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क्या कोविड-19 के चलते कट जाएगी 3 करोड़ लोगों की बिजली

कोविड-19 के चलते उपजे आर्थिक संकट के चलते करीब 3 करोड़ लोग बिजली सम्बन्धी सेवाओं का भुगतान कर पाने में असमर्थ थे, इसका सबसे ज्यादा असर एशिया और अफ्रीका पर पड़ा है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 08 June 2021
 

कोविड-19 एक ऐसी महामारी जिसने करीब-करीब दुनिया के हर इंसान को प्रभावित किया है। भले ही वजह अलग-अलग हो सकती है पर असर सब पर पड़ा है। ऐसा ही कुछ बिजली के मामले में भी हुआ है, जोकि आज हर व्यक्ति की जरुरत बन चुकी है। अनुमान है कि इस महामारी के चलते 2020 में करीब 3 करोड़ लोग अपना बिजली का बिल भर पाने में असमर्थ रहे थे, क्योंकि इस महामारी ने उनकी नौकरियों और आय को प्रभावित किया था ।

हाल ही में जारी ट्रैकिंग एसडीजी 7: द एनर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार इसका सबसे ज्यादा असर एशिया और अफ्रीका पर पड़ा है, जहां कोविड-19 के कारण करीब 2.5 करोड़ लोग अपना बिजली का बिल नहीं भर पाए थे। रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि हुई है कि पिछले कई वर्षों से लोगों तक बिजली की पहुंच लगातार बढ़ रही थी, लेकिन 2020 में ऐसा नहीं होगा, इसका मतलब है कि इस वर्ष बिजली की पहुंच से दूर लोगों की संख्या पहले के मुकाबले बढ़ जाएगी।

2019 में दुनिया के 90 फीसदी से ज्यादा लोगों तक बिजली पहुंच चुकी थी। इस दिशा में पिछले एक दशक में अच्छी-खासी प्रगति भी हुई है। 2010 में जहां बिजली की पहुंच से दूर लोगों की संख्या करीब 120 करोड़ थी, वो 2019 में घटकर 75.9 करोड़ पर पहुंच गई थी। इसमें भारत के 2.9 करोड़ लोग भी शामिल हैं। हालांकि यह विकास काबिले तारीफ है पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 75.9 करोड़ लोगों का यह आंकड़ा भी कोई छोटा नहीं होता। गरीब और पिछड़े देशों से सम्बन्ध रखने वाले यह लोग आज भी अपनी बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऊपर से महामारी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2030 तक सभी को बिजली देने का लक्ष्य रखा था हालांकि वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं लग रहा। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईइए), अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी, यूएनडीईएसए, विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी इस रिपोर्ट में जानकारी दी है कि यदि वर्तमान और नियोजित नीतियों को ध्यान में रखकर देखें तो 2030 तक करीब 66 करोड़ लोग बिजली की पहुंच से दूर होंगें।

यदि सिर्फ भारत से जुड़े आंकड़ों को देखें तो देश की करीब 98 फीसदी आबादी तक बिजली की पहुंच है। हालांकि वर्षों की प्रगति के बावजूद अभी भी करीब 3 करोड़ लोगों तक बिजली नहीं पहुंची है, यह आंकड़ा उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ओशिनिया, दक्षिण अमेरिका और कैरेबियन के उन सभी लोगों की आबादी से ज्यादा है, जो बिजली से वंचित हैं। विश्व बैंक से जुड़े डेमेट्रियोस पापथानासिउ के अनुसार कोविड -19 के प्रभावों को कम करने और आर्थिक सुधार के लिए बिजली की पहुंच मायने रखती है। इससे असमानता बढ़ेगी। साथ ही विकासशील देशों में वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विद्युतीकरण बहुत महत्वपूर्ण है।

खाना पकाने के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है दुनिया की एक तिहाई आबादी

भले ही हम विकास की कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें कर ले पर दुनिया की अभी भी करीब एक तिहाई आबादी खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन से दूर है। 2019 में यह आंकड़ा करीब 260 करोड़ था। हालांकि इस मामले में भारत और एशिया के अन्य देशों में प्रगति हुई है, लेकिन अफ्रीका में हालात अभी भी पहले जैसी ही है। उप सहारा अफ्रीका में करीब 85 फीसदी आबादी जोकि करीब 90 करोड़ है, अभी भी खाना पकाने के लिए लकड़ी, कोयला और मिट्टी का तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों का ही उपयोग करती है।

यदि पहले के मुकाबले देखें तो इस क्षेत्र में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई है। जहां 2010 में 300 करोड़ लोग साफ-सुथरे ईंधन से दूर थे। यह आंकड़ा अभी भी घटकर 2019 में 260 करोड़ पर ही पहुंचा है जिसका मतलब है कि इन 10 वर्षों में केवल 40 करोड़ अतिरिक्त लोगों को ही खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन मिल पाया है। इसका सबसे ज्यादा असर समाज के सबसे कमजोर तबके पर पड़ रहा है। जीवाश्म ईंधन के कारण उत्पन्न होने वाला धुआं और जहरीले पदार्थ हर साल लाखों लोगों की जान ले रहे हैं, जिसके सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे बनते हैं।

ऐसे में स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए इसपर तुरंत ध्यान देने की जरुरत है। यह तभी संभव हो पाएगा जब हम रिन्यूएबल एनर्जी के विकास पर ध्यान दें। जहां 2010 में ऊर्जा की कुल खपत में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 16.4 फीसदी थी वो 2018 में बढ़कर 17.1 फीसदी हो गई है, जोकि काफी नहीं है। इसे बढ़ाने के लिए और प्रयास करने की जरुरत है जिससे सभी के लिए साफ सुथरी ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। यह न केवल स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से फायदेमंद होगी साथ ही इससे जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने और पर्यावरण को बचाने में भी मदद मिलेगी।