पत्नी की पायल बेच कर किया बच्चों के खाने का इंतजाम

सतना जिले के गांव केओटरा में निषाद समुदाय के लोग नाव चलाकर आजाविका कमाते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से सब थम गया है

By Jigyasa Mishra

On: Sunday 26 April 2020
 
सतना जिले के गांव केओटरा में निषाद समुदाय के लोग इनदिनों खाली बैठे हैं। फोटो: जिज्ञासा मिश्रा
सतना जिले के गांव केओटरा में निषाद समुदाय के लोग इनदिनों खाली बैठे हैं। फोटो: जिज्ञासा मिश्रा सतना जिले के गांव केओटरा में निषाद समुदाय के लोग इनदिनों खाली बैठे हैं। फोटो: जिज्ञासा मिश्रा

 
सतना जिले के गांव केओटरा में निषाद समुदाय लॉकडाउन के चलते प्रतिदिन दो समय भोजन करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 
 
गांव में रहने वाले करीब 60 परिवारों वाले इस नाविक समुदाय के लोगों ने अपने दोस्तों से ऋण लिया है। समुदाय में कुछ ग्रामीण अपनी ज़रूरतो को पूरा करने के लिए मजबूर होकर गहने तक बेच रहे हैं।
 
निषाद समुदाय का यह गांव चित्रकूट जिला परिषद में स्थित है। गांव के सभी लोग मंदाकिनी में नाव चलाकर अपना जीविकोपार्जन करते हैं, लेकिन तालाबंदी के वजह से अभी सब घर पर ही हैं। प्रतिदिन यात्रियों को नाव की सैर करवा कर घर चलाने वाले निषाद समुदाय के पास अब कमाई का कोई जरिया नहीं बचा है।
 
नत्थू निषाद अपनी मां, पत्नी और चार बच्चों के साथ इसी गांव में रहते हैं। वो बताते हैं कि जी भी छोटी मोटी बचत की थी वो दस दिन पहले ही खत्म हो चुकी है और मजबूरी में उन्हें अपनी पत्नी की पायल बेचनी पड़ी। "क्या करें हमलोग? कोई सुनने वाला है? कुछ नहीं बचा था हमारे पास तो बीवी की पायल बेचनी पड़ी है। पास के गांव में बेची है और जो मिला, ले लिया। बच्चों को भूखा थोड़ी मारेंगे," नत्थू कहते हैं।
 
गांव के करीब 40 प्रतिशत निवासियों के पास या तो उनके राशन कार्ड नहीं हैं या वे इसे नवीनीकृत नहीं करवा पाए हैं जो ग्रामीणों के लिए दोहरी मार है। गांव के एक निवासी राजीव ने बताते हैं, "मैंने नवीकरण के लिए अपना राशन कार्ड दिया था, लेकिन उन्होंने इसे कार्यालय में कहीं खो दिया। अब मेरे पास राशन भी नहीं है। बस किलो, दो किलो चावल बचा है।" 
 
निवासियों का कहना है कि वे समझते हैं कि सरकार ने यह तालाबंदी उनके भले के लिए किया है, लेकिन कम से कम गरीबों को बिना नियमों के वादा किया हुआ भोजन मिलना चाहिए। तालाबंदी के पहले वाले दिनों को याद करके निषाद बताते हैं कि कैसे उन्हें अपनी नावों को चलाने के लिए प्रति दिन 200-400 रुपये मिलते थे। 
 
"दिन भर में 200-400 तो कमा ही लेते थे। अब तो एक रुपया नहीं आ रहा कहीं से। जिन लोगों के पास खेत खलिहान है, उनका काम फ़िर भी चल रहा है," दिनेश निषाद बताते हैं।
 
समुदाय के दूसरे नाविक, ननकवा निषाद कहते हैं, "19 मार्च के बाद नाव वैसे ही पड़ी है। पास के गांव, लोसरिया में विधायक मदद करता है लेकिन हमारे यहां बिना राशन के इतनी दिक्कतें हैं फ़िर भी नहीं सुनता। हम में से कई लोगों ने 2-3 बार राशन कार्ड बनने के लिए फार्म भी भरा पर अभी तक कुछ हुआ ही नहीं।"
 
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तालाबंदी के बाद राज्य सरकार के कोटे से 32 लाख लोगों को मुफ्त राशन देने की घोषणा की थी, जिसमें चार किलोग्राम गेहूं और एक किलो चावल शामिल हैं। इसके बाद, सतना जिले ने भी बिना किसी कागजी कार्रवाई की आवश्यकता के निवासियों को मुफ्त राशन देने की घोषणा की थी। 
 
“हम रेड क्रॉस की मदद से जरूरतमंद परिवारों को भोजन के पैकेट वितरित कर रहे हैं। इस गांव में हम या तो राशन या भोजन वितरण जल्द से जल्द उपलब्ध करवाने का प्रयास करेंगे,” जिला कलेक्टर सतना, अजय कटेसरिया ने कहा।
 
अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के एक हालिया अध्ययन के अनुसार: भारत में कोविड-19 एक कठोर वास्तविकता को उजागर करता है। अपर्याप्त और असमान सुरक्षा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को भोजन और अन्य सेवाओं तक पहुंच के बिना छोड़ सकता है।