Wildlife & Biodiversity

रायपुर के पास घूम रहे हैं डेढ़ दर्जन हाथी

कई लोगों ने हाथियों के इस दल को राजधानी रायपुर से महज 30 किलोमीटर दूर आरंग तक में विचरण करते हुए देखा है

 
Last Updated: Friday 16 August 2019
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ ही दूरी पर दिखाई दे रहा हाथियों का झुंड। फोटो: बलराम साहू
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ ही दूरी पर दिखाई दे रहा हाथियों का झुंड। फोटो: बलराम साहू छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ ही दूरी पर दिखाई दे रहा हाथियों का झुंड। फोटो: बलराम साहू

अवधेश मलिक 

जंगली हाथियों का एक दल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज 70 किलोमीटर भीतर घुस आया है। इसमें 18 से अधिक जगंली हाथी शामिल हैं, वे बार-नवापारा के जंगल के पास आकर जम गए हैं, और वे लगातार अपनी जगह बदल रहे हैं। वे लगातार खेतों में घुस जा रहे हैं और फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई लोगों ने हाथियों के इस दल को राजधानी से महज 30 किलोमीटर दूर आरंग तक में विचरण करते हुए देखा है। 

स्थानीय सोशल एक्टिविस्ट देवेंद्र बघेल बताते हैं कि पिछले वर्ष तो हाथियों का दल रायपुर के विधानसभा क्षेत्र में स्थापित दिशा कॉलेज तक पहुंच गए थे और लोगों की जान सांसत में आ गई थी। लेकिन, इस बार यह सिरपुर के कठियाडीह, अरण जैसे क्षेत्रों में देखे गए हैं। ये हाथी खेतों में घुस रहे हैं। लोगों काे डर है कि ये घरों में भी न घुस जाएं।

वैसे वन विभाग के लोग इनके बारे में पता करते रहते हैं। इसी वर्ष जून के महिने में हाथियों का एक दल ने रायपुर से सटे आरंग के पास गुदगुदा गांव में डोमार साहू की कुचल कर हत्या कर दी थी। दो हाथियों के बच्चों की डूबने से मौत हो गई। हाथियों के तहस-नहस से परेशान सिरपुर क्षेत्र के लोगों, खेत में बिजली का करंट प्रवाहित तार लगा दिया था, जिसमें उलझ कर एक हाथी की जान चली गई

यह समस्या मात्र महासमुंद या रायपुर क्षेत्र की ही नहीं है। इस समस्या से सरगुजा, धर्मजयगढ़, कोरबा, रायगढ़, कोरिया, जशपुर, बिलासपुर, गरियाबंद जैसे कई जिले प्रभावित हैं। जानकार बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में करीब 300 हाथी झारखंड एवं ओड़िषा के रास्ते आते-जाते रहते हैं। 

30 जुलाई,2019 को दातुन करने गए कोंधरा गांव के कलिंदर राठिया (60) को कोरबा वनमंडल में एक दंतैल कुचल कर मार दिया। उससे पहले जंगली हाथी ने एक दिन पहले एक मासूम को कुचल कर मार दिया था। करतला के स्थानीय निवासियों के मुताबिक दो व्यक्तियों को हाथियों ने कुचल कर मार डाला और घर तोड़ कर उसमें रखे महुआ को खा गए। 

इससे पहले कोरबा, कुदमुरा, कटघोड़ा, रायगढ़ से लेकर धर्मजयगढ़ तक में गणेश नामक हाथी का आतंक रहा है, इस पर ग्यारह से अधिक लोगों को कुचल कर मारने का आरोप लगा है। लोगों का इस हाथी के प्रति गुस्सा इतना था कि हाथी द्वारा लगातार लोगों के कुचल कर मार डालने के बाद पीड़ित रहवासियों ने स्थानीय वन विभाग के कार्यालय को घेर लिया था तथा उसमें तोड़-फोड़ तक करने लगे थे। पुलिस के हस्तक्षेप से बड़ी मुश्किल वन विभाग के कर्मचारी गुस्साए हुए लोगों के हाथों शिकार होने से बचे थे। धर्मजयगढ़ जहां के जंगलों में अक्सर हाथी को देखा जाता था, वहां भी आए दिन हाथियों का उत्पात रहता है।

