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भारत के 91 फीसदी कोयला संयंत्रों के संचालन से सस्ती है सौर और पवन ऊर्जा

यदि इस कोयला आधारित क्षमता को सौर और पवन ऊर्जा से बदल दिया जाए तो उससे देश को हर साल करीब 47,468 करोड़ रुपए की बचत होगी

By Lalit Maurya

On: Thursday 24 June 2021
 

भारत की मौजूदा 91 फीसदी कोयला आधारित बिजली क्षमता को चलाने की लागत नई सौर और पवन ऊर्जा की लागत से महंगी है, जिसकी कुल उत्पादन क्षमता करीब 193 गीगावाट है। ऐसे में यदि इस कोयला आधारित क्षमता को सौर और पवन ऊर्जा से बदल दिया जाए तो उससे देश को हर साल करीब 47,468 करोड़ रुपए की बचत होगी।

यही नहीं इससे 676 टेरावाट घंटे कोयला उत्पादन में भी कमी आएगी। यह देश में बढ़ते वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चल रही जंग में भी मददगार होगा क्योंकि इससे हर वर्ष उत्सर्जित हो रही कार्बन डाइऑक्साइड में 64.3 करोड़ टन की गिरावट आएगी। इससे लोगों का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा। यह जानकारी इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी द्वारा जारी रिपोर्ट रिन्यूएबल पावर जेनेरेशन कॉस्टस इन 2020 में सामने आई है।

गौरतलब है कि 2021 में नीलामी और बिजली समझौतों के अनुसार देश में सौर ऊर्जा की प्रति किलोवाट-घंटा की औसत कीमत 2.45 रुपए और पवन ऊर्जा की कीमत 2.37 रुपए प्रति किलोवाट-घंटा थी। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह सोलर और विंड क्षेत्र में तकनीकों और स्थापना में आने वाले खर्च में कमी आई है उसका असर इसकी कीमतों पर भी पड़ा है। 

यदि देखा जाए तो वैश्विक स्तर पर 2010 में पवन ऊर्जा को स्थापित करने की लागत प्रति किलोवाट क्षमता के लिए 1,971 डॉलर थी जो 2020 में घटकर 1,355 डॉलर पर पहुंच गई है। वहीं भारत में यह 1,038 डॉलर प्रति किलोवाट है। वहीं इसी अवधि में वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा प्लांट स्थापित करने की कीमत में करीब 81 फीसदी की गिरावट आई है जो 2010 में 4,731 डॉलर प्रति किलोवाट से घटकर 2020 में 883 डॉलर प्रति किलोवाट रह गई है।

2020 के दौरान भारत में यह कीमत 596 डॉलर प्रति किलोवाट थी जोकि चीन से करीब 8 फीसदी कम है। जिसका मतलब है कि 2010 से 2020 के बीच भारत में यूटिलिटी स्केल सोलर पॉवर को स्थापित करने की लागत में करीब 88 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यही वजह है कि लगातार अक्षय ऊर्जा की कीमतें जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा से कम होती जा रही है।

ऐसा नहीं है कि भारत में सोलर और विंड एनर्जी की कीमतों में आने वाली कमी का फायदा केवल सीधे तौर पर ही यहां रहने वाले लोगों को मिलेगा। इसके साथ ही जैसे-जैसे ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती जाएगी, उससे वायु गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।

अनुमान है कि हर साल देश में होने वाली करीब 9.8 लाख मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेवार है। जिसकी कीमत आंकी जाए तो वो करीब 213,605 करोड़ रुपए बैठती है। प्रदूषण में आने वाली यह कमी इस कीमत को लगभग आधा कर देगी।

यदि भारत के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों को देखें तो देश में 29 फरवरी 2020 तक कुल बिजली उत्पादन क्षमता करीब 368.98 गीगावाट थी, जिसका करीब 23.39 फीसदी हिस्सा अक्षय ऊर्जा से प्राप्त होता है। आज दुनिया में अक्षय ऊर्जा के मामले में भारत पांचवें स्थान पर है। हालांकि इसके बावजूद अभी भी हम अपनी ऊर्जा सम्बन्धी जरूरतों के लिए काफी हद तक कोयले और जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत की मंशा 2022 तक अपनी अक्षय ऊर्जा क्षमता को बढाकर 175 गीगावाट करने की है, हालांकि यह लक्ष्य अभी भी काफी दूर है।