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अब सौर यात्रा से कम होगा पृथ्वी का तापमान!

मुंबई आईआईटी में पढ़ाने वाले प्रोफेसर चेतन सोलंकी अब सौर गांधी के नाम से जाने जाते हैं और वे एक दशक लंबी सौर ऊर्जा यात्रा पर निकल पड़े हैं

By Anil Ashwani Sharma

On: Thursday 01 April 2021
 
गुजरात के अहमदाबाद स्थित साबरमति आश्रम में प्रोफेसर चेतन सोलंकी आश्रमवासियों के साथ। फोटो: एनर्जी स्वराज फाउंडेशन
गुजरात के अहमदाबाद स्थित साबरमति आश्रम में प्रोफेसर चेतन सोलंकी आश्रमवासियों के साथ। फोटो: एनर्जी स्वराज फाउंडेशन गुजरात के अहमदाबाद स्थित साबरमति आश्रम में प्रोफेसर चेतन सोलंकी आश्रमवासियों के साथ। फोटो: एनर्जी स्वराज फाउंडेशन

यात्राओं के माध्यम से आम जनमानस को आंदोलित करने का कारगर तरीका गांधी जी ने आज से लगभग एक सदी (90 साल) पहले ही खोज लिया था। तब गांधी जी अंग्रेजों के कानून तोड़ने के डर को खत्म करने के लिए साबरमति आश्रम से डांडी तक की 390 किलोमीटर यात्रा पैदल तय की थी। अब लगभग एक सदी बाद जब जलवायु परिर्तन के कारण भारत ही नहीं, पूरी पृथ्वी का ही अस्तित्व खतरे में पड़ गया है तब एक बार फिर एक और गांधी की जरूरत महसूस की गई।

यह हैं सौर गांधी के नाम से जाने जाने वाले भारतीय औद्योगिक संस्थान (आईआईटी) मुंबई के प्रोफेसर चेतन सोलंकी। उन्होंने पूरे के पूरे 11 साल की सौर यात्रा का प्रण लिया है और अब तक पांच हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा पूरी भी कर चुके हैं। इतना बड़ा प्रण आखिर उन्होंने क्यों लिया? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर सोलंकी कहते हैं, अब वक्त आ गया है कि केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व के हर एक इंसान को पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कम करने के लिए खड़ा होना होगा और इसमें हर व्यक्ति के योगदान की जरूरत है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने इतनी लंबी यात्रा का प्रण किया। वह कहते हैं कि एक और महत्वपूर्ण कारण है इतनी लंबी यात्रा का कि हम इतने बिगड़ चुके हैं कि हमें बार-बार लोगों को समझाना होगा और इसकी उपयोगिता के बारे में बताना होगा, तभी लोग इसकी महत्ता को समझेंगे।

वह कहते हैं कि एक तरफ हम आधुनिक होते जा रहे हैं और जब मैं लोगों से पूछता हूं कि इतनी कमाई क्यों करनी है, जीडीपी क्यों बढ़ानी है, तो वे कहते हैं कि इससे समृद्धि, खुशहाली आती है। मैं पूछता हूं कि जीडीपी तो 5, 6, 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, लेकिन चेहरे की हंसी 5, 6, 7 प्रतिशत की रफ्तार से तो नहीं बढ़ रही है। जलवायु का, पर्यावरण का क्षरण हो रहा है। प्रकृति का क्षरण हो रहा है। ये जो कथित आधुनिकता है, जिससे और आधुनिक हो रहे हैं, आरामदेह होने की बात कर रहे हैं। लेकिन यह हमारा नुकसान बहुत कर रहा है।

सोलंकी कहते हैं कि पिछले दिनों जब मैं विश्व यात्रा पर था, तो देखा कि विश्वभर में सरकारों द्वारा जो प्रयास किए जा रहे हैं, वो पर्याप्त नहीं है। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को ये समझना होगा कि हम सब ऊर्जा का उपयोग करते हैं, इससे जलवायु खराब हो रही है और हम सबको इसे ठीक करने के लिए प्रयास करना होगा। हम सबको एक साथ मिलकर जन आंदोलन तैयार करना होगा। जब तक ये जन आंदोलन नहीं बनेगा, तब तक इसका कोई समाधान नहीं हो सकता है।

सोलंकी कहते हैं कि हमारा आइडिया है कि आज गांधीजी होते तो क्या करते। हमें लगता है कि ऐसी ही कोई यात्रा निकालते। गांधी जी की यात्रा पदयात्रा थी, लेकिन अब आधुनिक जमाना है, तो मैंने बस यात्रा निकाली, क्योंकि बहुत बड़े लेवल पर इसे करना है। हमारी परिकल्पना है कि कैसे हम जन-जन तक पहुंचें और लोगों में जागरूकता लायें ताकि हर कोई अपनी तरफ से कार्रवाई कर जलवायु को बचा सके।

यह यात्रा गत नवंबर, 2020 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से शुरू हुई थी और अब तक तीन राज्यों में लगभग 5,000 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं और इस दौरान लगभग 15 हजार लोगों से सोलंकी मिल चुके हैं। इस संबंध में जब उनसे डाउन टू अर्थ ने पूछा तो उन्होंने बताया कि चार महीनों का अनुभव काफी सकारात्मक रहा। मैंने मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्से औऱ दिल्ली की यात्रा की है। बहुत खुशी होती है जब इतनी अच्छी प्रतिक्रिया आती है और इसी की जरूरत भी है। वह कहते हैं कि इस यात्रा में दो चीजें हो रही हैं, पहली तो मैं लोगों के सामने यह बात रखता हूं कि जलवायु परिवर्तन बहुत गंभीर मसला है और दूसरी बात ये कहता हूं कि हमें ऊर्जा स्वराज की जरूरत है।

ऊर्जा स्वराज का सबसे अच्छा तरीका है कि हर व्यक्ति अपने घर के स्तर पर, अपने संस्थान के स्तर पर बिजली कनेक्शन से मुक्त हो जाए। बिजली कनेक्शन को सरेंडर करे। ये सबसे अच्छे स्वराज की शुरुआत होगी। हालांकि, बहुत बड़े काम हैं, जो बिजली पर निर्भर हैं। मसलन की बड़ी-बड़ी फैक्टरियां बिजली के बिना कैसे चलेंगी। ये एक मुद्दा है, लेकिन जो हमारे वश में है, वो हम कर सकते हैं। जैसे कि हम अपने घर की ऊर्जा जरूरतें सौर ऊर्जा से पूरी कर सकते हैं। हम सौर ऊर्जा से अपने संस्थान चला सकते हैं। ये हमारे वश में है। ये सब विचार मैं लोगों को सामने रखता हूं। लोग हमारी बातें सुनते हैं और चीजों को समझते हैं। साल 2030 तक मेरी ये यात्रा खत्म होगी, तब तक जरूर यह यात्रा एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी होगी।