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दशक पर एक नजर: क्या टूट रहा है ग्लोबलाइजेशन का भ्रम?

नई सदी के दूसरे दशक के दौरान हुए महत्वपूर्ण घटनाओं की एक श्रृखंला: इस कड़ी में पढ़ें, कैसे टूट रहा है वैश्वीकरण का भ्रम?

By DTE Staff

On: Friday 27 December 2019
 
Illustration: Ritika Bohra
Illustration: Ritika Bohra Illustration: Ritika Bohra

साल 2008 की आर्थिक मंदी ने वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) की अवधारणा को चकनाचूर कर दिया था। हालांकि खुली अर्थव्यवस्था ने उम्मीद के मुताबिक फायदा जरूर पहुंचाया और इस दौरान ही सबसे अधिक संपत्ति भी अर्जित की गई।  

वैश्वीकरण की वजह से दुनिया में संपत्ति के वितरण में असमानता बढ़ी है। यह  असमानता विकसित मुल्कों में ज्यादा रही। वहीं, विकासशील देश लंबे समय से चली आ रही इस असमानता की समस्या की अनदेखी कर उच्च आर्थिक विकास का लुत्फ ले रहे थे।

दिलचस्प बात यह है कि इस मॉडल से सबसे पहले उन देशों ने किनारा किया, जो इस विकास मॉडल के सिरमौर थे। अर्थव्यवस्था स्थानीय लोगों के लिए है, इस धारणा के साथ विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपनी पुरानी दुनिया में लौटने का फैसला कर लिया। नई पीढ़ी के लिए नया शब्द आया -  डीगलोबलाइजेशन।

हम अब आपको दिसंबर 2015 की ओर ले चलते हैं:

मुक्त बाजार में गिरावट

विकसित दुनिया के गरीब देश अमरीका ने डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति चुना। ट्रम्प की जीत अप्रत्याशित थी। लेकिन, आम लोगों के जिस गुस्से के चलते ट्रम्प की जीत हुई, वो अप्रत्याशित बिल्कुल भी नहीं था और इन गुस्साए लोगों का संदेश साफ था।

इसने दुनिया की आधी आबादी के बीच  काम कर रहे एकमात्र आर्थिक मॉडल मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाया। विकसित देशों द्वारा प्रचलित की गई इस अर्थव्यवस्था की समीक्षा साल 1990 से ही की जा रही है।

लेकिन, साल 2008 की मंदी के बाद की घटनाएं बताती हैं कि अर्थव्यवस्था के इस मॉडल में देश रुचि नहीं ले रहे हैं। यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में ब्रिटेन में वोटिंग वैश्वीकरण की सफलता का सबसे बड़ा रियलिटी चेक था। इसके अलावा स्पेन में उच्च स्तर पर पहुंची बेरोजगारी और ग्रीस में गंभीर आर्थिक संकट के चलते इन देशों में कठोर कदम उठाए गए। ये सब चेत जाने के संकेत थे।

ट्रम्प की जीत हमें याद दिलाती है कि मुक्त बाजार मॉडल में बुनियादी खामी है। यूरोपीय संघ में अमरीका के राजदूत एंथनी एल गार्डनर कहते हैं, “स्पष्ट तौर पर लोगों को लग रहा है कि वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार के फायदों का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है।” ट्रम्प की जीत से ये भी पता चलता है कि विकसित देश भी तीसरी दुनिया जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इनकी अर्थव्यवस्थाएं बुरी हालत में हैं। असमानता की खाई बढ़ रही है और मुक्त बाजार के फायदे का लाभ मुट्ठीभर लोगों को ही मिल रहा है। साथ ही मानव विकास सूचकांक नीचे की तरफ खिसक रहा है।

ट्रम्प के नारे “विश्ववाद नहीं, अमरीकावाद” ने अमरीका के श्वेत कामगार वर्ग के वोटरों को आकर्षित किया। वह भी तब, जब अमरीका, उत्तर अमरीकी मुक्त व्यापार समझौते (एनएएफटीए) के जख्मों से जूझ रहा रहा था। यह समझौता साल 1994 में अमरीका, मैक्सिको और कनाडा के बीच हुआ था।

अगर हम आठ साल पीछे 2001 में जाएं, तो जब “वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो” अभियान मजबूत हो रहा था और असमानता तथा लोगों की उम्मीदों को पूरा करने में मौजूदा अर्थव्यवस्था की विफलता के मुद्दे उठ रहे थे, तो अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन ने संकेत दिया था कि इसके पीछे एक नायक है। वह नायक है युवा। गौरतलब है कि 15 से 24 वर्ष के उम्र के लोगों की आबादी ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर है। इस आबादी ने मुक्त बाजार के सिवाय दूसरा कोई आर्थिक मॉडल नहीं देखा है।

अक्टूबर 2015 के मध्य  से मई 2016 के मध्य के बीच प्रतिबंधात्मक व्यापारिक गतिविधियों की समीक्षा करने वाली विश्व स्वास्थय संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जी20 अर्थव्यवस्थाओं ने साल 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से तेजी से सुरक्षात्मक आर्थिक कदम उठाए। रिपोर्ट के मुताबिक, जी20 अर्थव्यवस्थाओं ने कुल 145 नए प्रतिबंधात्मक व्यापारिक कदम उठाए यानी हर महीने औसतन 21 नए कदम उठाए गए। पिछली रिपोर्ट में हर महीने औसतन 17 कदम उठाए गए थे।

उसी दशक में

1992 का साल

इस साल दुनिया ने वैश्वीकरण की तरफ कई कदम बढ़ाए। ये साल बाजार की एकता और जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ (जीएटीटी) का साल भी रहा। अमीर सरकारों ने मुफ्त विश्व व्यापार के लिए शक्तिशाली जीएटीटी पर जोर दिया।

2018 का साल

इस साल ने याद दिलाया कि इस आधुनिक समय का पैटर्न पुराना है। 21वीं सदी में वैश्वीकरण के खिलाफ प्रतिक्रिया भी कठोर रूप से अलग रूप ले रही है। सदी के पूर्वार्द्ध में वाशिंग्टन सहमति और क्षेत्रीय एकजुटता को खारिज करते हुए लैटिन अमरीका की वामपंथी सरकारों ने नवउदारवाद को चुनौती दी।