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लॉकडाउन ग्रामीण अर्थव्यवस्था: पहाड़ पर बिगड़े हालात

लॉकडाउन की वजह से उत्तराखंड के किसानों की आमदनी खासी प्रभावित हुई है 

By Varsha Singh

On: Tuesday 31 March 2020
 
लॉकडाउन की वजह से सप्लाई टूटने के बाद उत्तराखंड के विकासनगर में खेतों में मुरझा रहे फूल। फोटो: वर्षा सिंह
लॉकडाउन की वजह से सप्लाई टूटने के बाद उत्तराखंड के विकासनगर में खेतों में मुरझा रहे फूल। फोटो: वर्षा सिंह लॉकडाउन की वजह से सप्लाई टूटने के बाद उत्तराखंड के विकासनगर में खेतों में मुरझा रहे फूल। फोटो: वर्षा सिंह

कोरोनावायरस ने देश के हर वर्ग को प्रभावित किया है। लेकिन पहले से बुरे दौरे से गुजर रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था इससे बुरी तरह चरमरा रही है। उत्तर भारत के अधिकांश गांवों में इस समय कटाई का मौसम है। लेकिन किसान अपनी फसल काटकर अपने खलिहान तक नहीं ले जा पा रहा है। डाउन टू अर्थ ने देश के दूर-दराज गांवों के किसानों की आपबीती और इससे हुए नुकसान के आकलन की कोशिश की। पढ़िए, उत्तराखंड के गांवों के हालात पर एक नजर-   

 

उत्तराखंड में पिछले कुछ समय से फूलों की खेती को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। देहरादून जनपद में करीब 40 हेक्टेअर में किसानों ने फूल लगाए। इससे आमदनी दोगुनी होने की उम्मीद थी। फूल आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल नहीं हैं। फूलों का इस्तेमाल करने वाले मंदिर, होटल समेत अन्य जगहें बंद हैं। लॉकडाउन के चलते फूल खेतों में ही मुरझा रहे हैं। विकासनगर के उद्यान केंद्र के अधिकारी इंदुभूषण कुमोला बताते हैं कि एक हेक्टेअर क्षेत्र में न्यूनतम एक लाख रुपए का नुकसान है। इस तरह अकेले देहरादून में किसानों को 40 लाख का नुकसान हो गया है। पूरे प्रदेश में इस समय फूलों की खेती की बढ़ावा दिया जा रहा है। कुमोला कहते हैं कि किसानों को बहुत नुकसान होने की प्रबल संभावनाएं हैं।

चकराता के त्यूणी गांव में नेपाली मूल के किसान पेरूमल लीज पर जमीन लेकर खेती करते हैं। ज़मीन के लिए उन्हें सालाना सात हज़ार रुपये लीज़ देनी होती है। उनके खेतों में इस समय मटर पक कर खराब हो रही है। कुछ मटर उन्होंने तोड़ भी ली। पेरुमल के सामने मुश्किल ये है कि इस मटर का करें क्या। वह इतने बड़े किसान नहीं कि मंडी तक मटर पहुंचा सकें। ज्यादातर गाड़ियां बंद हैं। उन पर छह लोगों का परिवार चलाने की ज़िम्मेदारी है। नाउम्मीदी से पेरूमल कहते हैं कि ये साल बहुत मुश्किल बीतेगा। इस मटर को बेचकर वो लीज की कीमत चुका सकते थे।

समुद्र तल से करीब 4 हज़ार फीट की उंचाई पर टिहरी के नैनबाग के कोटीपाब गांव के बागवान कुंदन पंवार के पास करीब दो हेक्टेअर में आड़ू, प्लम, खुबानी और कीवी के बगीचे हैं। वह कहते हैं कि इस बार मार्च की बारिश और ओलावृष्टि पहले ही बागवानों पर भारी पड़ गई है। रही-सही कसर लॉकडाउन से पूरी हो गई। तापमान कम होने से आड़ू की पत्तियां सिकुड़ रही हैं। सेब पर इस समय फूल आ रहे हैं। ये समय कीटनाशक के छिड़काव का है लेकिन कीटनाशक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। बाजार और सरकारी संस्थान सब बंद पड़े हैं। फिर बगीचे में काम के लिए लोग भी उपलब्ध नहीं हैं। यहां ज्यादातर नेपाल के मज़दूर काम करते थे। जो अपने घरों को लौट रहे हैं।

 

