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लॉकडाउन में मध्यप्रदेश सरकार ने महंगी बिजली खरीद का किया समझौता

मध्यप्रदेश के पास अगले 10 साल के लिए बिजली सरप्लस है, बावजूद इसके अडानी पावर के साथ बिजली खरीद का समझौता किया गया, जबकि यह बिजली चार गुणा महंगी है

By Anil Ashwani Sharma

On: Tuesday 16 June 2020
 
चित्र को प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया है। फोटो साभार: फ्लिकर
चित्र को प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया है। फोटो साभार: फ्लिकर चित्र को प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल किया गया है। फोटो साभार: फ्लिकर

लॉकडाउन में बंद पड़ी सभी प्रकार की गतिविधियों का लाभ अकेले केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारें भी उठाने में पीछे नहीं हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने लॉकडाउन के दौरान ही कई निजी कंपनियों से ऐसे करार किए हैं। इनमें से एक अडानी की छिदवाड़ा पेंच थर्मल पावर परियोजना को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इस थर्मल प्लांट के साथ बिजली खरीद का करार किया है। 

यह परियोजना 1,320 मेगावाट क्षमता की कोयले पर आधारित है। जहां पूरी दुनिया इस समय कोयले से जुड़े सभी उद्योगों से दूर जा रही है, वहीं मध्यप्रदेश सरकार का यह फैसला भारत सरकार द्वारा किए गए पेरिस समझौते के खिलाफ भी जाता है। भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यन्वयन मंत्रालय की 2019 की रिर्पोट के अनुसार मध्यप्रदेश मे 20,331 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता पहले से ही स्थापित है और उसकी मांग वर्तमान में 9,000 मेगावाट है। इस आधार पर प्रदेश में सरप्लस बिजली उपलब्ध है। फिर ऐसे में सवाल उठता है मध्यप्रदेश सरकार को क्यों अडानी से 1,320 मेगावाट बिजली खरीद का करार करना पड़ा। 

इस संबंध में पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियन्ता मध्यप्रदेश पावर जनेरेटिंग कम्पनी लिमिटेड के राजेन्द्र अग्रवाल का कहना है कि राज्य के पास अगले 10 वर्षों के लिए सरप्लस बिजली मौजूद है, लेकिन अडानी पावर की पेंच थर्मल एनर्जी लिमिटेड के साथ बिजली खरीद का समझौता शासकीय बिजली परियोजना से भी अधिक महंगा है। शासन की प्रति यूनिट दर 1.194 रुपए प्रति यूनिट है, जबकि अडानी परियोजना की प्रति यूनिट दर 4 गुना लगभग 4.79 प्रति यूनिट पड़ रही है, जो कि अब तक की सबसे ऊंची दर पर करार किया गया है। यह बिना पारदर्शिता के किया जा रहा है। वह कहते हैं कि यह करार आगामी 25 वर्ष की अवधि में 1 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक का नुकसान राज्य वितरण कपंनी को दे सकता है। यह भारत की टैरिफ नीति का पूर्ण उल्लंघन है। वह बताते हैं कि पूरे लॉकडाउन में राज्य सरकार ने अकेले इसी प्रोजेक्ट को फाइनल किया।

वहीं इस मामले में अखिल भारतीय पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के प्रवक्ता वीके गुप्ता ने डाउन टू अर्थ को बताया कि मध्य प्रदेश में औसत बिजली की मांग 9,000 मेगावाट और अधिकतम मांग 14,500 मेगावाट है, जबकि राज्य ने पहले ही 21,000 मेगावाट के बिजली खरीद करार पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। इस सकंट में बिजली लिए बिना वितरण कम्पनियों को 2,000 करोड़ से भी अधिक का भुगतान करना पड़ रहा है। अडानी बिजली परियोजना के साथ बिजली खरीद का समझौता एक गैर जरूरी समझौता समझा जा सकता है।  

मध्यप्रदेश में बिजली के बढ़ते वित्तीय घाटे जनता की जेब पर भारी पड़ रहे हैं, दूसरी तरफ राज्य अपने सरकारी बिजली घरों को बंद कर निजी बिजली कंपनियों से ऊंची दरों पर बिजली खरीद रही है। उदाहरण के लिए सतपुड़ा थर्मल पावर परियोजना की 210 मेगावाट वाली इकाइयों को सरकार ने बंद कर दिया जो की सस्ती बिजली दे रही थी। प्रदेश की जल बिजली परियोजनाएं जैसे बरगी, बाणसागर व पेंच जो सस्ती बिजली उपलब्ध करवा सकती हैं, उनसे बिजली नहीं ली जा रही है।

इसके अलावा सरकार ने कई निजी पावर कम्पनियों से नियत प्रभार (फिक्स चार्ज) के करार कर रखे हैं, जिसके कारण राज्य सरकार को हर साल बिना बिजली लिए हजारों करोड़ रूपए चुकाने पड़ रहे हैं। राज्य विद्युत नियामक आयोग के टैरिफ आदेश 2019-20 के अनुसार गत वर्ष सरकार ने नियत प्रभार (फिक्स चार्ज) परियोजनाओं को 2,034 करोड़ रु देने का प्रावधान किया गया जो कि गैर जरूरी था। 

गत माह में राज्य सरकार ने नर्मदा घाटी में 26 साल पुरानी महेश्वर बिजली परियोजना के समझौते को रद्द कर दिया। यह स्पष्ट करता है कि ये बिजली खरीद करार राज्य बिजली वितरण कंपनियों को  वित्तीय सकंट में धकेल रहे हैं। इसके कारण राज्य बिजली वितरण कंपनियां लगातार वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। 

सिंह बताते हैं कि राज्य मे बिजली परियोजनाओं का प्लांट लोड फैक्टर पहले से ही कम था लेकिन कोरानावायस के कारण बिजली की मांग और कम हो गई है। ध्यान रहे कि राज्य बिजली वितरण कंपनियों ने नौ बिजली खरीद करार कर रखे हैं। वर्तमान में बिजली की कम मांग को देखते हुये उनमें से चार निजी बिजली कंपनियों टोरेंट पावर, बीएलए पावर, जेपी बीना पावर और एस्सार पावर बिजली की आपूर्ति नहीं करेंगे। लेकिन राज्य वितरण कंपनी को इन निजी पावर कंपनियों को बिजली की एक यूनिट लिए बिना भी निर्धारित शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा।