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सौर ऊर्जा: लक्ष्य की ओर बढ़ने की बजाय पीछे चल रहा है भारत

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की नई फैक्टशीट में सौर ऊर्जा की जमीनी हकीकत प्रस्तुत की गई है

By Lalit Maurya

On: Thursday 16 July 2020
 
Solar power
उत्तराखंड के रुड़की जिले में एक किसान द्वारा लगाया गया सोलर पावर प्लांट। फोटो: विकास चौधरी उत्तराखंड के रुड़की जिले में एक किसान द्वारा लगाया गया सोलर पावर प्लांट। फोटो: विकास चौधरी

सरकार का दावा है कि वो 2022 तक सोलर प्लांट से 100,000 मेगावाट बिजली पैदा करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगी। पर इस लक्ष्य का पूरा होना कितना मुश्किल है और इसके सामने क्या समस्याएं हैं। आइए इसकी जमीनी हकीकत को समझते हैं  

भारत ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा की मदद से 175,000 मेगावाट बिजली के उत्पादन का लक्ष्य रखा था। जिसमें से 100,000 मेगावाट सौर ऊर्जा के जरिये हासिल की जाएगी। इसमें से 60,000 मेगावाट यूटिलिटी स्केल सोलर प्लांट और 40,000 मेगावाट रूफटॉप सोलर के जरिए प्राप्त की जाएगी। वहीं यदि लोक सभा की ऊर्जा पर बनाई गई स्थाई समिति द्वारा दिए आंकड़ों पर गौर करें तो उसके अनुसार मार्च 2020 तक देश में करीब ग्रिड से जुड़े 32,000 मेगावाट के सोलर प्लांट बनाए जा चुके हैं। जबकि जनवरी 2020 तक 87,380 मेगावाट के प्लांट विकास के विभिन्न चरणों में हैं। जिनके पूरा होने में वक्त है। 

वहीं अगले 2 वर्षों में मंत्रालय 15,000 मेगावाट के लिए टेंडर जारी करने की योजना बना रहा है। हालांकि यह योजना पूरी होती हुई नहीं दिख रही है क्योंकि अगर पिछले 2 सालों में जारी किये गए टेंडरों पर नजर डालें तो उसमें से ज्यादातर नए टेंडर सफल नहीं हो सके हैं। और वो लगातार पिछड़ रहे हैं। ऊपर से कोविड -19 महामारी ने उसकी रफ्तार को और सुस्त बना दिया है। यह जानकारी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा जारी फैक्टशीट में सामने आई है  

2018-19 से लगातार घट रही है विकास की रफ्तार

यदि पिछले पांच वर्षों अप्रैल 2014 से मार्च 2019 के बीच की प्रगति को देखने तो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनिय वृद्धि हुई है। जहां यह 2,600 मेगावाट से 28,000 मेगावाट पर पहुंच गया था। लेकिन पिछले दो वर्षों (2018-19 और 2019-20) से इसके विकास की गति में लगातार कमी आ रही है। जहां 2017-18 में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 9400 मेगावाट क्षमता की वृद्धि की गई थी। वो 2018-19 में घटकर 6500 मेगावाट और 2019-20 में 5700 मेगावाट रह गई थी।  

वहीं 2019-20 के लिए एमएनआरई ने जो लक्ष्य निर्धारित किया था उसका सिर्फ केवल तीन-चौथाई ही हासिल हो सका है। हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में यह लक्ष्य 23 फीसदी कम रखा गया था। इसके बावजूद वो हासिल नहीं हो सका है। जबकि जनवरी से मार्च 2020 के आंकड़ों को देखें तो क्षमता में केवल 730 मेगावाट की ही वृद्धि हुई है।

ऐसे में विकास की इस सुस्त रफ़्तार को देखकर यह कह पाना मुश्किल है, कि क्या सच में 2022 तक 60,000 मेगावाट का लक्ष्य भारत हासिल कर पाएगा। ऊपर से महामारी ने इस काम की रफ्तार को और कम कर दिया है। अनुमान है कि 2020 में केवल 5000 मेगावाट क्षमता का विकास किया जा सकेगा। जिसमें रूफटॉप सोलर भी शामिल है।

क्या है इस घटती रफ्तार की वजह

सीएसई द्वारा जारी फैक्टशीट में इसके लिए निम्न वजहों को जिम्मेवार माना है। पहला सोलर ऊर्जा की ज्यादा कीमत बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय समस्याओं को और बढ़ा रही हैं। वितरण कंपनियां (डिस्कॉम), सौर ऊर्जा जनरेटर के लिए अपनी बकाया राशि का भी भुगतान करने में असमर्थ रही हैं। ऐसे में निवेश सम्बन्धी जोखिम बढ़ गया है। सीईए के अनुसार, नवंबर 2019 के अंत तक 342 आरई परियोजनाओं की बकाया राशि करीब 9,400 करोड़ रुपये थी। जिससे 14,560 मेगावाट क्षमता की बिजली परियोजनाओं पर असर पड़ा है। 

यहां तक की सरकार द्वारा डिस्कॉम को दी सहायता के बावजूद भी ऐसे जोखिम के बने रहने की उम्मीद है। दूसरी मुख्य वजह टेंडरों का लगातार विफल होना है। नई परियोजनाओं के लिए किये जा रहे टेंडर लगातार विफल हो रहे हैं क्योंकि वो बिजली उत्पादन की लागत भी नहीं निकल पा रहे हैं।  

राज्य सरकारों द्वारा 2.5 रुपये से 2.6 रुपये प्रति यूनिट की दर से शुल्क तय किया गया है। मई 2017 में भादला सोलर पार्क की नीलामी के लिए 2.44 रुपये प्रति यूनिट टैरिफ तय किया गया था। लेकिन यह शुल्क व्यवहार्य नहीं था। यही वजह थी कि 2018-19 में 8000 मेगावाट क्षमता के टेंडर रद्द कर दिए गए थे। जोकि उस वर्ष जोड़ी गई क्षमता से भी ज्यादा थे। यही वजह थी कि 2019-20 में एसइसीइ द्वारा की गई नीलामियों में प्रति यूनिट 2.55 से 2.71 रुपये का आकर्षक टैरिफ रखा गया था। जबकि उत्तर प्रदेश में प्रति यूनिट 3.02 से 3.38 रुपये शुल्क रखा गया था।

सुरक्षा शुल्क के कारण शुरूवाती लागत में हो रही वृद्धि भी इसकी कमी की एक वजह है। घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने जुलाई 2018 में मॉड्यूल पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाया था। जिसको अगले छह महीने के लिए 20 फीसदी और बाद के छह महीने के लिए 15 फीसदी की दर तय की गई थी। लेकिन भारत की उत्पादन क्षमता सीमित है। अभी भारत में मौजूदा 10,000 मेगावाट मॉड्यूल और 3,000 मेगावाट सेल निर्माण की क्षमता है, जो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऊपर से जीएसटी प्रोजेक्ट की लागत को और बढ़ा रहा है। 

ऐसे में देश में सौर ऊर्जा का भविष्य क्या होगा और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है यह विचार करने का विषय है। जिससे नीतियों में बदलाव करके लक्ष्यों को हासिल किया जा सके।