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भूखे बच्चों के लिए जिंदगी में पहली बार हाथ फैलाया

राजस्थान के सवाई माधोपुर से मध्यप्रदेश की शिवपुरी लौटी सुमित्रा और उसके परिवार की कहानी

On: Tuesday 26 May 2020
 
मध्यप्रदेश के शिवपुरी इलाके की सावित्री राजस्थान के सवाई माधोपुर से पैदल चलकर अपने घर पहुंची है। फोटो: राकेश कुमार मालवीय
मध्यप्रदेश के शिवपुरी इलाके की सावित्री राजस्थान के सवाई माधोपुर से पैदल चलकर अपने घर पहुंची है। फोटो: राकेश कुमार मालवीय मध्यप्रदेश के शिवपुरी इलाके की सावित्री राजस्थान के सवाई माधोपुर से पैदल चलकर अपने घर पहुंची है। फोटो: राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीय/अजय यादव

यह दास्तां मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की पोहरी तहसील के गांव मचाखुर्द की सुमित्रा आदिवासी की है। सुमित्रा अपने पति तुलसी और चार बच्चों के साथ राजस्थान के सवाई माधोपुर के पास भैरानड़ गांव में गेहूं की कटाई करने गई थी। 

सुमित्रा, उसके पति तुलसी और उनके 13 वर्षीय बेटे जवाहर ने गेहूं कटाई की। उन्हें एक बीघा की कटाई के बदले 120 किलो गेहूं मिला। लेकिन तब ही वहां लॉकडाउन हो गया। 

सुमित्रा बताती हैं कि साथ में गांव के और लोग भी थे। पहले घर लौटने के लिए गाड़ियों का पता किया, लेकिन सब गाड़ियां बंद थी। पांच दिन तक इंतजार किया। अंतत: एक दिन सभी ने पैदल घर वापसी की ठान ली, लेकिन सवाल उठा कि गेहूं कटाई के बदले मिले अनाज को कैसे ले जाएंगे? गेहूं वहीं 16 रुपए किलो के भाव से बेचना पड़ा। इससे हमें 5,525 रुपए मिले। 

सभी अपनी गृहस्थी को गठरी में बांधकर निकल पड़े। जो बच्चे चल नहीं पाते, उन्हें उनके परिजन गोद में लेकर चल रहे थे। सुमित्रा के मुताबिक रास्ते में जगह-जगह पुलिस का कड़ा पहरा था, इसलिए हम रात में चलते और दिन में कहीं भी चुपचाप समय काट लेते। चार रात पैदल चलने के बाद हम मध्यप्रदेश की सीमा पर पहुंचने की स्थिति में आए। इस बीच हमने दो पार्वती और चंबल नदी पार की। 

सुमित्रा की 18 माह की बेटी गोद में थी। चंबल नदी पार करते समय पैरों से कुछ टकराया और बेटी हाथ से छूटकर नदी में गिर गई। मुझे लगा अब जिंदगी खत्म, लेकिन भगवान का शुक्र है उसके पति ने छलांग लगाकर उसे बचा लिया। अब तक की जिंदगी में ये चार दिन सबसे कठिन गुजरे।

सुमित्रा बताती हैं कि जब हम राजस्थान से घर के लिए निकले तो खाने के लिए ज्यादा सामान नहीं था। एक दिन ऐसा आया जब हमारे पास एक निवाला भी नहीं बचा।  बिलखते बच्चों को कौन समझाए कि रोटी क्यों नहीं है ! वे भूख के मारे बिलखते थे। अंतत: हिम्मत जुटाकर एक गांव में एक दरवाजे पर दस्तक दी और कहा बहन मेरे बच्चे भूखे हैं। रोना बंद नहीं कर रहे हैं। दो रोटी दे दो। 

इस पर उन्होंने आठ-दस रोटियां दीं। इन रोटियों से बच्चों की भूख शांत हुई। पहली बार किसी के सामने दो रोटी के लिए हाथ फैलाना पड़ा।

चार दिन तमाम परेशानियों को झेलने के बाद मध्यप्रदेश की सीमा पर पहुंचे सुमित्रा सहित उनके गांव के अन्य परिवारों को उम्मीद थी कि यहां से कोई वाहन मिल जाएगा, जो उन्हें उनके गांव छोड़ देगा। उन्होंने वाहन तलाशा तो एक ट्रैक्टर वाला जाने को तैयार हुआ, लेकिन उसने 12 हजार रुपए किराया मांगा। हालांकि, सभी लोग तैयार हो गए। उसी रात ट्रैक्टर बढ़ा और सभी को गांव छोड़ दिया। सुमित्रा और तुलसी के हिस्से में 1000 रुपए किराया आया।

गांव आने के बाद उन्होंने 1800 रुपए के हिसाब से दो क्विंटल गेहूं खरीदा। बाकी कुछ रुपए थे, जिससे मसाला सहित अन्य सामान खरीद लिया। अब उनके पास बिलकुल पैसा नहीं है। अंत्योदय योजना के तहत राशन डिपो से उन्हें तीन महीने का 105 किलो गेहूं-चावल मिला था। इससे एक महीना गुजर गया। हम चावल नहीं खाते हैं, इसलिए उसे 15 रुपए किलो के हिसाब से बेच दिया। इससे जो पैसा मिला, उसे खेत की जुताई पर खर्च कर दिया। बारिश आने को है, खेत बनाना भी तो जरूरी है।

सुमित्रा ने बताया कि उनके पास तीन बीघा जमीन है, लेकिन इसमें इतनी पैदावार नहीं होती कि सालभर का गुजारा हो जाए।