Agriculture

खेती पर विदेशी आक्रमण: रातों-रात फसल चट कर जाता है यह अमेरिकी कीड़ा

भारत पर एक और विदेशी आक्रमण हुआ है, इस बार एक कीड़े ने भारत के खेतों पर आक्रमण किया है। इसका इलाज अब तक खोजा नहीं जा सका है। 

 

फॉल आर्मीवर्म एक घातक कीट है, इसके बारे में काफी कम जानकारी उपलब्ध है। अफ्रीका में फसलें चौपट करते हुए अब इसके निशाने पर एशिया है। यह करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए संकट बन गया है। जुलाई, 2018 में भारत में पहली बार देखा गया। कीट ने मक्के की फसल को अधिक नुकसान पहुंचाया है। देश के विभिन्न राज्यों में इसका असर देखा जा रहा है। “विदेशी आक्रमण” श्रृंखला की पहली कड़ी में आज जानिए छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का हाल। 

जब तक संक्रमण का पता लगता तब तक “वह” देश के एक बड़े क्षेत्र के लिए खतरा बन चुका था। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के बड़े चकवा गांव के किसान खेमो बघेल ने इस साल की शुरुआत में पहली बार मक्के की खेती की। उन्होंने एक बोरवेल खुदवाया और उन्हें यकीन था कि मक्के की फसल किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक मुनाफा देगी। लेकिन अभी बीज अंकुरित भी नहीं हुए थे और उन्होंने देखा कि कुछ कीड़ों ने उनके खेत पर हमला कर दिया था। वह बताते हैं, “मुझे ये कीड़े सुबह-सुबह अचानक से दिखे। जबकि पिछले दिन उनका कहीं नाम-ओ-निशान तक नहीं था। मुझे लगता है वे रात के वक्त आए थे।” दो महीने के अंदर उन कीड़ों ने खेत पर कब्जा जमा लिया और उनकी फसल का एक तिहाई हिस्सा चट कर गए। क्षेत्र के अन्य किसानों ने भी इस अनजान कीड़े की उपस्थिति की पुष्टि की है। कृषि वैज्ञानिक बड़े चकवा व आसपास के गांवों में आए लेकिन वे भी इस कीड़े की भयावहता को देख हैरान हुए। हां, अब इस बाहरी कीड़े का स्थानीय नाम स्थानीय ग्रामीणों ने जरूर “अमरीकी कीड़ा” रख दिया है।

छत्तीसगढ़ में जनवरी, 2019 में फॉल आर्मीवर्म (एफएडब्ल्यू या सैनिक कीट या  फौजी कीट) के संक्रमण की जानकारी मिली। जगदलपुर कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक धर्मपाल किरकेटा ने डाउन टू अर्थ  को बताया, “एफएडब्ल्यू का संक्रमण छत्तीसगढ़ में मक्के की फसल में पहली दफा जनवरी में देखा गया, लेकिन अब इसका प्रकोप राज्य के सरगुजा जिले में भी फैल गया।” उन्होंने बताया कि जनवरी, 2019 में बस्तर में यह पहली देखा गया था और अब केवल दो माह के अंदर ही मार्च में यह सरगुजा जा धमका। वह कहते हैं कि इससे बचने के लिए तो पड़ोसी मुल्क श्रीलंका में वहां की सरकार ने जनवरी, 2019 में ही अपने किसानों से कुछ समय तक के लिए मक्के की फसल नहीं लगाने की अपील तक कर डाली है।

यह एफएडब्ल्यू आक्रमक होता है। और एक बार के हमले में 75 से 80 फीसदी फसल चट कर जाता है। राज्य में मक्के की खेती करने वालों के लिए यह खतरनाक संकेत है। यह मक्के के साथ-साथ गन्ना उगाने किसानों पर मुसीबत बन कर टूटा है। धर्मपाल कहते हैं, हमारी खोजबीन में पता चला है कि यह एफएडब्ल्यू 2016 में कई अफ्रीकी देशों की फसलों को नुकसान पहुंचा चुका है। वहीं बस्तर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक लेखराम वर्मा ने बताया कि एफएडब्ल्यू पर कीटनाशक दवाओं का प्रभाव रत्तीभर नहीं पड़ रहा। इसकी विभीषिका का अंदाजा बस्तर कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक जी.पी. आयाम की इस बात से लगाया जा सकता है कि एफएडब्ल्यू 180 से अधिक प्रकार की फसलों को चट करने की क्षमता रखता है।