किसानों के साथ पशुपालकों के लिए भी बड़ी मुश्किल है। देहरादून के नकरौंदा गांव के किसान दीपक उपाध्याय कहते हैं कि जो चारा 900 रुपये प्रति क्विंटल तक मिलता था, उसकी कीमत अब 1300 रुपये से अधिक हो गई है। ज्यादातर सप्लाई पंजाब-हरियाणा से आती थी। दीपक के पास 12 गाय और 4 बछड़े हैं। उन्हें हर महीने करीब 20 क्विंटल भूसे की जरूरत पड़ती है। वह बताते हैं मनाही के बावजूद पशुओं का चारा भी महंगा हो गया। उन्होंने करीब 5 एकड़ ज़मीन में गेहूं लगाई है। कटाई का समय आ गया है। लेकिन मज़ूदर अपने घरों को लौट चुके हैं। पूरे गांव की यही समस्या है। दीपक कहते हैं कि बड़े किसान मशीनों से मंडाई-कटाई करते हैं लेकिन छोटे किसान मज़दूरों के भरोसे ही रहते हैं। 8-10 मज़दूर एक दिन में दो से ढाई एकड़ क्षेत्र में गेहूं की कटाई कर देते हैं। जिसके लिए प्रति एकड़ उन्हें 4 हजार मिल जाते हैं। मालिक-मजदूर दोनों निराश हैं।

टिहरी के नैनबाग में आड़ू के बगीचे (मार्च के बारिश से पैदावार हुई खराब)। फोटो: वर्षा सिंह

कृषि-बागवानी विशेषज्ञ डॉ राजेंद्र प्रसाद कुकसाल कहते हैं कि पहाड़ में ज्यादातर ऑफ सीजन फसल उगायी जाती है। कई लोग इसी की व्यवसायिक खेती करते हैं। उत्तरकाशी के पुरोला में बड़े पैमाने पर टमाटर उगाया जाता है। टिहरी में आगराखाल के पास बड़े स्तर पर अदरक बोया जाता है। ऊंचाई वाले जिलों चमोली, उत्तरकाशी में इस समय आलू बोने का समय है। इस सबके बीज बाहर से आते हैं। लेकिन लॉकडाउन के चलते बाज़ार और कंपनियां सब बंद हैं। यदि किसानों को समय पर बीज नहीं मिले तो उनकी अर्थव्यवस्था बिखर जाएगी।

उत्तराखंड में कृषि के साथ-साथ पर्यटन भी ग्रामीणों की आर्थिकी का ज़रिया है। दीपक नौटियाल ने नोएडा में नौकरी छोड़कर रिवर्स पलायन किया। पौड़ी के क्यार्क गांव में ऑर्गेनिक खेती शुरू की। साथ ही उनका होम स्टे भी है। वह बताते हैं कि यहां की सब्जियां आसपास के होटलों में चली जाती थीं। लेकिन इस समय सब ठप है। खेतों में लगे मज़दूर लौट गए हैं, जिनके भरोसे खेती हो पाती थी। होम स्टे को लेकर दीपक बताते हैं कि मार्च में आऩे वाले टूरिस्ट ने अपने कार्यक्रम रद्द कर दिए। अप्रैल से जून तक उनका पीक सीजन होता है। लेकिन इस बार तो पर्यटन पूरी तरह ठप रहेगा। वह कहते हैं कि नौकरी वालों को तो फिर भी वेतन मिल जाएगा। हमारा क्या होगा?

लॉकडाउन से चरमराती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कुछ और कदम भी उठाए जा रहे हैं। नैनीताल के पर्वतीय हिस्सों में सेब, आड़ू, जैसे फलों और मैदानी हिस्सों में आम, लीची के बागानों में काम के लिए श्रमिकों और वाहनों की आवाजाही की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही हल्दी, अदरक समेत सब्जियों की बुवाई और पौधों की सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे लोगों और वाहनों को आवश्यक सेवाओं में मानते हुए लॉकडाउन में छूट दी गई है।

राज्य के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल कहते हैं कि कोरोना वायरस का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। तो थोड़ा बहुत सभी प्रभावित होंगे। उन्होंने बताया कि आज ही ये शासनादेश जारी किए गए हैं कि पेस्टीसाइड, फर्टिलाइजर्स, बीज लाने-ले जाने पर पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। वह मानते हैं कि परिवहन की समस्या के चलते किसानों को गाड़ियां नहीं मिल पा रही हैं। इसके लिए न्याय पंचायत स्तर पर सचल दल को सक्रिय किया गया है। उन्हें कीटनाशक, बीज जैसी जरूरी चीजें उपलब्ध करायी जाएंगी और किसान सचल दल से ये जरूरी सामान खरीद सकते हैं। कृषि मंत्री ने बताया कि सेब के बागवानों को परिवार समेत ऊंचाई पर जाने की छूट दे दी गई है। सेब में छिड़काव के समय बागवान नीचे के घरों से ऊंचाई पर बगीचों के पास चले जाते हैं।