वर्ष 2013-18 तक में छत्तीसगढ़ में 250 लोगों को जान हाथियों के कारण गई जबकी 100 हाथियों की मौत भी इस प्रदेश में हुई। वहीं भारत सरकार के आंकड़े के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2015-18 के मध्य 1713 लोगों की जानें हाथियों के द्वारा कुचले जाने के कारण हुई। वहीं, मरने वाले हाथियों की संख्या 373 रही। सर्वाधिक बंगाल में 307 और ओडिशा में 305 लोगों की मौत हाथियों के कारण हुई। जबकि वर्ष 2018 में देश में 227 लोगों की मौत हाथियों के वजह से हुई थी। इसमें भी हाथियों के द्वारा कुचले जाने से सर्वाधिक मौत असम में दर्ज की गई। 

हालांकि इन आंकड़ों पर गौर करे तो भले ही छत्तीसगढ़ का नाम हाथियों से सर्वाधिक मानव मौतें होने वाले राज्यों से शामिल नहीं हैं, लेकिन जिस तेजी से मौतें हो रही है उससे मामला बिगड़ सकता है।
कोरबा के स्थानीय सोशल एक्टिविस्ट लक्ष्मी चौहान बताते हैं कि पिछले 15 वर्षों से फिर जंगली हाथियों ने छत्तीसगढ़ के झारखंड एवं ओडिशा से सटे जंगलों में दस्तक दी है। उसके बाद में हाथी-मानव द्वंद की घटनाएं बढ़ती चली जा रही है और आतंक बढ़ता ही जा रहा है।

कोडार बांध के पानी में नहाते हाथी। फोटो: बलराम साहू

इसके पीछे का कारण वे बताते हैं कि झारखंड एवं ओड़िसा में बड़े ही तेजी के साथ खनन पर आधारित लोहा, ईस्पात, कोयला आदि के उद्योग स्थापित किए गए। खनन पर आधारित जब भी उद्योग स्थापित किया जाता है तो उसमें ब्लास्ट होते हैं, बड़े तेजी से जंगल काटे जाते हैं। ऐसे में उनका रहवासी क्षेत्र खतरे में पड़ने लगा तो वे भाग कर छत्तीसगढ़ के अपने पुराने जंगल आने लगे और अब जब वही गतिविधियां यहां भी होने लगा तो वे कहां जाएं। 

मिली जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ हसदेव-अरंड क्षेत्र में जंगल 1,70,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है और सरकार 7730 हेक्टेयर भूमि खनन के लिए देने जा रही है। जाहिर है ऐसी परिस्थिति रही तो हाथी-मानव लड़ाई तो देखना ही पड़ेगा। इस पर आरटीआई एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला कहते हैं- सरकार जिसकी भी रही हो, छत्तीसगढ़ में माईनिंग नहीं रुकी है। अब ऐसे समय में इस समस्या को हम दूसरे नजरिये से देखने की जरूरत है। अगर छत्तीसगढ़ में एलिफेंट सफारी बना दिया जाए तो कैसा रहेगा। सरकार को इस पर सोचना चाहिए, क्योंकि इससे आय भी बढ़ेगी और इन दंतैलों की रक्षा भी हो जाएगा, मानव और जंगली हाथियों के मध्य यह जो लड़ाई है उसमें कमी लाई जा सकती और इसके लिए व्यापक प्रयास करने होंगें।

वहीं, प्रमुख वन संरक्षक वाईल्ड लाईफ अतुल शुक्ला बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में वन विभाग इंसानों और हाथियों के बीच हो रही झड़पों को कम करने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए 15 अगस्त को राज्य के मुख्यमंत्री ने कोरबा में लेमरू एलिफेंट रिजर्व बनाने की घोषणा की है।  इस एलिफेंट रिजर्व में 4 डिवीजन हैं- लेमरू, कटघोरा, कोरबा, धर्मजयगढ़। यह क्षेत्र नॉन फॉरेस्ट एक्टिविटी के लिए प्रतिबंधित हो जाएगा। इसमें हसदेव, मांड नदी का कैचमेंट एरिया शामिल है।

2007 में भारत सरकार ने लेमरू रिजर्व के नाम पर मात्र 450 वर्ग किलोमीटर एरिया का सहमति दी थी उस लिहाज से यह क्षेत्रफल काफी बड़ा है, और इसमें वे तमाम सुविधाएं होगी जो एक हाथी के लिए रहना चाहिए। मसलन खाना, पानी, रहने ही जगह आदि की व्यवस्था रहेगी। रही बात एलिफेंट कॉरिडोर की तो उसकी कोई लीगल बाईंडिंग नहीं होती है तथा इस रिजर्व के 10 किलोमीटर दूर तक ऑपरेशनल माईन्स की बाहरी किनारा होगा। शुक्ला बतात हैं कि लेमरू रिजर्व घोषित होने के बाद काफी हद तक सुलझने की संभावना है। 

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