकृत हैं। 1000 प्रति मजदूर के हिसाब से 64 करोड़ हुआ। लेकिन यह राशि वेलफेयर बोर्ड की बजाय नागरिक अन्न खाद्य आपूर्ति विभाग बांट रहा है। यदि एक परिवार से तीन मजदूर पंजीकृत हैं। तो सरकार केवल घर के मुखिया के खाते में ही 1000 रुपये ट्रांसफर कर रही है। आधार कार्ड के द्वारा राशन कार्ड को लिंक कर लिया है। राशन कार्ड के आधार पर परिवार के केवल एक व्यक्ति के ही खाते में राशि डालना गलत है।

विपुल पांडया कहते हैं कि गुजरात में अधिकतर आदिवासी समुदाय के लोग बांध काम मजदूरी करते हैं। इनके परिवार के मर्द-औरत सभी मजदूरी करते हैं और लाभ केवल परिवार के मुखिया को। इसलिए हम सरकार की इस नीति का विरोध कर रहे हैं। हमने पत्र लिख मुख्यमंत्री से मांग की है कि राशि का वितरण बोर्ड द्वारा किया जाए और सभी मजदूरों को राशि दी जाए। आदिवासी बहुल दाहोद जिले से 37,000 निर्माण श्रमिक पंजीकृत हैं। विपुल पांड्या बताते हैं कि राशि न मिलने की शिकायत कई जगह से आ रही है। 

पांडया के मुताबिक बोर्ड में जमा 2900 करोड़ के फंड में से 250 करोड़ रुपये सरकार मुख्यमंत्री आपदा फंड में ट्रांसफर कर गरीबों के कल्याण की बनी योजना "अन्न ब्रह्म योजना" में भी खर्च कर रही है। इस योजना के तहत सरकारी राशन की दुकान से 15 लाख गरीब परिवारों को चावल, गेहूं , शक्कर , नमक दिए जाने की योजना है। जबकि यह योजना नेशनल फूड सिक्यूरिटी एक्ट में कवर होती है।

राज्य में 15518 राहत कैंप चल रहे हैं। वहां से जो भी फूड पैकेट बांटे जा रहे हैं। यह खर्च भी बीओसीडब्ल्यू बोर्ड के फंड से ही उठाया जा रहा है। पांड्या कहते हैं कि पिछले वर्ष प्रवासी मजदूर, जो अहमदाबाद मेट्रो ट्रेन प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं। हमने ऐसे 500 मजदूरों को बोर्ड में पंजीकृत कराया था, लेकिन लॉकडाउन के 40 दिन बाद भी उन्हें सहायता राशि नहीं मिल पाई है।

वहीं, गुजरात बिल्डिंग एंड अदर कांस्ट्रक्शन बोर्ड के सचिव बीएम प्रजापति ने डाउन टू अर्थ को बताया कि खाद्य आपूर्ति विभाग द्वारा अब तक 3.4 लाख पंजीकृत मजदूरों के बैंक खाते में पैसे डाले जा चुके हैं। कुछ मजदूरों के आधार बैंक खाते से लिंक नहीं हैं। या कोई अन्य टेकनिकल समस्या होगी, जिस कारण खाते में पैसे नहीं पहुंचे होंगे। मजदूरों को राशन तो देना है। हम भवन एवं निर्माण मजदूरों को अलग नहीं कर पा रहे हैं। इस फंड से मजदूरों को राशन किट दी जा रही है।

प्रजापति कहते हैं कि 2017-18 के बीएलएस सर्वे के अनुसार 15 लाख बीओसी मजदूर हैं। इसी हिसाब से 250 करोड़ का फंड का पैकेज दिया गया है। मुख्यमंत्री ने स्वयं अश्वासन दिया है कोई भी पंजीकृत मजदूर रोकड़ धन सहायता में छूटेगा नहीं। यह फंड मुख्यमंत्री आपदा फंड में नहीं, बल्कि पैकेज के रूप में दिया गया है। बोर्ड द्वारा मजदूरों को सीधे राशि न दिये जाने के सवाल पर प्रजापति ने बताया कि खाद्य आपूर्ति विभाग द्वारा बीओसी मजदूरों को सहायता राशि पहुंचाने तथा बैंक में ट्रांसफर करने के अधिकार का निर्णय सरकार का था।

मजदूर यूनियन 'जन संघर्ष मंच' के अमरीश पटेल जो गुजरात हाईकोर्ट में एडवोकेट भी हैं बताते हैं कि बीओसीडब्ल्यू एक्ट के अनुसार बोर्ड में जमा फंड केवल उनके ही वेलफेयर के लिए उपयोग हो सकता है। लेकिन गुजरात सरकार ने राष्ट्रीय आपदा कानून का उपयोग अथवा दुरूपयोग करके फंड ट्रांसफर खाद्य आपूर्ति विभाग को दिया है। जो गलत है।

विपुल पांड्या का कहना है कि सरकार के पास राष्ट्रीय आपदा फंड है। जिसका उपयोग पंचायत भी कर सकती है। आपदा के समय इस फंड की कोई चर्चा नहीं हो रही है। न ही फंड के बारे में आम लोगों को कुछ पता चल रहा है। हम चाहते हैं कि सरकार की नीयत और नियम साफ हो। इस आपदा के समय बांध काम मजदूरों का हक उन्हें समय रहते मिले। यदि बोर्ड प्रस्ताव पास कर मजदूरों की सहायता में आगे आए तो इनकी अन्य समस्याएं भी सुलझाई जा सकती है।

बीओसीडब्ल्यू बोर्ड एक स्वतंत्र संस्था है। जिसमें 5 सदस्य सरकार के होते हैं, 5 मालिकों के और 5 मजदूर यूनियन के। बोर्ड एक प्रस्ताव पास कर सीधे मजदूरों की मदद कर सकता है। बोर्ड को सरकार से अनुमति भी लेने की आवश्यकता नहीं है। परंतु बोर्ड ने मुख्यमंत्री के कहने पर खाद्य आपूर्ति विभाग को एक पैकेज दे दिया है। अब इस फंड का उपयोग अन्य गरीबों के लिए हो रहा है। "अन्न ब्रह्म योजना" के तहत सरकार गैर राशन कार्ड धारकों को राशन दे रही है। इस योजना का लाभ सभी श्रमिक उठा सकते हैं। निर्माण मजदूर जो पंजीकृत हैं अथवा नहीं है। इसी कारण मजदूर संगठनों को लगता है कि सरकार बांध काम मजदूरों के साथ अन्याय कर रही है।

अर्थशास्त्री प्रोफेसर हेमंत शाह बताते हैं कि राज्य सरकार के पास आपदा से निपटने के लिए करोड़ों रुपए हैं। इस वर्ष बजट में सरकार ने राजस्व विभाग को 2,752 करोड़ रुपये आपदा संचालन के लिए आवंटित हैं। सरकार इस फंड को राहत के लिए उपयोग कर सकती है। दिलचस्प यह है कि कानूनी प्रावधान के अनुसार गुजरात में भी जिला आपदा राहत कोष होना चाहिए, लेकिन न तो कोष है न ही प्रबंधन समिति।