Sign up for our weekly newsletter

लॉकडाउन ग्रामीण अर्थव्यवस्था: खेतों में खड़ी फसल नहीं काट पा रहे किसान

बिहार में इस साल 21,21,000 हेक्टेयर में गेहूं की बुआई हुई है। वहीं, मक्के की खेती 4,90,000 हेक्टेयर में की गई है

By Umesh Kumar Ray

On: Monday 30 March 2020
 
गेहूं पक गया है, बालियां झड़ रही हैं, लेकिन फसल काट नहीं पा रहे हैं। फोटो :  उमेश कुमार राय
गेहूं पक गया है, बालियां झड़ रही हैं, लेकिन फसल काट नहीं पा रहे हैं। फोटो :  उमेश कुमार राय गेहूं पक गया है, बालियां झड़ रही हैं, लेकिन फसल काट नहीं पा रहे हैं। फोटो : उमेश कुमार राय

कोरोनावायरस ने देश के हर वर्ग को प्रभावित किया है। लेकिन पहले से बुरे दौरे से गुजर रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था इससे बुरी तरह चरमरा रही है। उत्तर भारत के अधिकांश गांवों में इस समय कटाई का मौसम है। लेकिन किसान अपनी फसल काटकर अपने खलिहान तक नहीं ले जा पा रहा है। डाउन टू अर्थ ने देश के दूर-दराज गांवों के किसानों की आपबीती और इससे हुए नुकसान के आकलन की कोशिश की। पढ़िए, बिहार के गांवों के हालात पर एक नजर।   

नालंदा जिले के दीपनगर के किसान सुरेंद्र राम ने एक बीघा से ज्यादा में इस बार गेहूं की खेती की थी, लेकिन बारिश ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बारिश के बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि फायदा भले न हो, लागत तो निकल ही आएगी, मगर कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए तीन हफ्तों के लॉकटाउन ने उनकी रही-सही उम्मीद को भी मिट्टी में मिला दिया है। 

वह कहते हैं, बारिश के कारण पहले काफी नुकसान हो चुका है और अब लॉकडाउन के कारण खेत में भी जाना मुश्किल हो रहा है। गेहूं पक गया है, बालियां झड़ रही हैं, लेकिन फसल काट नहीं पा रहे हैं। दूसरी तरफ, मजदूर भी नहीं मिल रहे हैं। सुरेंद्र राम ने बताया कि मक्के की फसल तैयार होने में अभी वक्त है, लेकिन अगर लॉकडाउन लंबे समय तक जारी रहेगा, तो मक्के की फसल की कटाई भी नहीं हो पाएगी।

सुरेंद्र राम की चिंता बिहार की उन लाखों किसानों की चिंता है, जिनकी आजीविका खेतीबाड़ी पर निर्भर है। एक बीघा में गेहूं की खेती पर 2,500 से 3,000 रुपए खर्च होते हैं, जबकि इतने ही रकबे में मक्के की खेती पर लगभग 1,500 रुपए लगते हैं। इस तरह देखा जाए, तो किसानों के करोड़ों रुपए अभी खेतों में पड़े हुए हैं।

बिहार में इस साल 21,21,000 हेक्टेयर में गेहूं की बुआई हुई है। वहीं, मक्के की खेती 4,90,000 हेक्टेयर में की गई है। बिहार के कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, बारिश और ओले के कारण सूबे के 23 जिलों में 3,84,016 हेक्टेयर में लगी फसल को नुकसान हुआ है। प्रभावित किसानों को आर्थिक मदद देने के लिए सरकार ने 518.42 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

मजदूरों का अभाव 

मोकामा टाल में 70,000 हेक्टेयर में मसूर की दाल की खेती की गई है। मसूर तैयार है, लेकिन मजदूर नहीं मिलने और लॉकडाउन को लेकर पुलिस की सख्ती के कारण किसान कटाई नहीं कर पा रहे हैं।
80 बीघे में मसूर की खेती करने वाले प्रणव शाही ने कहा, “फसल लेकर जा रहे ट्रैक्टरों को रोका जा रहा है, जिससे किसान डरे हुए हैं। दूसरी तरफ, मजदूरों की किल्लत है।”

मोकामा में झारखंड से भी भारी संख्या मजदूर आते हैं, लेकिन लॉकटाउन के कारण वे इस बार आ नहीं पा रहे हैं। प्रणव बताते हैं कि 22 मार्च को झारखंड से मजदूर आने वाले थे, लेकिन उस दिन जनता कर्फ्यू लग गया। इसके एक-दो दिन बाद उन्हें लाने की योजना बनी, लेकिन 24 तारीख को अचानक लॉकडाउन कर दिया गया। अगर एक हफ्ते के भीतर मसूर नहीं काटी गई, तो वह खेत में ही बिखर जाएगी।

वैशाली जिले के किसान संजय कुमार ने आलू के साथ ही गेहूं की भी खेती की थी। आलू को निकाल लिया है, लेकिन थोक बाजार में आलू की कीमत गिर जाने के कारण लागत भी नहीं निकल रही थी, इसलिए उन्होंने आलू नहीं बेचा है।

उन्होंने कहा कि गेहूं की कटाई का वक्त निकलता जा रहा है। इसे काटकर बाजार में जल्दी नहीं बेचा गया, तो अगली फसल के लिए कर्ज लेना पड़ेगा। कृषि विभाग ने कहा है कि किसानों को लॉकडाउन के कारण खेतीबाड़ी में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी, लेकिन किसानों का कहना है कि सरकारी आदेश के बावजूद पुलिस उन्हें परेशान करती है।