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लॉकडाउन ग्रामीण अर्थव्यवस्था : भागलपुर के बुनकरों की जिंदगी थमी

रेशम की बुनाई के लिए मशहूर भागलपुर में लगभग 12000 हथकरघा चलते हैं, जिनमें 30,000 बुनकर काम कर रहे हैं

By Umesh Kumar Ray

On: Thursday 09 April 2020
 
कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन के बाद से हथकरघा खामोश है। फोटो: उमेश कुमार राय
कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन के बाद से हथकरघा खामोश है। फोटो: उमेश कुमार राय कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन के बाद से हथकरघा खामोश है। फोटो: उमेश कुमार राय

भागलपुर जिले के जगदीशपुर के पुरैनी मोहल्ला निवासी 60 साल के महमूद अंसारी ने जब से होश संभाला है, तभी से हथकरघा चला रहे हैं। साल 1989 के भागलपुर दंगे की खौफनाक घटना को छोड़ दें, तो कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि दो हफ्ते तक हथकरघा बंद रहा हो। लेकिन, कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन के बाद से उनका हथकरघा खामोश है।

महमूद ने डाउन टू अर्थ को बताया, हम लोग माल नहीं खरीदते, बल्कि बड़े व्यापारी हमें धागा और बुनाई में काम आनेवाली दूसरी चीजें देते हैं और हम लोग सामान तैयार कर उन्हें वापस दे देते हैं। इसके एवज में हमें मजदूरी मिलती है। व्यापारियों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण बाजार बंद है, इसलिए सामान नहीं आ रहा है और न ही कोई ऑर्डर ही दे रहा है।”

महमूद ने कहा, “साल 1989 के दंगे से हमारा इलाके अछूता था लेकिन दहशत में एक महीने तक हथकरघा बंद रखना पड़ा था। हालांकि उस वक्त खेतों में काम कर खाने-पीने लायक कमाई कर देता था। इस लॉकडाउन में तो वो भी नहीं कर पा रहा हूं।”

रेशम की बुनाई के लिए मशहूर भागलपुर में लगभग 12000 हथकरघा चलते हैं, जिनमें 30,000 बुनकर काम कर रहे हैं। टेक्सटाइल मंत्रालय के अनुसार, भागलपुर समेत पूरे बिहार में लगभग 30,600 हथकरघा चल रहे हैं। इनमें लगभग 58,050 बुनकर काम करते हैं।

पूरे भारत की बात करें, तो फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के अनुसार 43.31 लाख बुनकर हथकरघा उद्योग से जुड़े हैं। महमूद की तरह ही लॉकडाउन के चलते देशभर के लाखों बुनकरों की रोजी-रोटी का जरिया लॉक हो गया है। 

बुनकरों के मुताबिक, रेशम की एक साड़ी बुनने पर 500 रुपए मिलते हैं, जबकि कपड़ों का थान बुनने की मजदूरी मीटर के हिसाब से मिलती है। एक मीटर बुनने की मजदूरी 40-50 रुपए मिलती है। एक थान में 30 मीटर होते हैं। महमूद ने बताया, “एक साड़ी बुनने में दो दिन लगते हैं। वहीं, एक थान तैयार करने में 6-7 दिन लग जाते हैं। कुल मिलाकर रोजाना के हिसाब से 250 से 300 रुपए की कमाई हो जाती है।”

हालांकि, परिवार चलाने के लिए इतनी कमाई पर्याप्त नहीं है। महमूद कहते हैं, “घर की महिलाएं कोकुन से रेशम निकालने का काम कर लेती हैं। कोकुन से रेशम निकालने पर रोज 50 रुपए मिलते हैं। लेकिन, लॉकडाउन के कारण सब काम ठप पड़ा है।” हथकरघा चलाने वाले ज्यादातर बुनकर भूमिहीन हैं। जब हथकरघा का काम मंदा होता है, तो ये खेतों में भी काम कर लेते हैं, लेकिन अभी पुलिसिया सख्ती के कारण ये खेतों में भी नहीं जा पा रहे हैं। 

भागलपुर के एक अन्य बुनकर 45 वर्षीय उमर अंसारी 20 साल से हथकरघा चला रहे हैं। उन्होंने कहा, “बुनाई का काम नहीं मिलने से भुखमरी की नौबत आ गई है। खिचड़ी खाकर किसी तरह जिंदा हैं। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में तो कुछ अनाज था, तो कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन पिछले एक हफ्ते से बहुत परेशान हैं। अभी तक 2,000 रुपए कर्ज ले चुका हूं। अगर जल्दी लॉकडाउन खत्म नहीं हुआ, तो और कर्ज लेना पड़ेगा।”

उमर अंसारी ने कहा, “लॉकडाउन खत्म होगा, तो दिन-रात करघा चलाकर कर्ज चुकाना पड़ेगा।” बिहार सरकार ने लॉकडाउन के कारण लोगों की जीविका पर आफत के मद्देनजर 100 करोड़ रुपए जारी करने और जून तक राशनकार्ड धारकों को फ्री राशन देने का ऐलान किया है। लेकिन, बुनकरों का कहना है कि उन तक ढेले भर सरकारी मदद भी नहीं पहुंची है। महमूद अंसारी ने बताया कि इलाके के जो समृद्ध लोग हैं, वे आटा, चावल, आलू देकर मदद कर रहे हैं, लेकिन सरकार की तरफ से अब तक कोई मदद नहीं मिली है।