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तेल व गैस उद्योग पहुंचा रहे हैं सागरों को नुकसान: स्टडी

पिछली एक सदी के दौरान समुद्री संसाधनों के दोहन और उसपर आधिपत्य की एक अंधी दौड़ चल रही है। जिसने वैश्विक स्तर पर अस्थिरता पैदा कर दी है 

By Lalit Maurya

On: Monday 27 January 2020
 
Photo credit: Pixabay
Photo credit: Pixabay Photo credit: Pixabay

इंसान की अभिलाषा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए धरती के संसाधन कम पड़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि आज इंसान ने अंतरिक्ष और समुद्री संसाधनों का दोहन शुरू कर दिया है। 21वीं सदी की शुरुआत से ही समुद्रों पर मानव का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। समुद्र की स्थिति को जानने के लिए किये गए एक व्यापक विश्लेषण में इस बात का पता चला है। जिसके अनुसार भविष्य में भी इसमें कमी आने के कोई संकेत नहीं दिख रहे।

वैज्ञानिकों ने नाटकीय रूप से हो रही इस वृद्धि को "ब्लू एक्सिलरेशन" नाम दिया है। इस प्रभाव को समझने के लिए स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने शिपिंग, ड्रिलिंग, डीप-सी माइनिंग, एक्वाकल्चर, बायोप्रोस्पेक्टिंग आदि के सम्बन्ध में करीब 50 वर्षों के डेटा को विश्लेषण किया है। जिसके परिणाम जर्नल वन अर्थ में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तेल और गैस उद्योग ने महासागरों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है।

यह क्षेत्र समुद्री संसाधनों के लगभग एक तिहाई हिस्से का दोहन कर रहा है। वहीं दूसरी ओर दुनिया भर में निर्माण उद्योग की मांग तेज़ी से बढ़ती जा रही है। जिसे पूरा करने के लिए रेत और बजरी का बड़े पैमाने पर खनन किया जा रहा है। विश्लेषण के अनुसार, दुनिया भर में मीठा पानी तेजी से दुर्लभ होता जा रहा है। जिसको देखते हुए पिछले 50 वर्षों में समुद्र के खारे पानी को साफ करने के लगभग 16,000 संयंत्र लगाए गए हैं। 

आखिर कौन जिम्मेदार है? 

स्टॉकहोम रेजिलिएशन सेंटर से जुड़े और इस अध्ययन के प्रमुख जीन-बैप्टिस्ट जौफरे ने बताया कि, "समुद्र और अंतरिक्ष के संसाधनों का दोहन कोई नयी बात नहीं है। लेकिन आज जिस तेजी से इंसान इच्छाएं और आकांक्षाएं बढ़ती जा रही है। उसने इन साधनों का दोहन बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है।" पिछली एक सदी से तकनीकी विकास की दर में तेजी आयी है। वहीं दूसरी ओर भूमि पर मौजूद संसाधनों में आ रही गिरावट ने इंसान को समुद्रों की तरफ देखने के लिए प्रेरित किया है। यही वजह है कि समुद्रों का भी औद्योगिकीकरण होता जा रहा है। वास्तव में ब्लू एक्सेलेरेशन समुद्री संसाधनों और उसपर आधिपत्य की एक अंधी दौड़ है। जो वैश्विक स्तर पर अस्थिरता पैदा कर सकती है।"

इस अध्ययन में मानव के कुछ सकारात्मक पहलु भी सामने आये हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2000 के बाद से कई जगह संरक्षित क्षेत्र में तेजी से वृद्धि हुई है। साथ ही व्यवसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा में हो रही वृद्धि ने दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन की निर्भरता को कम कर दिया है। शोधकर्ताओं ने ब्लू एक्सिलरेशन पर अधिक ध्यान देने को कहा है। उनके अनुसार समुद्रों को बचाने के लिए यह जानना जरुरी है कि इसके दोहन के लिए कौन जिम्मेदार है। कौन इसके लिए धन जुटा रहा है और कौन सबसे अधिक इसका फायदा उठा रहा है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2021 को "महासागरों के दशक" के रूप में इंगित किया है। यह महासागरीय संसाधनों के प्रबंधन का एक अवसर है। जोकि हमारे लिए एक मौका है कि हम समुद्रों पर पड़ने वाले सामाजिक-पारिस्थितिक प्रभावों का आंकलन कर सकें। और दीर्घकालिक स्थिरता को प्राप्त कर सकें । वैज्ञानिकों का मानना है कि सी फ़ूड इंडस्ट्री, तेल और गैस, खनन और बायोप्रोस्पेक्टिंग उन तमाम उद्योगों में से कुछ है जो बड़े पैमाने पर समुद्रों का दोहन कर रहे हैं। जिसपे बड़े पैमाने पर कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है। उनका सुझाव है कि बैंक और अन्य निवेशकों को समुद्री संसाधनों पर निवेश करने से पहले पर्यावरण को भी ध्यान में रखना चाहिए। और उसके लिए अधिक कठोर मानदंड अपनाने की जरुरत है।