डाउन टू अर्थ  संवाददाता ने अपनी बस्तर यात्रा के दौरान पाया कि माओवादियों व सुरक्षाबलों के बीच कई दशकों से चली आ रही खूनी लड़ाई से प्रभावित इस क्षेत्र में एफएडब्ल्यू इस समय प्रमुख चर्चा का विषय बना हुआ है। क्षेत्र के एक अन्य पलारी गांव में भी एफएडब्ल्यू मक्के की पूरी फसल चट कर चुका है। गांव के किसान परमेश्वेर पांडे कहते हैं, “मैं 4-5 साल से खेती कर रहा हूं लेकिन इस एफएडब्ल्यू को कभी नहीं देखा। कीटनाशक का भी उस पर प्रभाव नहीं हो रहा है।”

अकेले छत्तीसगढ़ में ही एफएडब्ल्यू ने हमला नहीं बोला है, बल्कि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में भी इसका प्रकोप देखने में आ रहा है। राज्य में एफएडब्ल्यू ने 52 जिलों में से13 की फसलों को संक्रमित किया है। सर्वाधिक प्रभावित मालवा, महाकौशल और बघेलखंड क्षेत्र हैं। राज्य में ये इलाके कृषि क्षेत्र के रूप में समृद्ध माने जाते हैं। डाउन टू अर्थ  के संवाददाता ने नुकसान नापने के लिए 30 से भी अधिक प्रभावित किसानों से बातचीत की। हालांकि अधिकांश किसानों का कहना है कि संक्रमण तेजी से फैल रहा है लेकिन राज्य सरकार की तरफ से फसलों को हुए नुकसान पर अब तक कोई आश्वासन नहीं मिला। राज्य के कृषि विज्ञान केंद्रों के कृषि अधिकारियों की मानें तो मक्के व सोयाबीन की फसलों में संक्रमण तेजी से बढ़ा है और इसकी सूचना देनेवाले किसानों की संख्या में भी तेजी देखी जा रही है।

मालवा क्षेत्र के धार जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख फसल वैज्ञानिक जी.एस. गाठिए का कहना है कि पिछले वर्ष कुछ किसानों ने गेहूं में नई बीमारी की शिकायत की,जिसे देखने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे की यह तो एफएडब्ल्यू का असर है। वहीं पड़ोसी मंदसौर जिले में कृषि विभाग के तकनीकी सहायक हेमंत जोशी ने भी एक साल से गेहूं, चने और सोयाबीन पर एफएडब्ल्यू का असर बताया। इसके असर के बारे में केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक जी.एस. चुंडावत ने भी बताया कि उनके पास प्रदेश के कई जिलों से एफएडब्ल्यू के संक्रमण की शिकायतें आई हैं, जिससे धान ही नहीं अन्य फसलें भी इसकी चपेट में आ रही हैं। एफएडब्ल्यू के निशाने पर प्रमुख रूप से धान व मक्का की फसल होती है लेकिन प्रधान वैज्ञानिक कमल सिंह किराड ने बताया कि हमारे यहां धान की खेती नहीं होती है। प्रदेश के ही दूसरे जिलों से जानकारी ली तो पता चला कि इस एफएडब्ल्यू का असर हर फसल पर दिखने लगा है। सतना जिले के कृषि विभाग के उपनिदेशक आर. एस. शर्मा ने बताया कि जिले में कृषि का रकबा 3 लाख 70 हजार हेक्टेयर के बराबर है। इसमें एक लाख 70 हजार हेक्टेयर में धान का उत्पादन होता है। वह कहते हैं, “बघेलखंड के सतना जिले सहित अन्य जिलों में एफएडब्ल्यू का प्रकोप देखने को मिला है। इसके जिले में आने की खबर तो लंबे समय से हमें लग चुकी थी।” वहीं इस एफएडब्ल्यू को फौजी या सैनिक कीट कहने के पीछे का कारण बताते हुए जबलपुर विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक अमित कुमार झा कहते हैं कि फॉल आर्मीवर्म इसे इसलिए कहा जाता है कि क्योंकि जिस प्रकार से सैनिक रात में अपने दुश्मनों के क्षेत्र में सर्जिकल हमला करते हैं, ठीक उसी प्रकार से यह भी रात में धान-मक्के आदि फसलों पर हमला करता है और रात भर में पूरी की पूरी फसल जड़मूल समेट चट कर जाता है। उन्होंने बताया कि इसका हमला विगत में जबलपुर के आसपास के जिलों होता रहा है। अक्सर यह उस समय हमला करता है जब तापमान तेजी से बढ़ रहा हो।

... जारी 

(यह रिपोर्ट डाउन टू अर्थ, हिंदी मैगजीन के अप्रैल 2019 अंक में छपी है)

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.