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आरटीआई पर सरकार की नीयत कभी ठीक नहीं रही

आरटीआई ने ही पहली बार देश की अधिकांश आबादी को असली मालिक होने का अहसास दिलाया और जनता ने भी इस अधिकार के प्रयोग में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की 

On: Friday 02 August 2019
 
फोटो अंजली भारद्वाज के टि्वटर अकाउंट से ली गई है।
फोटो अंजली भारद्वाज के टि्वटर अकाउंट से ली गई है। फोटो अंजली भारद्वाज के टि्वटर अकाउंट से ली गई है।

अफरोज आलम साहिल 

सूचना के अधिकार (आरटीआई) में किसी भी तरह का संशोधन हर तरह से निंदनीय है। लेकिन हमें यह भी समझना पड़ेगा कि 2014 के बाद से ही आरटीआई की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। इससे पहले भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी। इस कानून की हालत बिगड़ने की एक अहम वजह यह है कि मौजूदा सरकार की नीयत इस कानून को लेकर कभी भी सही नहीं रही। यह अलग बात है कि हमारे प्रधानमंत्री अपने भाषणों में आरटीआई को बढ़ावा देने की बात करते रहे। वह अपने भाषणों में सरकारी विभागों से कहते रहे कि आरटीआई आवेदनों का जवाब देते हुए तीन ‘टी’- टाइमलीनेस (समयबद्धता), ट्रांसपैरेंसी (पारदर्शिता) और ट्रबल-फ्री (सरल पद्धति) को ध्यान में रखें। लेकिन कहानी इससे बिल्कुल अलग है। सरकार अपने विभिन्न तरीकों से मुश्किलें खड़ा कर इस कानून को खत्म करने में लगी रही।  

इस सरकार का हमेशा पारदर्शिता से अधिक गोपनियता पर जोर रहा। जरा खुद केन्द्रीय सरकार के अपने अफसरों और कर्मचारियों को ऑफिस मेमोरेंडम के रूप में जारी उस निर्देश को याद कर लीजिए, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा था कि संवेदनशील सूचनाएं लीक नहीं होनी चाहिए। खुद आरटीआई से हासिल जानकारी बताती है कि तत्कालीन सरकार ने आरटीआई के प्रचार-प्रसार के बजट में 80 फीसदी राशि की कटौती की।

बता दें कि इस संशोधन के साथ ही केन्द्रीय सूचना आयोग व तमाम राज्य सूचना आयोग पूरी तरह से सरकार की गिरफ्त में आ जाएंगे। फिर उनको सरकार के इशारों पर ही चलना होगा। फिर कोई सूचना आयुक्त ये हिम्मत नहीं जुटा पाएगा कि वह सरकारी अधिकारियों को पीएम से संबंधित किसी भी तरह का दस्तावेज़ सार्वजनिक करने का आदेश दे। लेकिन बावजूद इसके मैं यहां बताना चाहूंगा कि कुछ मामलों को अगर छोड़ दिया जाए तो केन्द्रीय सूचना आयोग व तमाम राज्य सूचना आयोग पर सरकार का नियंत्रण पहले भी था। आप देख सकते हैं कि एक-दो आयुक्तों को छोड़कर तमाम आयुक्त नौकरशाह व सरकारी पहुंच रखने वाले लोग ही बने हैं। यही नहीं, आयोग में लंबित मामले, सूचना आयुक्तों की कमी, जुर्माना न लगने की वजह से सूचना अधिकारियों का टालने वाला रवैया और अदालती दखल व राज्य के नोटिफिकेशन आरटीआई को कमजोर करने का काम करते रहे हैं। मेरी एक अपील में केंद्रीय सूचना आयोग ने एम्स को दिए गए अपना ही आदेश वापस ले लिया।

यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि आरटीआई ने ही पहली बार देश की अधिकांश आबादी को असली मालिक होने का अहसास दिलाया और जनता ने भी इस अधिकार के प्रयोग में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की। सामान्य जनमानस के लिए यह कानून कई मामलों में वरदान साबित हुआ। लेकिन देश के ताजा हालात में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सरकार इस कानून को हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहती है। निश्चित तौर पर सरकार इसे अचानक खत्म नहीं कर सकती है। लेकिन इसके लिए सिस्टम ऐसा जरूर बना दिया जाएगा कि लोग जानकारी मांगने के लिए आरटीआई आवेदन डालना ही छोड़ देंगे। आप ही सोचिए कि जब आम लोगों के जेहन में ये बैठ जाएगा कि अब आरटीआई कानून पूरी तरह से खत्म हो चुका है, मुझे कोई सूचना मिलेगी ही नहीं, तो फिर आखिर कौन सोचेगा कि आरटीआई डालकर सूचना मांगी जाए।  

इस संशोधन से आरटीआई कानून खत्म हो जाएगा, ये कहना थोड़ा ज्यादा हो जाएगा। क्योंकि सरकार ने अभी सूचना की परिभाषा में कोई छेड़छाड़ नहीं की है, जुर्माना के प्रावधान में कोई संशोधन नहीं किया है, आयोग के अधिकार वाली धाराओं में तब्दीली नहीं की गई है। सिर्फ आयुक्तों के वेतन और उनके कार्यकाल को तय करने की बात कही गई है। यानी अभी भी इस कानून में बहुत कुछ बचा हुआ है। मगर कुछ चीजें चिंताजनक जरूर हैं। यकीनन सूचना आयोग अब सरकार का एक महकमा बनकर रह जाएगा।

बता दें कि केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत स्थापित संस्था है। ठीक उसी प्रकार जिस तरह से नीति आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। ऐसे में हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि कहीं सरकार का अगला निशाना इन संस्थाओं पर तो नहीं होगा।

आखिर में यही कहना है कि सूचना का अधिकार मीडिया की ही देन है। 1982 में जब मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) का जन्म भी नहीं हुआ था, उस वक्त द्वितीय प्रेस आयोग और प्रेस परिषद ने ही सूचना के अधिकार की वकालत की थी। 13 जुलाई 1990 को भारतीय प्रेस परिषद ने इस संबंध में अपनी सिफारिशें पेश कीं। 1990 के बाद जब राजस्थान में एमकेएसएस का जन-आंदोलन चला, उसमें भी मीडिया के लोगों ने और स्वयं मीडिया ने अपनी जबरदस्त भूमिका निभाई। वास्तव में “जानने का अधिकार-जीने का अधिकार” का नारा सर्वप्रथम प्रभाष जोशी ने ही जनता के लिए जनसत्ता अखबार के अपने संपादकीय में दिया था।

अगर मैं अपने खुद के तजुर्बे की बात करूं तो कई बार ऐसा हुआ है कि किसी विभाग में आरटीआई डालना भी खबर बन चुकी है। खुद कम से कम हजारों ऐसी सूचनाएं मैंने अपनी वेबसाइट के माध्यम से इस देश की तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया तक पहुंचाई हैं।

सूचनाधिकार कार्यकर्ता रोज खबरें निकाल रहे हैं। ये कार्यकर्ता अब पत्रकारों को ‘एक्सक्लूसिव’ खबरें उपलब्ध करा रहे हैं। लिहाजा, मीडियाकर्मी सूचनाधिकार की ताकत समझ कर इसका समुचित उपयोग शुरू कर दे, तो पत्रकारिता का पूरा दृश्य बदल सकता है और आरटीआई के खत्म होने की जो बात की जा रही है, वो भी खत्म हो जाएगी। अगर पत्रकारों ने इसका सकारात्मक इस्तेमाल शुरू कर दिया तो सरकार की आरटीआई को खत्म कर देने की मंशा कभी पूरी नहीं हो सकेगी।    

(लेखक beyondheadlines.in के सम्पादक हैं)