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कोरोनावायरस से अक्षय ऊर्जा की तेजी थमेगी, लेकिन रुकेगी नहीं

कोरोनावायरस से आर्थिक गतिविधियां कम हो जाएगी, इसका असर अक्षय ऊर्जा के उत्पादन पर भी पड़ेगा

On: Thursday 02 April 2020
 

पीटर फॉक्स पीनर

हाल ही में तेजी से विकसित होने की उम्मीद कर रहे अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के उद्योगों को कोरोनावायरस संक्रमित बीमारी कोविड-19 महामारी से बड़ा झटका लगा है, क्योंकि इस बीमारी की वजह से आर्थिक संकट बढ़ा है। साथ ही, तेल की कीमतों में भी बड़ी गिरावट आई है। यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

यह आर्थिक संकट कितना बड़ा होगा और इसका पर्यावरण के साथ-साथ नीतियों पर क्या असर पड़ेगा, यह आकलन करना बहुत जल्दबाजी होगी। लेकिन मुझ जैसे व्यक्ति, जिसने वाल स्ट्रीट में ऊर्जा नीति के लिए काम किया हो और शिक्षा, उद्योग व सरकार से जुड़ा हुआ हो को लगता है कि अगले कुछ वर्षों के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा या उससे बेहतर होगा।

इन दिनों आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से बिजली की मांग कम हुई है, क्योंकि हर तरह की आर्थिक गतिविधियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर बिजली की जरूरत होती है। 2008-09 की आर्थिक मंदी के बाद भी अमेरिका में अगले दस साल तक बिजली की मांग में गिरावट दर्ज की गई थी।

इतना ही नहीं, बिजली की बिक्री में 2008 से लेकर 2018 तक कोई खास वृद्धि नहीं देखी गई। 27 मार्च 2020 को अमेरिका में बिजली की खपत 27 मार्च 2019 के मुकाबले तीन फीसरी कम रही। ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है।

आर्थिक संकट के बावजूद बिजली का उत्पादन कुछ जगह निरंतर होता है, जैसे कि घरों या अस्पतालों में, जिससे उसका उत्पादन तो नहीं घटना, लेकिन उत्पादन कम होने के कारण इसमें प्रतिशत के आधार पर खासी गिरावट होती है।

इससे बिजली उद्योग का राजस्व भी कम होता है, क्योंकि बिजली से चलने वाले उद्योगों में उत्पादन कम हो जाता है और वे बिजली की खपत कम कर देती हैं, बल्कि बिल का भुगतान भी नहीं करती।

आर्थिक हालातों की वजह से बिजली की मांग में कमी दुनिया भर में होगी, जिससे नए अक्षय ऊर्जा संस्थानों को नुकसान हो सकता है। बिजली का इस्तेमाल करने वाले संस्थान अपना बजट कम कर देंगे और अपने नए प्लांट नहीं लगा पाएंगे।

सोलर सेल, विंड टरबाइन और अन्य हरित ऊर्जा तकनीक बनाने वाली कंपनियों को अपने ग्रोथ प्लान बदलने होंगे। उदाहरण के लिए, मॉर्गन स्टेनली ने 2020 की दूसरी तिमाही में 48 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 28 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 17 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है। 

लेकिन कुछ दूसरे कारक हैं, जिनकी वजह से यह गिरावट कम हो जाएगी। ऐसा कम से कम अमीर देशों में तो होगा ही। अक्षय ऊर्जा के कई ऐसे प्लांट भी लगाए जा रहे हैं, जो केवल बढ़ती मांग की वजह से नहीं लग रहे हैं। क्योंकि राज्यों ने स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य निर्धारित किया है और इसके लिए कायदे-कानूनों में बदलाव भी किया है। यही वजह है कि कई प्लांटों का निर्माण पहले ही चालू हो चुका है। 

सरकारी नीतियों और जनता का दबाव है कि कोयले से चलने वाले पावर प्लांट बंद किए जाएं। 2010 में 1,02,000 मेगावाट क्षमता के कोयले से चलने वाले प्लांटों को बंद कर दिया गया था, जो अमेरिका की तब की कुल उत्पादन क्षमता का एक तिहाई था। 

और 2025 में 17,000 मेगावाट क्षमता के कोयले से चलने वाले प्लांट बंद हो जाएंगे। इनकी जगह हवा, सौर और पन बिजली संयंत्र ले लेंगे।

अमेरिका में बिजली उत्पादन न्यूनतम कार्बन ईंधन की ओर बढ़ रहा है, इसलिए कोयले को हटा कर प्राकृतिक गैस और अक्षय ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।

