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मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहे हैं प्रवासी मजदूर

महामारी और लॉकडाउन से उपजी 'असुरक्षा' ने अप्रवासी मजदूरों को डरा दिया है

By Ramesh Sharma

On: Monday 27 April 2020
 
खुले में खाना बनाते मजदूर परिवार। फोटो: रमेश शर्मा
खुले में खाना बनाते मजदूर परिवार। फोटो: रमेश शर्मा खुले में खाना बनाते मजदूर परिवार। फोटो: रमेश शर्मा

उसका नाम कुछ भी हो सकता है। वह उन लाखों श्रमिकों में एक है जिसने लगभग लगभग डेढ़ महीने पहले इस सपने के साथ घर छोड़ा कि पलायन करके मजदूरी से थोड़ी कमाई करूंगा, ताकि घर परिवार का साल भर गुजारा हो सके। 

मध्यप्रदेश के सीधी जिला के कुसमी वनांचल क्षेत्र से पलायन करके मार्च के पहले हफ्ते में 'वह' लगभग 500 किलोमीटर दूर सागर जिला पहुंचा था। अपने 22 अन्य साथियों के साथ मिलकर एक पखवाड़े में थोड़ा ही कमा पाया था कि महामारी की आशंका से लॉकडाउन घोषित कर दिया गया।

कामबंदी ने उसे कहीं भीतर ही भीतर आशंका और असुरक्षा से भर दिया। उसके साथी लगातार दिलासा देते रहे, लेकिन किसी को भी यह अहसास नहीं था कि 'वह' भीतर तक टूट चुका है। कामबंदी की निराशा में सबने तय कर लिया कि खाली हाथ अब वापस घर लौटना ही पड़ेगा। 3-4  दिनों की थका देने वाली यात्रा के बाद जब मजदूरों का 23 सदस्यीय दल वापस अपने गांव लौटा तो प्रशासनिक प्रक्रियाओं के मुताबिक इन सभी श्रमिकों को 22 अप्रैल को दुबरीकला स्कूल के क्वारंटीन सेंटर में दाखिल कर दिया गया।

उसे अपने गांव पहुंचकर भी घर नहीं जा पाने का अफसोस रहा होगा। उसने अधिकारियों से गुजारिश भी की, लेकिन सभी कायदे और प्रक्रियाओं से बंधे थे। एक दिन तो किसी तरह उसने छटपटाहट में काट ली, लेकिन अगले दिन ही वह जंगल की ओर निकल पड़ा - और कुछ घंटों के बाद जंगल के किसी पेड़ पर उसकी देह लटकती हुई मिली।

उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की, किसी पर अपनी आत्महत्या का दोष नहीं मढ़ा, किसी से कोई रंजिश नहीं निभाई - बस एक अलिखित / अनकही विरासत छोड़ गया, जो उसके जैसे किसी भी मजबूर का हो सकता है। लोग राजभान बैगा के इस बेचैन कर देने वाली कहानी को शायद कभी नहीं भूल पाएंगे।

और फिर, यह झारखंड के किसी अनाम गांव से खरगौन आए कमल कुमार या बिहार से कपूरथला आए सरजू की कहानी हो, जिन्हें महामारी नहीं - बल्कि महामारी और लॉकडाउन से उपजे 'असुरक्षा' ने डरा दिया है। वो ओडिशा के संजय डुंगडुंग और असम के पलाश राजखोवा भी हो सकते हैं, जिनका 'डर' जायज कारणों से पैदा हुई असुरक्षा है।

बहरहाल, यह समझना जरूरी है कि ऐसे हजारों श्रमिकों के मन-मस्तिष्क में जारी उथलपुथल के संकेत क्या हैं? इन संकेतों को पढ़ने-समझने का साहस आखिर किसमें है? क्या यह महज आर्थिक असुरक्षा के संकेत हैं? या ये घटनायें यह प्रामाणित कर रही हैं कि हमारी 'आपदा प्रबंधन' की मानसिकता में ही कहीं कुछ गंभीर खामियां हैं?

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विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि - कोविड 19 के महामारी से प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी आपदा का लक्ष्य लॉकडाउन के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष प्रभाव से होने वाला 'मनोविकार' भी होना चाहिये। फ्रांस पहला देश है, जिसने नवें दशक के मध्य में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदा से होनें वाले मनोविकारों के उपचार के लिये 'मनोपचार केंद्रों' की स्थापना की। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आरटीईपी (रिसेंट ट्रॉमेटिक एपिसोड प्रोटोकॉल) और जी-टीईपी (ग्रुप ट्रॉमेटिक एपिसोड प्रोटोकॉल) जैसे मानक प्रक्रियाएं सुनिश्चित की है 

इंडियन जर्नल ऑफ साइकाइअट्री (जनवरी 2010) के अनुसार भारत का एक बड़ा भू भाग प्राकृतिक आपदा के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है जहां 'मानसिक स्वास्थ्य' आपदा प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। इसके अनुसार लगभग 60 फीसदी क्षेत्र भूकंप प्रभावित, लगभग 8 फीसदी चक्रवात प्रभावित, लगभग 68 फीसदी सूखा प्रभावित क्षेत्र और लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है, जहां आपदा का सीधा प्रभाव लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

एसोसिएशन ऑफ मेडिसिन एंड साइकाइअट्री (2008) के द्वारा किये गए शोध भी बताते हैं कि सुनामी के बाद बचे हुये अनेक पीड़ितों में मानसिक व्याधियों के लक्षण पाये गये थे।  दुनिया भर के मनोविज्ञानी मानते हैं कि कोविड 19 महामारी से प्रभावित दुनिया में निश्चित रूप से मनोविकार के रूप में  एक बड़ी चुनौती बनकर आएगी। 

एकता परिषद द्वारा पलायन करने वाले श्रमिकों के संबंध में एकत्र जानकारी और चुनिंदा प्रकरण उपरोक्त संदर्भों की पुष्टि करते हैं। लगभग 25000 श्रमिकों से प्राप्त जानकारी कहती है कि 92 फीसदी श्रमिक किसी भी तरह अपने गांव लौटना चाहते हैं, जिनमें से अधिकांश कृषि श्रमिक तो, जो आधा-अधूरा कमाया था वो भी विगत एक माह में गंवा चुके हैं। मुंबई और अहमदाबाद हो या बंगलौर और एनराकुलम, अधिकांश भवन निर्माण मे लगे हुये हजारों कारीगरों को लगता है कि इस वक्त सबसे बड़ा आश्रय गांव की उनकी अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी ही है।

अहमदनगर, सूरत, चेन्नई और रायगढ़ के बंद पड़े कंपनियों के सन्नाटे में रह रहे कई श्रमिकों को भी यही लगता है कि कोई तो उनके भी 'मन की बात' सुनें। भारत में अब से पहले आपदा प्रबंधन की चुनौतियां इतनी बड़ी कभी नहीं रही। बेहतर होगा कि इस संकटकाल में हम 'जन और तंत्र' दोनों के समझ का दायरा बढ़ाएं। 

(लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)