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पर्यावरण और उत्तराखंड के लोगों के लिए खतरा हैं भागीरथी नदी पर बन रहे बांध

जिस तरह से भागीरथी घाटी में बांध और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जा रहा है वो इस इलाके के लोगों और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है

By Lalit Maurya

On: Sunday 17 May 2020
 
टिहरी डैम और पुनर्वास की समस्या। साभार: शारदा प्रसाद
टिहरी डैम और पुनर्वास की समस्या। साभार: शारदा प्रसाद टिहरी डैम और पुनर्वास की समस्या। साभार: शारदा प्रसाद

हिमालय क्षेत्र जितना सुन्दर है, उतना ही उसका पारिस्थितिक तंत्र संवेदनशील भी है। जिसमें थोड़ा सा भी बदलाव इस क्षेत्र के संतुलन को बिगाड़ने के लिए काफी है। लम्बे समय से यह क्षेत्र मिट्टी के कटाव, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड जैसे खतरों से प्रभावित रहा है। ऐसी ही एक त्रासदी 2013 में आयी थी जब बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था। जिसका व्यापक असर यहां की जलविद्युत परियोजनाओं पर भी पड़ा था| जिसने एक बार फिर यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि क्या इस क्षेत्र में इन बड़े बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण नए खतरों को तो जन्म नहीं दे रहा। क्या प्रकृति से इस तरह की छेड़-छाड़ सही है?

1970 के दशक तक इस क्षेत्र में कुछ गिने चुने बांधों का ही निर्माण किया गया था। यही वजह थी कि यहां आने वाली ज्यादातर आकस्मिक बाढ़ की घटनाएं प्राकृतिक थी। पर यदि देश के नेशनल रजिस्टर ऑफ लार्ज डैमस (2019) पर गौर करें तो 70 के दशक तक तक उत्तराखंड में केवल 5 बड़े बांध थे, जबकि तब से लेकर अब तक 12 बांध और बन चुके हैं और 8 बांध अभी भी निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं।

भागीरथी नदी घाटी में बांध और बैराज किस तरह वहां के पर्यावरण पर असर डाल रहे हैं, इसको समझने के लिए हाल ही में एक अध्ययन किया गया है, जोकि जर्नल जियोमैटिक, नेचुरल हैज़ार्डस एंड रिस्क में प्रकाशित हुआ है। यह अध्ययन शोधकर्ता एस पी सती, शुभ्रा शर्मा, वाई पी सुंदरियाल, दीपा रावत और मनोज रियाल के द्वारा उत्तराखंड स्थित भागीरथी नदी घाटी में किया गया है। इस नदी घाटी में कई बांधों और बैराजों को बनाया गया है, जिसने नदी के प्राकृतिक बहाव को रोक दिया है। इससे न केवल नदी के प्राकृतिक स्वरुप बल्कि उसके इकोसिस्टम पर भी गहरा असर पड़ा है|

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है आपदाओं का खतरा

शोध बताता है कि 1970 में आयी अलकनंदा बाढ़ वो पहला उदाहरण थी जिसके लिए बड़े पैमाने पर जंगलों के कटाव को जिम्मेदार माना गया था। यह बाढ़ अपने साथ ने केवल पानी को बहा कर लाती हैं इनके साथ हज़ारों टन बहकर आया मलबा पूरे क्षेत्र पर एक व्यापक असर डालता है| यही वजह है कि इस क्षेत्र में इस तरह की बड़ी परियोजनाओं के निर्माण से पहले इनका भी अध्ययन जरुरी हो जाता है| हालांकि 1980 के बाद से उत्तराखंड में वनों की वाणिज्यिक रूप से वनों की कटाई बंद कर दी गई है| पर जिस तरह से इन जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जा रहा है उसने इस संवेदनशील क्षेत्र के ढ़लानी क्षेत्रों को अस्थिर बना दिया है| साथ ही नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को भी बाधित कर दिया है| ऊपर से जलवायु में आ रहा परिवर्तन इस क्षेत्र पर व्यापक असर डाल रहा है| जिससे बाढ़ जैसी घटनाएं बढ गई हैं| इसका असर ग्लेशियरों और नदियों के प्रवाह पर भी पड़ रहा है| ऐसे में इन परियोजनाओं के निर्माण से पहले इसपर भी ध्यान देना जरुरी है| क्योंकि भविष्य में इसका व्यापक असर इन परियोजनाओं पर भी पड़ेगा|

अधिक व्यापक और वैज्ञानिक आधार पर किया जाना चाहिए ईआईए

इसलिए इन परियजनाओं से पहले इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययनों को भी शामिल किया जाना जरुरी है| पर अफसोस की बात है, अभी भी इन परियोजनाओं के लिए किये जाने वाले पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) में इन सभी बातों पर गौर नहीं किया जाता है| साथ ही इन परियोजनाओं के बनने से जिन क्षेत्रों पर इनका असर पड़ेगा उनपर भी पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया जाता है| इसलिए यह जरुरी हो जाता है कि वहां रहने वाले लोगों और जिस क्षेत्र पर असर पड़ना है, उसका भी ईआईए में विस्तार से अध्ययन किया जाना जरुरी है और उनको जो नुकसान होगा उसकी भरपाई पर भी गौर करना जरुरी है|

शोध के अनुसार जिस तरह से जलविद्युत के लिए इन बांधों का निर्माण किया गया है और पेड़ों को काटा गया है| उसके परिणामस्वरूप ढलवा इलाकों में चट्टानें कमजोर हो रही हैं, और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है| जिसका असर ने केवल प्राकृतिक वातावरण पर बल्कि वहां रहने वाले लोगों पर भी पड़ा है| यहां ग्रामीण क्षेत्रों में हुए निर्माण इसके कारण जर्जर हो रहें हैं| वहीँ खेतों पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है|

क्या है समाधान

अध्ययन के अनुसार जिस तरह से पूरी तरह यह जाने बिना कि पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है, इन बांधों का निर्माण किया गया है वो खतरनाक हो सकता है| जलविद्युत परियोजनाओं को बनाने से पहले यहां की भूआकृति और मौजूद चट्टानों एवं पहाड़ों का विस्तृत अध्ययन किया जाना जरुरी था| इसके साथ ही यहां के इकोसिस्टम पर इसका क्या असर पड़ेगा इसे भी जान लेना जरुरी है|

इसके साथ ही जो अध्ययन किये गए हैं, न तो उनमें इन सब बातों को पूरी तरह समझा गया है| न ही उनका पूरी तरह से वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है| जिसकी कमी इनकी इंजीनियरिंग में साफ झलकती है| इसमें न तो कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) के विकास पर ध्यान दिया गया है| और न ही जलाशयों के किनारों और ढलानों की स्थिरता को बनाये रखने के लिए कोई काम किया गया है|

यही वजह है कि बिना इन सबको जाने जिस तरह से यहां इन परियोजनों का निर्माण किया गया है, उसने इस पहाड़ी इलाके को अस्थिर बना दिया है| ऐसे में क्या भागीरथी घाटी में इन बड़े बांधों का निर्माण सही है| इस घाटी पहले से ही टिहरी, कोटेश्वर, मनेरी भाली चरण I/ II जैसे बांधों का वहां के पर्यावरण और लोगों पर प्रतिकूल असर पड़ा है| ऐसे में इस क्षेत्र में चल रही इन बड़ी परियोजनों का व्यापक अध्ययन किया जाना जरुरी है|

साथ ही लोगों की सुरक्षा और नुकसान को भी ध्यान में रखना होगा| इसके लिए जलविद्युत प्राधिकरण बनाये जाएं| साथ ही वहां के पारमपरिक जल स्रोतों को भी बचाया जाए, जिससे लोगों के लिए जल की उपलब्धता प्रभावित न हो| इन परियोजनाओं ने जिन लोगों पर असर डाला है, चाहे वो सीधे तौर पर हो या इन क्षेत्रों की अस्थिरता के कारण उनपर प्रभाव पड़ रहा हो| उन्हें भी पुनर्वास योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए|  साथ ही जिन इलाकों के डूबने और प्रभावित होने का खतरा है उसके अलग-अलग पहलुओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करना जरुरी है| जिससे इसके खतरे को कम किया जा सके|