स्वच्छ ईंधन जरूरी

वतर्मान संकट के बावजूद इनवायरमेंटल इम्पैट असेसमेंट (ईआईए) का दबाव है कि कार्बन मुक्त ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाया जाए। लगभग 50 अमेरिकी कंपनियों ने पहले ही यह वादा किया है कि वे कार्बन उत्सर्जन कम करेंगी, इनमें से 21 कंपनियों ने 2050 तक कार्बन मुक्त होने की शपथ ली है।

पिछले साल कई अमेरिकी कंपनियों ने स्वैच्छिक तौर पर हरित ऊर्जा की खरीद बढ़ाई है, जो लगभग 9300 मेगावाट है और यह अमेरिका की कुल बिजली क्षमता का एक फीसदी है। 

वहीं कई घरेलू उपभोक्ताओं ने भी अलग-अलग विकल्पों से अक्षय ऊर्जा की खरीददारी बढ़ाई है। इनमें से एक विकल्प सामुदायिक सौर ऊर्जा कार्यक्रम है।

गंदा ईंधन कब तक?

2019 की शुरुआत में ही कच्चे तेल की कीमतें लगभग 64% घट गई । तेल बाजार गुरु डैनियल येरगिन बताते हैं कि यह गिरावट और लंबे समय तक रहने वाली है।

तेल कीमतों में गिरावट से अमेरिका की प्राकृतिक गैस की कीमतें भी कम हो जाएगी। आर्थिक गतिविधियां घटने से बिजली और तेल की तरह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल भी कम हो जाता है।

आम तौर पर, सस्ती प्राकृतिक गैस, जिसका इस्तेमाल बिजली बनाने में होता है से बिजली की खपत बढ़ती है और इससे आर्थिक प्रगति होती है, लेकिन इस असामान्य दौर में तेल और गैस की कम कीमतों का अक्षय ऊर्जा पर कुछ खास असर नहीं दिख रहा है। कुछ जगहों पर अक्षय ऊर्जा के नए प्लांट लग रहे हैं और इनसे तेल व गैस के मुकाबले सस्ती बिजली मिलने की उम्मीद है। उदाहरण के लिए डीजल से बनने वाली बिजली के मुकाबले सौर ऊर्जा से बिजली की कमी दूर किया जा रहा है और यह सस्ती भी पड़ रही है।

खासकर विकासशील देशों में ऐसा देखने को मिल रहा है, जहां सस्ती बिजली की मांग ज्यादा है। ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी की कमी रहती है और उन्हें बिजली पर काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। यदि ये देश पैसा बचाने के लिए अक्षय ऊर्जा की बजाय जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल करते हैं तो वह न केवल जलवायु नीति के लिए खराब होगा, बल्कि इससे वायु प्रदूषण भी बढ़ेगा।

यही वजह है कि केंद्रीय बैंक अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य हासिल करने के लिए कम या बिना ब्याज दर पर लोन भी मुहैया करा रहे है, जिनकी पूंजीगत लागत तो अधिक है, लेकिन स्थापित करना सस्ता है। इस मकसद देशों को जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से रोकना है।

पार्ट्स की कमी

वर्तमान कोरोना महामारी के दौर में अक्षय ऊर्जा संयंत्रों की सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। इस उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि कोरोना वायरस की वजह से उनके श्रमिक बीमार हो सकते हैं या लॉकडाउन की वजह से उनको उद्योग बंद करना पड़ेगा।

इसके अलावा सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अक्षय ऊर्जा संयंत्रों के ज्यादातर पार्ट्स चीन से आते हैं। खासकर एशिया के देश तो चीन पर ही निर्भर हैं। जहां फिलहाल कोरोनावायरस की वजह से सामान नहीं आ रहा है। इस वजह से भारत और आस्ट्रेलिया में कई सोलर प्रोजेक्ट्स में देरी होने की संभावना है। 

ऐसे में, मुझे लगता है कि कोरोनावायरस की वजह से जो सबसे बड़े नुकसान होंगे, उनमें अक्षय ऊर्जा की वृदि्ध प्रभावित होना भी शामिल है। खासकर विकासशील बाजार में, जहां कई दशक से जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है और वहां कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन एक बड़ी चिंता बन गया है।

लेकिन इसका सब जगह नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि यह संकट दीर्घकालिक कार्बन मुक्त ऊर्जा का लक्ष्य हासिल करने में बदलाव ला सकता है। एक बार वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से वापस आ गई तो यह दौर दुनिया के बड़े नेताओं को बताया कि उन्हें जलवायु नीतियों को लागू करने में तेजी लानी होगी, क्योंकि अभी भी मौसम संबंधी आपादाएं किसी भी वायरस से कम नहीं हैं, जो एक और वैश्विक आर्थिक संकट को खड़ा कर सकती हैं।

लेखक बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं और इंस्टि्यूट ऑफ सस्टेनएबल एनर्जी के निदेशक हैं। यह लेख द कंवर्सेशन से लिया है। मुख्य लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें